मंगलवार, 24 सितंबर 2013

हमें पता ही नहीं हम किस आयतन में है!

हमें पता ही नहीं हम किस आयतन में है! 

हमारा शरीर स्वयं एक आयतन है। अद्भुत संरचना है शरीर। अन्य जानवरों और पेड़-पौधों की भी संरचना हमसे मिलती जुलती है। पर हमारी संरचना जटिलतम है। हमसे मिलते जुलते प्राइमेट्स भी हमारी बराबरी नहीं कर सकते। अनोखा आयतन है हमारा। पर हमसे बाहर जो आयतन है- ये वातावरण। ये हवा, मिट्टी, पानी, आग। ये सब कुछ हमारे आगे कुछ नहीं। जड़ है। हमारे हाथ के खिलौने हैं ये। हम जैसे मनचाहे इसका इस्तेमाल करते हैं। हमारी बुद्धि और चेतना का कोई जवाब ही नहीं। 

बाहर के आयतन को अभी बुद्धि कुछ समझने लगी है। दूरबीन लगाकर हमने देखा है कि बाहर का जगत भी एक जटिल संरचना है। पर हमारा विश्वास है कि वो एक जड़ संरचना है। जीवनहीन संरचना। उसमें न तो बुद्धि है और न चेतना। और न ही कोई अहंकार। हम जानते हैं कि पृथ्वी का कोई अहम नहीं। सौर मण्डल का कोई अहम नहीं। नक्षत्रों का कोई अहम नहीं। उनके अहम को नकारना हमारा वहम भी हो सकता है।

हमारे शरीर के भीतर करोड़ों कीड़े रहते हैं। सबसे अधिक आंत में। वे आंत में ही पैदा होते हैं। आंत में ही मर जाते हैं। उनके लिए पेट ही सारा संसार है। जो खाना हम पेट में डालते हैं, वही उन तक पहुँचता है। पर उनका भी एक अहम होता है। एक भीतर-बाहर की दुनिया होती है। जिसमें एक उनका शरीर होता है। उनके जैसे कुछ और शरीर। और कुछ पदार्थ जो भोजन है। और आंत को वो आयतन जिसमें ये सब कुछ उपस्थित है। 

उस कीड़े को नहीं मालूम कि आंत एक बड़े आयतन का अंग है। एक बड़े अहम का अंग है। जिसे हम अपना शरीर कहते हैं।  उस कीड़े का ज़रा भी नहीं मालूम कि बाहर एकदम अलग दुनिया है। एकदम अलग आयतन। पर हमारा ये आयतन उतना अलग भी नहीं। कीड़े की तरह हम भी जिस आयतन में रहते हैं उसके बारे में सीमित ज्ञान रखते हैं। हम नहीं जानते कि अनन्त तक फैला ब्रह्माण्ड क्या आयतन है? 


कीड़े का आयतन भी पांच तत्वों से बना है। हमारे शरीर का आयतन भी पांच तत्वों से बना है। और हमारे शरीर के बाहर का जो जगत है वो भी पांच तत्वों से बना है। मूल तत्व एक ही हैं। फिर भी अलग-अलग अहम हैं। अहम के भीतर अहम हैं। ब्रह्माण्ड के भीतर ब्रह्माण्ड हैं। 

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1 टिप्पणी:

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

ब्रह्मांड की तुलना में तो हम हैं ही कहां

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