शनिवार, 25 अक्तूबर 2008

आरे पर गिद्ध-दृष्टि

मुम्बई में साँस लेने के लिए वैसे ही हवा कम पड़ती है और अब शरद पवार साहब के बयान से ऐसा मालूम देता है कि मु्म्बई के फेफड़ों में जो बची-खुची हवा है वो भी निकल जाएगी। पिछले महीने महानन्दा डेअरी के एक समारोह में बोलते हुए पवार साहब ने इशारा किया कि यदि आरे डेअरी मुनाफ़ा नहीं बना पा रही है तो क्यों न महानन्दा ही उसे सम्हाल ले।

उनके इस बयान में निहित खतरों को भाँप कर आरे मिल्क कॉलोनी में काम करने वाले और रहने वाले लोगों ने भारिप बहुजन महासंघ के अन्तर्गत २३ अक्तूबर को एक विरोध प्रदर्शन किया। इस मोर्चे का नेतृत्व डॉ आम्बेडकर के नाती आनन्दराज आम्बेडकर ने किया और आरे के प्रबन्धन को अपनी माँगो का एक ज्ञापन भी दिया। उनकी मुख्य माँग डेअरी के किसी भी प्रकार के निजीकरण पर रोक लगाना है। भारिप बहुजन महासंघ के नेताओं ने अपने-अपने भाषणों में शरद पवार पर ये आरोप लगाया कि वे डेअरी के निजीकरण की आड़ में आरे मिल्क कॉलोनी के विशाल भू-भाग को लैंड माफ़िया के हवाले कर देना चाहते हैं।

आरे मिल्क कॉलोनी के स्थापना आज़ादी के ठीक बाद १९४९ में हुई थी और आज भी इसे देश की सबसे अत्याधुनिक डेअरी में गिना जाता है। लगभग ४००० एकड़ की ज़मीन में फैली इस डेअरी के अन्दर बत्तीस तबेले हैं। डेअरी से जुड़े इन तबेलों के अलावा आरे मिल्क कॉलोनी के प्रांगण में डेअरी, एनीमल हज़बैण्डरी, पोल्ट्री और कृषि से जुड़े तमाम शोध और शिक्षण संस्थान भी मौजूद हैं। यानी ये समझा जा सकता है कि इस संस्था की स्थापना आज़ादी के समय मौजूद राष्ट्र-निर्माण के आदर्श दृष्टिकोण से की गई थी। मगर धीरे-धीरे एक अपराधिक उदासीनता, आलस्य और भ्रष्टाचार के एक दौर ने डेअरी को एक बीमारु अवस्था में धकेल दिया और अब उसे शुद्ध मुनाफ़ाखोरों के हवाले कर देने की बात की जा रही है।

आरे डेअरी को पहले सम्भवतः किसी ऐसी व्यवस्था के तहत चलाया जाता था जिसमें कॉलोनी के भीतर दुहा गया सारा दूध डेअरी को देने की बाध्यता थी। मगर बसन्तदादा पाटिल के मुख्यमंत्रित्व काल में तबेले के प्रबन्धकों को ये छूट दे दी गई कि वे अपने दूध को बाहर भी बेच सकें। जिसके कारण डेअरी घाटे के दलदल में धँसते हुए तबेलों से किराया वसूल करने वाली एक संस्था भर बन कर रह गई है। ये छूट मुक्त बाज़ार के दौर के पहले किस नैतिकता के तहत दी गई, इसके लिए बहुत सोचने की ज़रूरत नहीं है। हमारे देश में चीज़ें भ्रष्टता के जिस तरल रसायन से चलायमान होती हैं वो किसी से छिपा नहीं है।

इस देश में कम ही संस्थाएं ऐसी हैं जो अंग्रेज़ो की बनाई हुई नहीं है, आरे मिल्क कॉलोनी उन में से एक है। लेकिन शरद पवार जैसे लोग पर उसकी जड़ों में माठा डाल चुकने के बाद अब निजीकरण के नाम पर उसे उखाड़ फेंकने का काम कर रहे हैं। किस लिए? ताकि ज़मीन की खरीद-फ़रोख्त के ज़रिये कुछ नोट पैदा किए जा सकें? पर ये धन-पशु सम्पत्ति के लोभ में ऐसे अंधे हुए हैं कि सामने दिख रहे माल के ज़रा आगे गहरी खाई भी उन्हे नहीं दिखती। मीठी नदी का प्रकोप और २००५ की मुम्बई की बाढ़ के बावजूद ये लोग बिना किसी योजना के अन्धाधुन्ध निर्माण को ही विकास का पर्याय मान कर चल रहे हैं और देश को भी ऐसा ही मनवाने पर तुले हुए हैं।

