बुधवार, 29 अक्तूबर 2008

पुलिस किस की रक्षा के लिए है?

दो दिन पहले प्रतिशोध के ताप में बौखलाए हुए पटना के राहुल राज का पहले मुम्बई पुलिस ने किसी आतंकवादी की तरह एनकाउन्टर कर दिया, फिर राज्य के उप-मुख्यमंत्री आर आर पाटिल जी ने कड़े शब्दों में बताते हुए लगभग धमकाया कि गोली का जवाब गोली से दिया जाएगा और आगे किसी ने ऐसी कोशिश की तो यही हाल किया जाएगा। उनके बयान से ऐसा मालूम दिया कि वे पुलिस को क़ानून व्यवस्था बनाए रखने की संस्था नहीं न्याय वितरण करने वाली संस्था भी मानते हैं।

हम्मूराबी के आँख के बदले आँख की न्याय व्यवस्था में यक़ीन रखने वाले पाटिल साब का न्याय बोध तब कहाँ नदारद हो जाता है जब एक निर्दोष 'भैय्ये' को पीट-पीट कर ट्रेन में मार डाला जाता है। लालू जी की रेल में बिना किसी राजनीतिक दल का नाम लिये यह कारनामा अंजाम दिया जाना एक सोची समझी रणनीति की ओर इशारा करता है। मगर उस मामले में मंत्री जी का कहना है कि यह हेट-क्राइम नहीं है।

आज पूरे दिन सहारा समय पर मृतक धर्म देव के साथ पिटने वाले 'भैय्ये' बताते रहे कि मारने वालों की मार खाने वालों से मुख्य शिकायत उनका उत्तर-भारतीय होना ही थी; वो भैय्यों को सबक सिखा रहे थे। लेकिन मंत्री जी उनकी बातों पर ध्यान नहीं देते.. सम्भवतः वे उत्तर-भारतीयों के बयान को उतना वज़नी नहीं मानते। और उप मुख्य मंत्री जी ने जाँच होने के पहले ही फ़ैसला सुना दिया है कि यह हेट-क्राइम नहीं है।

समझ में नहीं आता कि क्या करूँ.. क्या उनका एहसान मानूँ कि कम से कम वे इसे क्राइम मान रहे हैं?

मैं जिस गहरे क्षोभ को महसूस कर रहा हूँ उसका अनुभव मेरे साथ-साथ उत्तर भारत का बहुसंख्यक हिस्सा भी कर रहा है। दुविधा अब यह है कि मैं मनसे, शिव सेना, कांग्रेस और शरद पवार जी की राष्ट्रवादी कांग्रेस के बीच चल रही इस घिनौनी राजनीति का जवाब किस के नेतृत्व में गोलबंद हो कर दूँ? लालू जी के या मुलायम जी के? राजनीति के अपराधीकरण में इन लोगों की भूमिका कम उल्लेखनीय नहीं है.. ये वही लालू जी हैं जो कामरेड चन्द्रशेखर के हत्या के आरोपी, सिवान के सांसद शहाबुद्दीन के गले में हाथ डालकर संसद में घूमते थे जबकि पुलिस उसके नाम का वारंट लेके देश भर में भटक रही होती थी। मुलायम जी के राज में उत्तर प्रदेश में अपराधी सीन फुला के लाल बत्ती की गाड़ियों में घूमते रहे हैं.. आज भी घूम रहे हैं।

कौन दूध का धुला है? क्या भाजपा और क्या कांग्रेस.. सभी इस हमाम में नंगे हैं। सब ने अपने छुद्र चुनावी स्वार्थों के लिए क़ानून तोड़ने वालों को क़ानून बनाने वाली सर्वोच्च संस्था में घुसा कर उसे प्रदूषित करने का काम किया है। सब से बड़ी अपराधी तो जनता है जो इन हत्यारों को अपना नेता स्वीकार करती है.. इन अपराधियों की सफलता के पीछे सिर्फ़ बूथ-कैपचरिंग का मामला नहीं है। हमारा समाज गहरे तौर पर बीमार समाज है। हमारे समाज के सबसे बड़े नायक कौन हैं? सचिन तेंदुलकर और शाहरुख खान? समाज में इनका क्या रचनात्मक योगदान है?

