बुधवार, 23 सितंबर 2009

ई रजा कासी हॅ - लंगोट सर्ग

वैसे तो बनारस में और भी तमाम रंग देखे, सब का ज़िक्र करना यहाँ मुमकिन नहीं लेकिन लंगोट की चर्चा के बिना यह विवरण अधूरा रह जाएगा। अपनी काशी डायरी का अंत इसी लंगोट को समर्पित करता हूँ।

जहाँ बाकी देश में खासकर बड़े शहरों में ब्रीफ़्स और अण्डरवियर्स का चलन है, बनारस में लंगोट अभी भी लोकप्रिय है, घाट पर नहाते पुरुषों में अधिकतर लोग आप को ब्राण्डेड अण्डरवीयर में ज़रूर दिखेंगे मगर एक अच्छी संख्या लंगोटधारियों की भी मिलेगी। और नगरों में लंगोट को लोगों ने पके करेले की तरह त्याग दिया है। करेला तो वो पहले भी था क्योंकि जो लोग लंगोट के योग्य अपने को नहीं पाते थे उन्होने पिछली पीढ़ी में ही पटरे वाले जांघिये का आविष्कार करवा लिया था। अब तो खैर! ये भी बात होने लगी है कि लंगोट पहनने से आदमी नपुंसक हो जाला।

आधुनिक विज्ञान के फ़ैड्स पर यक़ीन करना ख़तरे से खाली नहीं। साठ के दशक में पूरे योरोप और अमरीका के वैज्ञानिकों ने मिल्क फ़ूड कम्पनियों को यह प्रमाण पत्र दे दिया है कि माँ का दूध बच्चे के लिए पर्याप्त नहीं। साठ, सत्तर और अस्सी, और नब्बे के दशक में पैदा होने वाले बच्चे डिब्बा बन्द पाउडर के दूध पर पले। आज बिना किसी माफ़ी, किसी अपराध स्वीकरोक्ति के ये फ़िर से स्थापित कर दिया गया है कि माँ का दूध ही सर्वश्रेष्ठ है। तो आज का कॉमन सेन्स है कि लंगोट पहनने से आदमी नपूंसक हो जाता है।


अगर सचमुच ऐसा होता तो काशी में आबादी की वृद्धि दर में कमी ज़रूर नोटिस की जाती। काशी में लंगोट कितना आम है इसका अन्दाज़ा आप को कपड़ों की कुछ दुकानों के आगे फ़हराते रंगीन पताकाओं से मिलेगी। अगर आप भूल न गए हों तो आप पहचान जाएंगे कि ये झण्डा-पताका नहीं छापे वाले रंगीन लंगोट हैं।

लंगोट पहनना कोई कला नहीं है। आप को बस गाँठ मारना और हाथ घुमा के सिरा खोंसना आना चाहिये। लेकिन घाट पर लंगोट पहनना एक हुनर ज़रूर है। इस हुनर में पहले लंगोट का एक सिरा मुँह में दबा कर शेष तिकोना भाग लटका लिया जाता है। फिर पहने हुए लंगोट/अंगौछे को गिरने के लिए आज़ाद छोड़कर फ़ुर्ती से तिकोने को पृष्ठ भाग पर जमा लिया जाता है। दोनों तरफ़ ओट हो जाने के बाद फिर नाड़े को कस लिया। सारा हुनर इस फ़ुर्ती में ही है। अनाड़ी लोग चूक जाते हैं तो उनके पृष्ठ भाग आम दर्शन के लिए सर्व सुलभ हो जाता है। और हुनरमन्द हाथ की सफ़ाई से नज़रबन्दी कर देते हैं और एक पल में ही सब कुछ खुल कर वापस ओट में हो जाता है। जय लिंगोट।