समय-समय पर आरे मिल्क कॉलेनी की ज़मीन को देश के दूसरे ‘विकास-कार्यों’ के लिए दिया जाता रहा है जैसे कि कमालिस्तान फ़िल्म स्टूडियो, फ़ैन्टेसीलैण्ड एन्टरटेनमेंट पार्क, मरोल इन्डस्ट्रियल डेवलेपमेंट कॉर्पोरेशन (एम आई डी सी) और हाल के वर्षों में रॉयल पाल्म्स (गोल्फ़ क्लब, होटॅल और रिहाईशी बिल्डिंग्स)। रॉयल पाल्म्स के बारे में उल्लेखनीय यह है कि पहले शिव सेना ने इस का प्रचण्ड विरोध किया और फिर बाद में स्वयं बाल ठाकरे ने इस का अपने करकमलों से उदघाटन किया।

इन सब के अलावा आरे के केन्द्रीय डेअरी से सटा हुआ एक आरे गार्डेन रेस्टॉरन्ट भी इस कृपा का भागीदार हुआ है जहाँ आठ सौ ‘पार्टी-पशु’ एक साथ आनन्द ले सकते हैं। क्या ये विडम्बनापूर्ण नहीं है कि एक मिल्क डेअरी पहले तो अपने ही तबेलों को दूध बाहर बेचने की आज़ादी देकर घाटा सहन करती है और फिर घाटे को पूरा करने के लिए अपने केन्द्रीय दफ़्तर की नाक के नीचे से शराब बेचने का व्यापार शुरु कर देती है?

आरे मिल्क कॉलोनी के भीतर लगभग आठ-नौ हज़ार परिवारों की रिहाईश है। जिस में से कुछ तो प्राचीनकाल से रहने वाले आदिवासी हैं जिनका अधिकार क्षेत्र उत्तरोत्तर सिमटता ही जा रहा है। उन के अलावा आरे में काम करने वाले कर्मचारियों के परिवार तथा अन्य दूसरे लोग जो अलग-अलग समय पर झोपड़ पट्टियों में बस गए, आरे के अन्दर रहते हैं।

अब इसे चाहे हमारे देश का सह-अस्तित्व का गहरा बोध कह लीजिये या विशेष चारित्रिक भ्रष्ट उदासीनता कि जब तक पानी सर के ऊपर न हो जाय हम एडज़स्ट करते रहते हैं। इसी मानसिकता के तहत हर जगह अवैध रूप से झोपड़े बनाने वालों के प्रति एक उदासीन उपेक्षा का भाव साधा जाता है। और जब वे बरसों की मेहनत के बाद अपने घर और रोज़गार में सहूलियत की स्थिति में आने लगते हैं, उन्हे उखाड़ फेंकने के निहित स्वार्थ उठ खड़े होते हैं।

विदर्भ के हज़ारों किसानों की आत्महत्या की उपेक्षा कर के देश में आई पी एल के उत्सव में अपनी ऊर्जा देने वाले कृषि मंत्री शरद पवार का आरे सम्बन्धित बयान इसी रोशनी में देखा जाना चाहिये जिसके जवाब में भारिप बहुजन महासंघ ने विरोध प्रदर्शन करके अपने अस्तित्व के रक्षा करने की अग्रिम कार्रवाई की है।

इस देश के विकास पुरुषों की अपनी जनता के विकास की कितनी चिन्ता है वो आप इस बात से समझिये कि आरे की इन झोपड़पट्टियों में १९९३ तक पानी की व्यवस्था और १९९८ तक बिजली की व्यवस्था नहीं थी। और ये सुविधा भी तभी सम्भव हो सकी जब शहर पर बढ़ता हुआ आबादी का दबाव के चलते गोरेगाँव में अचानक त्वरित निर्माण में फलीभूत हुआ।

इसके लिए कुछ लोग बाज़ार के शुक्रगुज़ार होंगे और गलत भी नहीं होंगे मगर ऐसे लोग स्वतंत्र बाज़ार के दूसरे पक्ष पर नज़र डालना या तो भूल जाते हैं या उसे जानबूझ कर अनदेखा कर जाते हैं। गोरेगाँव के इस भयानक विकास का नतीजा ये हुआ कि १९९३ के पहले बस्ती वाले पानी की अपनी ज़रूरत के लिए जिस पहाड़ी नदी का इस्तेमाल करते थे वो आज भी गोरेगाँव और आरे के भीतर से होकर समुद्र की ओर बहती है मगर एक बेहद दुर्गन्धपूर्ण गन्दे नाले के रूप में। और मुम्बई की सबसे ऊँची ‘पहाड़ी’ नाम की पहाड़ी धीरे-धीरे काट-काट कर खतम की जा रही है।

