अब हालत यह है कि ब्लॉग का नाम निर्मल आनन्द होने से लोग मान कर चलते हैं कि मैं बड़े ही निर्मल स्वभाव वाला व्यक्ति हूँ.. लोग कहते हैं मन को बड़ा अच्छा लगता है.. अपनी ही निर्मलता पर मन झूम-झूम जाता है.. सोचने लगता हूँ कि मैं तो भौतिक जगत के बन्धनों से ऊपर उठ चुका आदमी हूँ.. साधारण मोह-माया, जगत के जंजाल जिनमें उलझा रहता है आम आदमी.. मेरा दूर-दूर का नाता नहीं उनसे.. लेकिन ये सारा भ्रम टूट कर धराशायी हो गया जब आखिरकार हमने एक ड्राइवर को मुलाज़िम रख लिया..
मुझे कार चलानी नहीं आती थी.. कार चलाने को लेकर कोई बहुत उत्साह भी नहीं रहा कभी.. मगर पाँच बरस पहले रिक्शे से एक दुर्घटना हो जाने के बाद फटाफट कार सीखी और आनन-फानन एक कार खरीद भी ली.. मगर मैं घरघुस्सु आदमी.. कहीं भी जाने से पहले बीस बार सोचता हूँ.. पाँच साल में बमुश्किल तेरह-चौदह हज़ार किलोमीटर चलाई गाड़ी.. जबकि बीबी को अपने काम के सिलसिले में काफ़ी आना जाना होता है..(मगर वह ड्राइव न करती है और न करेगी यह तय हो चुका है..) लेकिन इस बरस तो हालत ये हुई कि मैं एकदम ही घर पर बैठ गया और बीबी का काम कुछ ऐसा बढ़ा कि उसे दिन भर काफ़ी जगह जाना होता.. तो ड्राइवर रखा गया..वैचारिक तौर पर मुझे कोई समस्या नहीं थी.. पर मेरे अन्दर अजीब-अजीब भाव जन्म ले रहे थे.. मुझे नफ़रत हो रही थी इस फ़ैसले से.. उस ड्राइवर से जो मेरी गाड़ी को चलाएगा.. उसी सीट पर बैठेगा.. जिस पर मैं बैठता हूँ.. हे राम.. मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे मेरा प्रिय खिलौना कोई मुझसे छीने लिये जा रहा है.. पहले दिन जाती हुई गाड़ी को मैंने ऐसे देखा जैसे कोई विदा होती बेटी को देखता है..दिन भर उसी के बारे में सोचता रहा.. शाम को ड्राइवर को मैने उसके तौर-तरीकों के बारे में एक झाड़ लगाई.. बीबी को भी उसके गाड़ी के प्रति दुर्व्यवहार के लिए लताड़ा.. मैं एक राक्षस होता जा रहा था.. और ये कोई पुरानी बात नहीं है.. करीब महीने भर पहले ही.. उस वक्त ब्लॉग की दुनिया में कोई न कोई मेरे निर्मलापे को लेकर भली बातें कह-लिख-सोच रहा होगा..
तब मुझे एहसास हुआ कि मैं कितना अधिक मोहासक्त था इस कार में.. कितना बँधा हुआ था इसके साथ.. शीयर अटैचमेन्ट.. मैं इस कार को लगभग एक मनुष्य का दरज़ा दिये हुए था.. शायद किसी मनुष्य से भी ज़्यादा मैं इस भौतिक वस्तु से जुड़ा हुआ था.. कि अभी भी दर्द होता है.. थोड़ा-थोड़ा..