शुक्रवार, 6 मार्च 2009

चश्मा अमर है.. नज़र दफ़न हो गई

महात्मा गाँधी का चश्मा नीलाम हो रहा था। तमाम लोग बड़ी-बड़ी बोलियाँ लगाने को तैयार थे। चुनाव के मुहाने पर खड़ी कांग्रेस पार्टी भी बापू के चश्मे को पा लेने की क़समें खा रही थी।

आज प्रसिद्ध उत्सवधर्मी और शराब व्यापारी विजय माल्या ने गाँधी जी का चश्मा सबसे ऊँची बोली लगा के खरीद लिया है। तक़रीबन १.८ मिलियन डॉलर्स। कांग्रेस पार्टी इस घटना पर गदगद है।

बापू की आत्मा आज धन्य हो गई होगी!

चश्मा अमर है, नज़र दफ़न हो गई।

21 टिप्‍पणियां:

अनिल कान्त : ने कहा…

गाँधी प्रेम और उनके सिद्धांतों को तो बस दिखावे की चीज़ बनाकर रख दिया है

अंशुमाली रस्तोगी ने कहा…

गांधी का चश्मा अब ठीक आंखों पर लेगा।

premlatapandey ने कहा…

पैसा अंधा कर देता है, पैसी अंधापन दूर भी कर देता है चश्मा खरीदवाकर!

premlatapandey ने कहा…

पुनश्चः- कृपया पैसी नहीं पैसा पढ़ें।

पंगेबाज ने कहा…

भैया काहे दुखी होते है ? काग्रेस साठ सालो से गांधी को बेच रही है और पूरा देश खरीद रहा है अब एक बंदे ने खुले आम खरीद लिया दारू की कमाई से यही आज का गांधी वाद है

आशीष कुमार 'अंशु' ने कहा…

हा हा हा हा सच में बापू की आत्मा धन्य हो गई होगी.. चीयर्स

हर्षवर्धन ने कहा…

ऐसा ही कुछ मैं सोच रहा था। आपने गजब की लाइन लिखी है। चश्मा अमर है नजर दफन हो गई... वैसे माल्या की नजर सही है राज्य सभा में कुछ और समय तक रहने को मिलेगा इसी चश्मे के भरोसे।

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

आजकल लोग बापू के नाम पर अपनी दुकान चलाते है, पर उनके विचार नही। बडे अफसोस की बात है।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

उन की दुकान से खरीदने और पी कर टुन्न हो जाने वाले को बरसों से लोग कहते आ रहे हैं महात्मा गांधी हो गया।

cmpershad ने कहा…

जिन शराब बेचने वालों से बापु जीवन भर लडते रहे, आज वो ही उनकी अस्मिता बचाने आ गए:)

Mired Mirage ने कहा…

जय हो ! गाँधी जी के असली चेलों के पास धेले कहाँ से आते? आभार में शराब पर कर अब घटा देना चाहिए।

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

टीपू सुल्तान की तलवार और बापू का चश्मा, दोनों ताकतवर हैं. अभी भी बहुत कुछ धो सकते हैं.

Priyankar ने कहा…

गंगा और गांधी भारत में सबसे महान प्रक्षालक -- सबसे आवश्यक पापनाशक साबुन हैं. इनके पास पापियों की पूरी की पूरी जमात आती रहती है पाप धोने .

नज़र चली गई तो क्या, चश्मा तो आ गया . अब हम चश्मा बचाने वाले उस ’सेवियर’ की दारू को गंगाजल समझेंगे .

बाज़ार वैसे ही मंदा है. चिन्ता यह है कहीं इस नाम से कोई नया ब्रांड न शुरु कर दे .

Udan Tashtari ने कहा…

चश्मा अमर है, नज़र दफ़न हो गई।-सच कहा!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

What an irony !!

vimal verma ने कहा…

चश्मा अमर है नजर दफन हो गई..वैसे भी माल्या आई पी एल,राजनीति गलियरों में हाथ पैर मार ही रहे हैं शायद गांधी जी नैया पार लगा दें,वैसे आपकी नज़र है बहुत तेज़,शीर्षक बहुत अच्छा लगाय है आपने...क्या खूब लिखते हैं आप..इस नज़र के लिये आपका शुक्रिया

cmpershad ने कहा…

आज का नया समाचार- अम्बिका सोनी ने गांधीजी की चीज़ों को भारत लाने का श्रेय सरकार पर लेना चाहा पर एक बार फिर गांधीजी की आत्मा पर खंजर भोंक दिया गया - झूठ पकडा गया! विजय मल्या ने कहा कि उन्होंने यह अपने ज़ातीजौर पर किया है। एक और झूठ-हे राम!!!

अफ़लातून ने कहा…

अन्धे कांग्रेसियों का पुरसाहाल नहीं है । अचूक पोस्ट।

संगीता पुरी ने कहा…

किसी के प्रति सच्‍ची श्रद्धांजलि उनके विचारों और भावनाओं का कद्र करने से होती हैं ... बापू की इन वस्‍तुओं का वापस लाया जाना तब अच्‍छा माना जा सकता था ... जब उन्‍होने अपने जीवन में इन सब वस्‍तुओं को महत्‍व दिया होता ... उन्‍होने तो खुद कई अपनी वस्‍तुओं को बेचकर उन पैसों से जनता के लिए कल्‍याणकारी कार्य किए थे ।

anitakumar ने कहा…

हम में से कइयों के मन की बात कही। शीर्षक बहुत ही बड़िया है

आभा ने कहा…

मुझे नहीं लगता कि माल्या ने कोई गुनाह किया है।
खरीदना चाहते तो जमुनालाल बजाज के पोते भी खरीद सकते थे जो कि शायद बापू की कांग्रेस से सांसद भी हैं ।खरीद तो बिड़ला के कई पड़पोते भी सकते थे। गाँधी होते तो माल्या में एक भविष्य का अपना एक चेला खोजते।

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