भारिप बहुजन महासंघ की एक माँग ये भी है कि उनके पुनर्वास की किसी सूरत में उन्हे आरे के भीतर ही बसाया जाय। जो लोग पिछले पचास बरस से इस जगह के आस-पास से ही अपना रोज़गार करते हों, उनकी तरफ़ से ये माँग बहुत जायज़ है। और बहुत सम्भव है कि डेअरी का निजीकरण हो जाय और धीरे-धीरे आरे कॉलोनी की ज़मीन स्क्वायर मीटर की दर से बिकने के लिए उपलब्ध भी हो जाय। ऐसी सूरत में आरे के निवासियों को भीतर के किसी एक कोने में बसा देना घाटे का सौदा नहीं होगा।


मगर आरे सिर्फ़ एक मानवीय मामला नहीं है। एक बार अगर आप मुम्बई के नक्शे पर नज़र डालें तो आप को आरे का महत्व अपने आप समझ आ जाएगा। सजंय गाँधी नेशनल पार्क, फ़िल्म सिटी और आरे मिलकर एक ग्रीन ज़ोन का निर्माण करते हैं। वैसे ये अलग-अलग नाम भले हों पर ये उस विशाल जंगल के विभाजित क्षेत्र हैं जिसके भीतर मुम्बई को जल आपूर्ति करने वाली तीन झीलें-तुलसी,विहार और पवई- भी आती हैं। ये विभाजन आदमी ने किए हैं और इनके बीच कोई वास्तविक विभाजन नहीं है।

मनुष्य की आर्थिक गतिविधि से अलग आरे के इस विशाल कॉलोनी के प्रांगण में हज़ारों वृक्ष, बरसाती पौधे, जंगली पेड़ और लताएं भी आश्रय पाती हैं और एक ऐसे आकर्षक पर्यावरण का निर्माण करते हैं जिसमें तमाम अनोखे पंछी पूर्णकालिक या शीतकालिक निवास पाते हैं। इन पंछियों में से कुछ पीलक (गोल्डेन ओरियल) और दूधराज (एशियन पैराडाइज़ बर्ड, देखें चित्र) जैसे बेहद अद्भुत और अनूठे भी हैं। जिन्हे हाल के दिनों में अपने इतने पास पाकर चकित सा होता रहा हूँ।


मगर विकास के अंधाधुंध कंक्रीटीकरण के खतरे की ज़द में सिर्फ़ पंछी नहीं आएंगे, मानव समाज भी उसकी चपेट में आएगा। प्रकृति के नियम माफ़िया संसार से कुछ अलग नहीं होते। सत्या का एक डायलाग याद कीजिये.. एक गया तो सब जाएंगे। पर्यावरण में सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ है.. एक पत्थर हटायेंगे तो पूरी इमारत धराशायी हो जाएगी... हो रही है।


वैसे आरे मिल्क कॉलोनी को लेकर पिछले दिनों एक और योजना की चर्चा उठी थी- आरे के भीतर एक ज़ूलॉजिकल पार्क(ज़ू) बनाने की योजना। आरे को लैण्ड माफ़िया के हवाले करने से निश्चित ही ये एक बेहतर योजना है मगर मेरा डर है कि ये योजना सिर्फ़ पर्यावरण लॉबी का मुँह बन्द करने के लिए लटकाई जा रही है। क्योंकि इसका प्रस्तावित क्षेत्र सिर्फ़ ४०० एकड़ है.. यानी कि बाकी का ३६०० एकड़ नोचने के लिए मुक्त रहेगा। वैसे आप ही बताइये कि आप पंछियों को पिंजड़े में बन्द देखना पसन्द करते हैं या मुक्त फुदकते हुए?

मेरे लेखन में निराशा का खेदपूर्ण पुट है.. फिर भी उम्मीद करता हूँ कि आरे का भविष्य मेरे डरों से बेहतर होगा। तथास्तु!

12 टिप्‍पणियां:

अब सुबह नहीं आने वाली ने कहा…

अगर शरद पवार ने तय कर लिया है तो कौन रोक सकता है? तथास्तु कहिये लेकिन उम्मीद मत कीजिये.