मेरे हिसाब से लंगोट से बेहतर अन्डरवियर मिलना असम्भव है। एक प्रकार के मॉर्डन अण्डरवियर की टैग लाइन है कि फ़िट इतना मस्त कि नो एडजस्ट। बात मार्के की है। हर आदमी अण्डी पहन के एडजस्ट का हाजतमन्द हो जाता है। मुश्किल ये है कि सारी अण्डीज़ प्रि फ़िटेड आती है वो आप के लिए कस्टम मेड नहीं है। ९० हो सकता है आप के लिए ढीला हो, और ८५ टाइट। आप सर पटक कर मर जाइये आप के लिए कोई ८७ या ८८ साइज़ का अण्डरवियर नहीं बनाएगा। और किसी ने बना भी दिया तो आप का साइज़ सर्वदा ८७ ही रहेगा इस की क्या गारन्टी है हो सकता है सुबह ८४ हो शाम ९१ हो जाय और रात को ८१।

झख मार कर आप ८५ या ९० का साइज़ लेंगे और फिर आप कितना भी एडजस्ट करें कुछ एडजस्ट नहीं होगा। इसके विपरीत लंगोट है। इसके ठीक विपरीत लंगोट कस्टम मेड है। जितना चाहे एडजस्ट। टाइट पहनना हो सिरा खींच कर टाइट कर लीजिये। और नपुंसक हो जाने के अफ़वाह से बचाव करना हो तो ढील दे कर लंगोट का वातायन बना लीजिये।


जय बनारस! जय लंगोट!!

(बनारस यात्रा के दौरान लिखी गई डायरी से)

16 टिप्‍पणियां:

समयचक्र - महेंद्र मिश्र ने कहा…

लगोट है बड़े काम का चाहो तो मोड़कर रुमाल की तरह जेब में रख लो... कही भी निकल पडो . चद्दे से कम कपडा लगोट में लगता है बचत भी हो जाती है .

अनूप शुक्ल ने कहा…

उत्तम लंगोट आख्यान्! सुन्दर!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

लंगोट कभी पहनी नहीं। पर पिता जी पहना करते थे। वह एकदम फ्री साइज होती है और हमेशा फिट। यही हाल हम लोग अदालतों में कपड़े का जो बस्ता ले जाते हैं उस का है। एक फाइल रख कर बांध लो या पच्चीस फाइलें। वह सब को बांध लेगा और न ढीला और न टाइट। गांधी जयन्ती पर खादी भंडार पर छूट आते ही जो कुछ खरीदा जाता है उस में चार पाँच बस्ते जरूर होते हैं।

योगेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा…

वह मज़ा आ गया | मैंने हमारे यहाँ एक बार जब केसरी व्यायामशाला ज्वाइन की थी तब लंगोट पहनने का अनुभव प्राप्त किया था | वैसे तो मैं सामान्यतः अंडरवियर ही पहनता हूँ, लेकिन वो लंगोट आज मेरे पास नया का नया ही पड़ा है तो कभी-कभी मूड होता है तो लंगोट भी पहन लेता हूँ, यकीन मानिये उसका अपना अलग ही मज़ा है | टाईट करके जैसे ही मुगदल उठाते तो मन का भाव जैसे बजरंगी प्रवेश कर गए हों कि आ जाओ भैया कौन सा है, ....... | ये बात पक्की है कि एक दिन में आप आर्नोल्ड नहीं बनने वाले हो पर भाई साहब सच मानिये ज्वाइन करने वाले दिन से आदमी कि चाल बदल जाती है, उसी दिन मोहल्ले के सुरक्षा परिषद् वाले ग्रुप में उसकी उठा-बैठी शुरू हो जाती है | वैसे एक ख़ास बात और है अखाडे में लंगोट का रंग लाल ही होना चाहिए दूसरे रंगों वो ताकत कहाँ, मेरे सीनियर पहलवानों ने पहले दिन ही कह दिया था कि लाल रंग का लंगोट ही सिलवाना है अब उनकी अवज्ञा का मतलब आप समझते है ना ......... |

Arvind Mishra ने कहा…

लंगोट से शुक्राणुओं का उत्पादन प्रभावित होता है -यह नपुंसकता कारक है यह आपका शोध है ! आश्चर्य हुआ !

