सोमवार, 30 जून 2008

अगली बार कहीं और मिला जाय!

आजकल के शहरी बच्चे मैक्डोनाल्ड्स के बर्गर के प्रति इस तरह समर्पित होते हैं जैसे हमारे समय के बच्चे कैथे और चूरन के प्रति लालायित रहते थे। निश्चित ही चूरन और कैथा उन बच्चो के लिए कोई बाल जीवन घुट्टी नहीं था और मैक्डोनाल्ड्स के बर्गर्स और फ़्रेन्च फ़्राईस भी आज के बच्चे के लिए वाईटेमिन्स की गोलियाँ नहीं हैं। फ़्री मार्केट की पक्षधर हमारी सरकार इस ‘स्वादिष्ट’ सत्य के प्रति आँख मूँदे पड़ी है जो हमारे लोगों के स्वास्थ्य में लगातार सेंध लगा रहा है।

इसी मसले पर एक अमरीकी नागरिक ने एक फ़िल्म का निर्माण किया- सुपरसाइज़ मी! यह नाम मैक्डोनाल्ड्स के सुपरसाइज़ बरगर्स से प्रेरित है जिसे पहली बार खाकर फ़िल्म के नायक और निर्माता-निर्देशक मॉर्गन स्परलॉक उलटी कर देते हैं। वो बात अलग है कि शीघ्र ही उनका शरीर इस मात्रा के लिए लचीला रुख अख्तियार कर लेता है। और फिर उन तीस दिनों में उनके शरीर की क्या दुर्दशा होती है जिस दौरान वे सिर्फ़ और सिर्फ़ मैक्डोनाल्ड्स के आउटलेट्स से मिलने वाली सामग्री से ही अपनी शरीर की खाद्य आपूर्ति कर रहे थे इसे आप फ़िल्म देखकर यहाँ से जानिये। यहाँ पर आप कई दूसरी डॉक्यूमेन्टरीज़ भी देख सकते हैं।

इस फ़िल्म की खबर मुझे भाई अफ़लातून से हुई जब वे अपनी पत्नी स्वाति जी समेत मुम्बई पधारे। वे दोनों गुजरात के एक प्राकृतिक स्पा से स्वास्थ्यलाभ कर के लौट रहे थे। आठ दिन की उस अवधि में उन दोनों का वजन साढ़े पाँच किलो कम हो गया। इसी सन्दर्भ में इस फ़िल्म का भी ज़िक्र आया। मित्रों को याद होगा कि पिछले दिनों अफ़लातून भाई की तबियत कुछ नासाज़ थी।

अफ़लातून जी के साक्षात दर्शन हम सब ने पहले दफ़े गोरेगाँव पूर्व के जावा ग्राइण्ड कैफ़े में तारीख २२ जून को किये। इस अवसर पर अनिल रघुराज, प्रमोद सिंह, विमल वर्मा, बोधिसत्व, शशि सिंह, हर्षवर्धन, और विकास मौजूद थे। और मैं तो था ही। लगभग चार घण्टे तक चली इस मुलाक़ात में तमाम आर्थिक, राजनैतिक और ब्लॉगिक मुद्दो पर खूब विचार-विमर्श हुआ। अफ़लातून भाई तो अपने फ़ितरत के अनुसार मजमा लगाने लग पड़े ही थे मगर स्वाति जी उन्हे खींच के ले गईं।

स्वाति जी जिन से हमारा अन्तजालीय परिचय भी नहीं था.. उनसे मिलना भी हमारे लिए एक ‘स्टिमुलेटिंग एक्सपीरिंयस’ रहा और वे भी हमसे मिलकर ‘बोर’ नहीं हुई जैसा कि उन्हे अन्देशा था। तस्वीरें शशि सिंह ने खींची और पी गई कॉफ़ियों का आधा बिल विकास ने भरा जिनकी जेब नई नौकरी की पगार से गर्म थी।




अफ़लातून भाई के सम्मान में हम इकट्ठा हुए और इसी बहाने हम सब की बड़े दिनों बाद एक दूसरे से भी मुलाक़ात हुई, वरना कहाँ मिलना हो पाता है। इस मुलाक़ात का ढीला पहलू सिर्फ़ मिलन-स्थल जावा ग्राइण्ड ही रहा जो अपने संगीत से हमें थकाता रहा और उसी माहौल से हमें दबाता रहा जिसकी चर्चा हम सारे समय करते रहे! तय हुआ कि अगली दफ़े कहीं और मिला जाय।