आज अगर तथाकथित ‘मराठी मानूस’ राज ठाकरे को अपना नेता मान रहा है; उसकी गिरफ़्तारी पर सड़क पर आके दंगा करने और पुलिस के हाथों पिटने में अपना हित देखता है, तो दोष सिर्फ़ राज ठाकरे को ही क्यों दिया जाय? वे सभी लोग जो इस तरह की लुम्पेन राजनीति के पीछे चलने में अपनी मनुष्यता की सार्थकता समझते हैं.. वे या तो स्वयं असफल अपराधी हैं या नैतिक रूप से बीमार।

मैं ये सोच कर खीझ उठता हूँ कि मासूम विद्यार्थियों को सामूहिक रूप से पीटे जाने को अपनी राजनीति की मुख्य धुरी बनाने वाले राजनीतिज्ञ की सुरक्षा में बाइस पुलिस वाले तैनात रहते हैं क्योंकि उसे डर है कि पीटे जाने वालों में से कोई या उनका सगा-सम्बन्धी उस पर क़ातिलाना हमला कर सकता है। और जब उन सम्भावित हमलावरों की जमात वालों में से किसी को जब सामूहिक रूप से पीट-पीट कर मार डाला जाता है तो राज्य व्यवस्था उस वक़्त राज ठाकरे की सुरक्षा में सजगता बरत रही होती है।

मन भीतर से बहुत क्षुब्ध है.. आप सब भी क्षुब्ध है मैं जानता हूँ.. पार आप में से तमाम मित्र ऐसे भी हैं जो कश्मीर में भीड़ पर गोली चलाने वाली पुलिस का समर्थन करते हैं, बाटला हाउस जैसे एनकाउन्टर को जाइज़ ठहराते हैं, निरीह किसानों के हित के लिए लड़ रहे नक्सलियों के क्रूर दमन की पैरवी करते हैं।

आप को लगता होगा कि यह मामला नितान्त स्वतंत्र मामला है.. पर ऐसा है नहीं दोस्तों.. ये राज्य सत्ता अपने को बरक़रार रखने के लिए किसी भी हद तक गिर सकती है.. उस के लिए लोग महत्वपूर्ण नहीं है.. सत्ता महत्वपूर्ण है.. जिसे पर अपना क़ब्ज़ा बनाए रखने के लिए वो देश, राष्ट्र, समाज, धर्म सब कुछ तोड़ सकती है.. दो चार सौ लोगों की जान को तो वो कीड़ों-मकोड़ों जैसी अहमियत भी नहीं देती।

हम सहज विश्वासी लोग.. सुन्दर चेहरों औए मीठी बातों से बरग़लाये जाते हैं और बार-बार वही ग़लतियाँ दोहराए जाते हैं। ये सिर्फ़ महाराष्ट्र और उत्तर-भारतीयों की समस्या तक सीमित मामला नहीं है। ये क्रूर खेल अलग-अलग रूप में हर जगह देखा जा सकता है।

अभी कल की ही बात है मेरी मित्र विनीता कोयल्हो जो गोवा में अन्धाधुन्ध माइनीकरण और एसईज़ेडीकरण के खिलाफ़ गोवा बचाओ अभियान के तहत संघर्ष करती रही हैं, उन्हे एक अखबार में अपनी स्वतंत्र राय रखने के विरोध में भरी ग्राम सभा में गुंडो ने अपमानित किया, धमकाया, और दबाने का हर सम्भव प्रयास किया।

जिसके जवाब में पुलिस ने क्या किया.. उलटा उन्हे गिरफ़्तार करके थाने ले गए.. ग़नीमत यह रही कि कोई केस नहीं लगाया और तीन घन्टे बाद छोड़ दिया.. मगर सोचिये.. अब भी.. कि ये राज्य किसका है? सरकार किस की है..? और पुलिस किस की रक्षा के लिए है?

आखिर में एक सवाल अपने प्रगतिशील मित्रों से जो एक साध्वी की गिरफ़्तारी को अपनी उन आशंकाओ की पुष्टि मान रहे हैं जिसके अनुसार देश में एक हिन्दू आतंकवाद काफ़ी पहले से पनप रहा है। मैं उस आशंका और सम्भावना से इन्कार नहीं करता.. मगर इल्ज़ाम और जुर्म, मुल्ज़म और मुज्रिम का फ़र्क बनाए रखा जाय। जिस पुलिस की मुस्लिम युवकों की गिरफ़्तारियों पर हम सभी लगातार प्रश्नचिह्न खड़ा करते रहे हैं, उसी पुलिस की हिन्दू साध्वी की गिरफ़्तारी को इस नज़रिये से देखा जाना कहाँ तक उचित है जैसे कि जुर्म सिद्ध ही हो गया हो?

राज्य सत्ता अपनी सहूलियत बनाए रखने के लिए जैसे पहले मुसलमानों की गिरफ़तारियाँ करती थी.. वैसे ही (चुनावी)समय की नज़ाकत को देखते हुए ये हिन्दू साध्वी की गिरफ़्तारी का खेल भी खेला जा रहा है। भाजपा, सबको पता है, नागनाथ है मगर कांग्रेस छिपा हुआ साँपनाथ है.. पर ज़हरीला कौन अधिक है.. कहना मुश्किल है।

हमारे हितों का प्रतिनिधित्व करने वाला मंच अभी नहीं है.. जो हैं वो या तो भ्रूणावस्था में हैं या समाज की उन्ही बीमारियों से ग्रस्त हैं जिन से हम मुक्ति पाना चाहते हैं। जब तक हमें अपना मंच नहीं मिलता.. जागते रहिये.. सवाल करते रहिये.. और जवाब खोजते रहिये।