वीरेन्द्र जैन ने कहा…

मेरे एक व्यंग्य गीत में लंगोट का ज़िक्र कुछ यूँ आया है
ये गोल गोल ये ढोल मोल न लम्बे हैं न छोटे हैं
ये बेपेंदी के लोटे हैं
..................
...............
ये ब्रम्हचर्य की दिव्य देह पर ढीले बंधे लंगोटे हैं
ये बेपेंदी के लोटे हैं

अफ़लातून ने कहा…

ठिठुर - ठिठुर कर , किसी तरह से यात्रा पूरी करने वाले चांद ने जब अपनी माता से’मोटा एक झिंगोला’की मांग की थी तब भी यही समस्या आई थी - ’ घटता - बढ़ता रोज , कभी कम होगा कि नहीं , बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं’।
बहरहाल लाल निगोटे की दो छोरों को ताने , उ.प्र. के इस प्रान्तीय ध्वज को घाट से घर तक फहराने में वह सूख भी जाता है ।

डॉ .अनुराग ने कहा…

साइज़ वाली बात में दम तो है ..वैसे लंगोट धारी एक खास घाट पे ही मिलते है .आपकी हिम्मत है जो अपने फोटो खीच ली ...वर्ना कई बार मूडी होते है ये लोग

शरद कोकास ने कहा…

पिताजी तो जीवन भर लंगोट पहनते रहे अत: यह जानी पहचानी चीज़ है । इसे हाईड्रोसिल वाले भी इस्तेमाल करते है ताकि ऑपरेशन से बचा जा सके । हमने भी एक बनवाई थी भगवे रंग की जब शुरू शुरू मे योगासन सीखते थे ।अब भी वह आलमारी की शोभा बढ़ा रही है कभी कभी मूड होता है तो ट्राई कर लेते हैं । लंगोटिया यार शब्द तो अभी भी चलता है भले ही दोनो ने लंगोट न पहनी हो

Pratik Pandey ने कहा…

लंगोट-महिमा का अच्छा बखान किया है आपने। ख़ुशी है कि काशी वाले बजरंगबली की परंपरा को आज भी बचाए हुए हैं। :)

और जहाँ तक रही विज्ञान की बात... तो अख़बार में एक दिन छपता है कि नए वैज्ञानिक शोध के मुताबिक़ रेड वाइन, एस्प्रिन, चाय फ़ायदेमंद है और अगले रोज़ आता है कि बहुत ख़तरनाक हैं, हार्ट-अटेक का ख़तरा बढ़ जाता है। ऐसे में कभी-कभी पारंपरिक सोच विज्ञान से बेहतर साबित होती है।

सतीश पंचम ने कहा…

आज फुरसत से आपकी पिछली पोस्टों ( काशी यात्रा संबंधी) को पढा और गुना।
अगर काशी की अस्सी पढे होंगे तो एक कैरेक्टर तन्नी गुरू का है जो अक्सर काशी मे किसी न किसी में दिख जाता है। आपने जिस पुजारी का उल्लेख किया कि नंगे बदन केवल अंगोछे पर अपने अधोभाग को प्रदर्शित कर रहा था...तो बस समझ लिजिये वही तन्नी गुरू हैं :)

रोचक घटनाएं और रोचक विवरण।

apnidaphli ने कहा…

भागते भूत की लंगोट ही सही. कम से कम इसे कस कर बांधे रहिये और लंगोट के पक्के कहलाइये.हेल्थ क्लब में भी लोग सपोर्टेर की बजाय लंगोट पहनना पसंद करते हैं. अगर चुप्चाप मिल जाये तो

apnidaphli ने कहा…

भागते भूत की लंगोट ही सही. लंगोट पहनने वाले हमेशा से मर्दानगी के द्योतक रहे हैं इसीलिये कहागया था लंगोट के पक्के रहो.

Swaa, JANARDAN VISHNU PATIL ने कहा…

क्या आप लंगोट पेहेंते है ?

Rahul singh ने कहा…

हाँ

Rahul singh ने कहा…

Ji ha

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