परेशानी की बात यही है कि बाज़ार ने सारी सार्वजनिक जगहों पर क़ब्ज़ा कर लिया है (यहाँ तक कि बचे-खुचे सार्वजनिक पार्कों को भी निजी हाथों में धकेला जा रहा है) और उन्हे ऐसी जगहों मे तब्दील कर दिया है जो आप के मन-मानस को सिर्फ़ एक उपभोक्ता के बौने स्वरूप में सीमित कर देते हैं।

मैक्डोनाल्ड्स की बड़ी सफ़लता के पीछे एक राज़ यह भी है बच्चों के खेलने के मैदान शहरों में से बिला गए हैं और मैक्डोनाल्ड्स के प्रांगण में फ़्री प्ले-स्टेशन्स उग आए हैं। ये हाल अमरीका का है जहाँ की आधी से ज़्यादा आबादी इन्ही प्लेस्टेशन्स की छाया में ओवरवेट या ओबीस हो चुकी है और हमारे दलाल नेता और मक्कार अफ़रशाहों की बेईमानी के चलते यही हाल हिन्दुस्तान का भी होने जा रहा है।

अच्छा नज़ारा होगा.. एक तरफ़ गाँवों में किसान अपने गले में रस्सी कस रहा होगा और शहरों का मध्यवर्ग कमर की पेटी ढीली पर ढीली कर रहा होगा!

11 टिप्‍पणियां:

maithily ने कहा…

सुपरसाइज मी के बारे में मैंने भी अफलातून जी की पोस्ट में पढ़ा था और मजे से देखा. फिल्म लम्बाई में बड़ी जरूर थी मगर बहुत अच्छी लगी.

आपकी चिन्ता में नैराश्य छलक रहा है. कुछ तो रास्ता ज़रूर निकलेगा, ज़रूर ज़रूर् निकलेगा.

अभिषेक ओझा ने कहा…

"एक तरफ़ गाँवों में किसान अपने गले में रस्सी कस रहा होगा और शहरों का मध्यवर्ग कमर की पेटी ढीली पर ढीली कर रहा होगा!"

ये नज़ारा दिखना तो चालु हो गया है.

Udan Tashtari ने कहा…

सभी मित्रों से चित्र के माध्यम से पुनः मिलना बड़ा सुखकर रहा. बहुत आभार इस पोस्ट के लिए.

अशोक पाण्डेय ने कहा…

अभिषेक जी की बात से सहमत। यह नजारा दिखना चालू भी हो गया है।

Swati ने कहा…

आपका पोस्ट पढा़। बहुत मज़ा आया।मगर हम लोग जिस सीधी-सादी जगह से आ रहे थे, उसे 'स्पा' की संज्ञा मिलने पर हंसी भी आयी :-)!
ब्लॉग लेखन के बारे में, ब्लॉगरों के बीच अपनी बात रख्नने का आनन्द भी आया। बहस-मुबाहिसा हर वक्त एक अन्जाम तक पहुंचे ज़रूरी नहीं,मगर उस दिन ऐसा हुआ।

बोधिसत्व ने कहा…

yahin ham fursatiya sukul se bhi mile the.....us mulakat ki yad aayi...aflatoon ji se milana achcha raha tha....aap ne us mulakat ki bat likh kar accha kiya

डा० अमर कुमार ने कहा…

यह चिन्ता ज़ायज़ है, जी !

अनूप शुक्ल ने कहा…

सही है। ये मिलन-कथा आधी-अधूरी ही सही लिखी तो सही। आज न दिखती तो हम लिखने वाले थे सब कथा पुराण। :)

Rajesh Roshan ने कहा…

चित्रों के लिए धन्यवाद... बड़े अच्छे चित्र हैं....
यह सब कुछ होने के बावजूद... चिडिया चहचहाती रहेगी, बच्चे स्कूल जाते वक्त मुस्कुराते रहेंगे.. नदियों की आवाज हमेशा कल-कल ही करेगी....

ब्‍लॉग ब्‍ला... ब्‍ला... ब्‍ला... ने कहा…

अबे ... राजेश रोशन, कुछ पता भी है? सब कुछ होने के बावजूद चिडिया कैसे चहचहाती रहेगी, बच्चे क्‍यों स्कूल जाते वक्त मुस्कुराते रहेंगे.. नदियों की आवाज कैसे हमेशा कल-कल ही करेगी... पूरी दुनिया में पर्यावरण आंदोलन की कुछ ख़बर ले लो भाई।

आभा ने कहा…

इस पोस्ट का इन्तजार था कि क्या कुछ बातें हुई, और फोटू भी .... अगली बार कहा मिला जाय और हा वही जहाँ मै भी पहुँच सकूं ,शायद ।

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