गोरेगांव में गोकुलधाम का इतिहास जानने की कोशिश कीजियेगा कि इसमें शरदपवार की कैसी भूमिका रही थी! किस तरह से ये जमीनें हड़पी गयीं थीं!

निराश में भी हूं! एकदम निरुपाय निस्सहाय टेसू के मानिन्द इनका महाभारत देखता रहता हूं.

अफ़लातून ने कहा…

शरद पवार की करतूतें बता कर अत्यन्त उचित काम किया । बहुजन महासंघ के शांताराम पंदेरे मिलें तो हमारी और स्वातिजी की याद कहिएगा ।

Udan Tashtari ने कहा…

भ्र्ष्ट नेता, भ्रष्ट तंत्र-ये सब मटिया मेट करके ही दम लेंगे. आरे की जमीन पर तो कब से ये नजर गडाये बैठे हैं. आपका अलेख आवश्यक है एवं सार्थक है. मिडिया को इस लड़ाई में आगे आना चाहिये.

आपको एवं आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कहा…

शर्मनाक और दुःखद :(

सुमन्त मिश्र ‘कात्यायन’ ने कहा…

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे,
यही हमारा नारा है।
भारतवर्ष हमारा है,
महाराष्ट्र सबसे न्यारा है।
मी मराठी मानुष,
मी मुम्बईकर।
तेरे को क्या लेने का बिडू?

vimal verma ने कहा…

बहुत महत्वपूर्ण जानकारी दी है आपने....कितनी बार तो गुज़रा हूँ आरे के बीच से पर अब बहुत सी बातें आपकी वजह से पता चलीं...अब नेता अगर बेचने पर आ जाय तो वो कुछ भी बेच सकता..जब भी आरे की हरियाली से गुज़रता हूँ..मन को भी हरा भरा कर देती है...आरे पर किसी की नज़र न लगे..अगर लगे तो नज़र को मोड़ देने की ताक़त खुद आरे वालों को पैदा करना होगा।

Vivek Gupta ने कहा…

बहुत सुंदर लिखा है| दीपावली की हार्दिक बधाईयाँ और शुभकामनाये |

बोधिसत्व ने कहा…

मैं तो इस बात पर हैरान हूँ कि इतने बड़े स्वर्ण खंड का पवार साहब अब तक कैसे भूले रहे....मैं एक बात और दावे से कह सकता हूँ कि मीडिया मैंनेजमेंट जितना अच्छा पवार साहब का है और किसी नेता का शायद ही हो...हो हिम्मत किसी न्यूज चैनल के पत्रकार में तो पवार साहब के ईस खेल के खिलाफ एक खबर चला कर दिखा दे...

मिहिरभोज ने कहा…

क्यों न एक अभियान चलायें ब्लोग के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का ..आप आगे चलें हम सब आप के साथ ह क्यों कि यदि ऐसा हुआ तो बहुत ही दुःखद होगा ...मैने देखा है उस हरे भरे संसार को

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

पैसा, लालच, सत्ता-लोलुपता - क्या ये नेता इससे ऊपर उठ सकते हैं कभी?
दीपावली पर्व और नए संवत्सर के लिए बधाई!

अशोक पाण्डेय ने कहा…

****** परिजनों व सभी इष्ट-मित्रों समेत आपको प्रकाश पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। मां लक्ष्‍मी से प्रार्थना होनी चाहिए कि हिन्‍दी पर भी कुछ कृपा करें.. इसकी गुलामी दूर हो.. यह स्‍वाधीन बने, सश‍क्‍त बने.. तब शायद हिन्‍दी चिट्ठे भी आय का माध्‍यम बन सकें.. :) ******

जितेन्द्र दवे ने कहा…

जब महाराष्ट्र के लाखो किसानो की आत्महत्या को यह काबिल कृषि मंत्री चुप चाप देखते रहे तो आरे को बचने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं. कुछ समय पहले इन्ही की पार्टी के राजस्व मंत्री गणेश नायक ने भी आरे कोलोनी और महालक्ष्मी रेसकोर्स की जमीन बेचने की बात की थी. भाई इनको तो अपनी रोकडी की पडी है. मुम्बई में साफ़ हवा के लिए हरियाली के एक दो ही ऐसे टापू बचे हैं. इन पर भी इन पर भी सरकार की काली नजर पडी है. हैरत की बात है कि हमारे मीडिया ने अभी तक इस खबर को नहीं बताया. भारिप ने सही काम किया है...शायद उसकी सुनवाई हो.

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