8 टिप्‍पणियां:

अनूप शुक्ल ने कहा…

बड़ा जटिल मामला है।

जितेन्द्र दवे ने कहा…

बहुत सटीक लिखा है. करीब ४० साल पहले मुम्बई से कम्युनिस्टो का सफाया करने के लिए कांग्रेस ने शिव सेना को पनाह दी और पनपने के लिए चारा पानी दिया. अब शिव सेना को ठंडा करने के लिए राज ठाकरे को आगे किया है. कांग्रेस इसा तमाशे में वोट बैंक पक्का करने के जुगाड़ में है. राज ठाकरे से मार खाए उत्तर भारतीय अब थोक के भाव कांग्रेस को वोट देंगे. वरना क्यों डेढ़ साल तक कांग्रेस सरकार राज ठाकरे का उत्पात तमाशबीन बनाकर देखा रही है. आपको ज्ञात होगा कि कुछ दिन पहले गोवा के कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने भी उत्तर भारतीयों के खिलाफ जहर उगला था. इसी तरह महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार के शिक्षा मंत्री सुरेश शेट्टी, खुद मुख्या मंत्री विलासराव देशमुख और हाल ही में नारायण राने ने भी उत्तर भारतीयों के खिलाफ बोला था. कुल मिलाकर इसा शतरंज में निर्दोष लोग मार खा रहे हैं. कल राहुल राज को पुलिस ने मार दिया और सरकार बेशर्मी से बयान दे रही है वही आज एक और निर्दोष धर्मनारायण की जान चली गयी. बार-बार कर्णाटक और उडीसा में राष्ट्रपति शासन की मांग करने को उतारू हमारे मुलायम, पासवान और लालू भी चुप्पी साधे हुए हैं. जबकि कुछ हद तक इस आग को लगाने और यूपी बिहार का सत्यानाश करने में यहाँ भी जिम्मेदार हैं.

बोधिसत्व ने कहा…

भाई स्थितियाँ वाकई खतरनाक रूप लेती जा रही हैं...

Dineshrai Dwivedi दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

जो भ्रूणावस्था में है वह बालक पैदा जरूर होगा। उस की पैदाइश की तैयारी करें।

Farid Khan ने कहा…

"मन भीतर से बहुत क्षुब्ध है.. आप सब भी क्षुब्ध है मैं जानता हूँ.. पार आप में से तमाम मित्र ऐसे भी हैं जो कश्मीर में भीड़ पर गोली चलाने वाली पुलिस का समर्थन करते हैं, बाटला हाउस जैसे एनकाउन्टर को जाइज़ ठहराते हैं, निरीह किसानों के हित के लिए लड़ रहे नक्सलियों के क्रूर दमन की पैरवी करते हैं।"

जब भी किसी दूसरे वर्ग और समुदाय पर दमन होता है ..... हम में ऐसी ही प्रतिक्रिया होती है जैसा आपने लिखा है, क्योंकि हम उस वर्ग और समुदाय से नहीं होते हैं ..... ।
हम स्वयं को सुरक्षित भी महसूस करते हैं।

साध्वी की गिरफ़्तारी ऐसे ही सुरक्षित महसूस करने वालों को एक संकेत है कि अब उनकी बारी है।

Arvind Mishra ने कहा…

मामला जटिल तो है मगर हम तटस्थ भी नही रह सकते .मुझे चिंता इस बात की है कि जल्दी ही कहीं मुम्बई में गैर मराठियों खासकर उत्तर भारतीयों के प्रति हिंसा की देशव्यापी प्रतिक्रया शुरू न हो जाय -और निरपराध बेक़सूर बिचारे मराठ्यों को भी चुन चुन कर निशाना न बनाया जाय -क्या तबतक मौजूदा सरकार कान में तेल डाल कर बैठी रहेगी -यह कांग्रेस तो उत्तर भारत से गयी -हो गया सूपड़ा साफ़ उसका !

डा. अमर कुमार ने कहा…

जय हो.. पंडित जी महाराज, ककहरा का पहला ’अक्षर' तो यही है.. कि पुलिस भाई जिसका नमक खाती है, उसी की रक्षा के लिये है, अब चाहे वह तस्कर अपराधी हो या सत्ताधारी कउनोनाथ ?
इसमें ऎतना बमकने की का बात है ?

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

बात अंततः वहीं आकर रुकती है कि क़ानून और व्यवस्था प्राथमिकता पर क्यों नहीं है? जीवन का सम्मान करना हमें कौन सिखायेगा? गुंडे, हत्यारे और आतंकवादी भी अपराधी हैं और उन्हें सज़ा मिलनी ही चाहिए चाहे वे अपने अपराध को क्षेत्रवाद के नाम से वाजिब ठहराएं चाहे धर्म के नाम पर.

डा. अमर कुमार की बात से सहमत हूँ - मगर सवाल यह उठता है कि यह अंग्रेजी पुलिस हिन्दुस्तानी कब बनाई जायेगी?

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