सोमवार, 14 अक्तूबर 2013

जो सबका मालिक है

नीचे से नीचे रहता है। 
आँखों से छिपकर रहता है।
दूर से, धोखे में, भूल से, 
नौकर लखता है। 

माँ जैसी सेवा करता है। 
सब सहता है। 
चुप रहता है। 

जो सबका मालिक है, 
वो, 
नौकर का भी नौकर,
बनकर रहता है।

***

4 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत ही गहरी बात कहीं है आपने।

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

वाह क्‍या बात है

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कहा…

ईमानदारी से कहूँ तो यह गहरी बात मुझे समझ में नहीं आयी। कविता की व्याख्या करे कोई।

अभय तिवारी ने कहा…

नीचा अंदरि नीच जाति नीची हू अति नीचु
नानकु तिन कै संगि साथि वडिआ सिउ किआ रीस
जिथै नीच समालीअनि तिथै नदरि तेरी बखसीस

Those who are lowest of the low class, the very lowest of the low Nanak seeks the company of those. Why should he try to compete with the great?
in that place where the lowly are cared for-there, the Blessings of Your Glance of Grace rain down.-Guru Nanak

अनुवाद बलजीत बासी जी का है। नानक बाबा पहले ही कह गए हैं। मुझे अभी पता चला। वाहे गुरु! वाहे गुरु!

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