रविवार, 29 जून 2008

कश्मीरी घड़ी की अटकी सुईयाँ


कश्मीर में पीडीपी ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। वैसे तो तीन महीने बाद यूँ भी चुनाव होने ही थे मगर जिन हालात में ये कदम उठाया गया है वह बेहद शर्मनाक है। कहा जा रहा है कि नब्बे के उबलते हुए दिनो के बाद से कश्मीर घाटी की ये सबसे बुरी दशा है।

सारा मामला तब शुरु हुआ जब सरकार ने वन-विभाग की भूमि को अमरनाथ धाम के बढ़ते तीर्थ यात्रियों की सुविधा के लिए आवंटित कर दिया ताकि उनके रहने आदि का अस्थायी इंतज़ाम हो सके। भयानक विस्मृति के इस दौर में भी मुझे याद है कि अभी कुछ रोज़ पहले ही अमरनाथ यात्रियों की अप्रत्याशित भीड़ में दुर्घटनाओं के चलते यात्रा में बाधाएं उपस्थित हो गई थी और अव्यवस्था फैल गई थी। शायद ऐसी ही किसी अव्यवस्था से निजात पाने के लिए कश्मीर की राज्य सरकार ने ये फ़ैसला किया होगा।

शीघ्र ही पर्यावरण के सजग प्रहरियों ने इस फ़ैसले का विरोध किया जिस से ये मामला आम रौशनी में आ गया और पलक झपकते ही कश्मीर के नौजवान सड़को पर उतर आए और इस फ़ैसले को वापस लेने की माँग करने लगे। उनका आरोप है कि ये असल में एक साज़िश है कश्मीर में हिन्दुओं को बसा कर मुसलमानों को अल्पसंख्यक तबक़े में बदल देने की।

जब मैंने पहले ये खबर सुनी तो मैं इस आरोप की मूर्खता से सन्न रह गया। और कश्मीर के नौजवानों के मानसिक क्षमता का सोचकर एक बार फिर सन्न रह गया। आज भी कश्मीरियों की आय का मुख्य स्रोत पर्यटन ही है और वे उसी स्रोत की जड़ में माठा डाल रहे हैं।

मैं नहीं जानता कि हुर्रियत का इस बेसिरपैर के चिंतन में कितना योगदान है पर वो इस मामले को पूरी तरह से भुनाने में लगी हुई है। परिपक्व राजनेता की छवि रखने वाले मीरवाइज़ उमर फ़ारुख कल टीवी पर इस फ़ैसले की वापसी की माँग करते दिखे.. पर एक लफ़्ज़ भी अपनी जनता की मूर्खतापूर्ण सोच का धुआँ छाँटने में ज़ाया उन्होने नहीं किया।

पीडीपी के राजनैतिक अवसरवादिता पर मुझे कोई शक़ नहीं था। कश्मीर मंत्रिमण्डल के भूमि-आवंटन के इस फ़ैसले पर पीडीपी के भी मंत्रियों के दस्तखत थे और अब उन्होने ही सरकार से समर्थन वापस ले लिया है। एक ऐसे आदमी की पार्टी से आप उम्मीद ही क्या कर सकते थे जो सक्रिय राजनीति से लगभग सन्यास ले चुकने के बाद अचानक सत्तालोभ में अपनी बेटी को पीछे धकेल कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर चढ़ जाता है।

आज जबकि बाक़ी दुनिया पर्यावरण के गहराते संकट के प्रति जाग रही है कश्मीर की अवाम एक वन-संरक्षण के मुद्दे को भी साम्प्रदायिक रंग में रंग कर अपनी हुर्रियत उसमें खंगाल रही है। कश्मीर का अध्याय एक के बाद एक न जाने कितनी ही भयानक भूलों के दुखद पन्नो से भरा हुआ है।

मेरे कश्मीरी पंडित मित्र बताते हैं कि नवासी-नब्बे के सालों में घाटी में पन्डितों को मार देने की और उनकी औरतों को रख लेने की धमकियों का बाज़ार गर्म था। पण्डित वहाँ से अपना घर छोड़कर तभी भागे जब वाक़ई हत्याओं का सिलसिला चल पड़ा।

तब कश्मीर को हिन्दुओं से खाली कर देने का उत्साह था और आज कश्मीर में हिन्दुओं के भर जाने का भय। दोनों ही भाव शुद्ध साम्प्रदायिक हैं.. मानो उन्हे आज़ादी हिन्दुस्तान से नहीं हिन्दुओं से चाहिये हो! इसी साम्प्रदायिकता के चलते कश्मीर के हुर्रियत आन्दोलन को भारतीय मुसलमान से कभी रत्ती भर भी समर्थन नहीं मिला और न मिलने की उम्मीद है।

ऐसा लगता है जैसे कश्मीर सन ४७ के भयानक साम्प्रदायिक हादसों से कभी उबरा ही नहीं। पूरी दुनिया कहाँ से कहाँ जाती जा रही है.. पर कश्मीर उसी बँटवारे के उलझाव में फँसा पड़ा है। जैसे कश्मीर में घड़ियों को लकवा मार गया हो।

आज फिर कश्मीर की सड़कों पर पाकिस्तान-पाकिस्तान के नारे लग रहे हैं और हम उन्हे टीवी पर देखकर कुढ़ रहे हैं। वे लोग जो हमारे साथ हमारे देश का हिस्सा होना ही नहीं चाहते उन्हे ज़बरदस्ती अपने साथ घसीटने का ‘सुख’ झेल रहे हैं।

मैं तो कहता हूँ दे दो इन लोगों को पाकिस्तान.. ऐसे लोगों को अपने साथ रखने का लाभ ही क्या। मगर मैं कौन हूँ और मेरी कौन सुनता है। ये राज्यसत्ता का अधिकारक्षेत्र है- और राज्यसत्ता के लिए लोग नहीं राज्य और सत्ता महत्वपूर्ण होते हैं।

2 टिप्‍पणियां:

Gyandutt Pandey ने कहा…

इस मुद्दे को तूल देने की जरूरत नहीं है। सरकार और पीडीपी गेम खेल रहे है। वन विभाग की जमीन मन्दिर बोर्ड से वापस होगी - तय है। कोई पहाड़ नहीं टूट रहा। इस्लमिक प्रपंचवाद से कोई पंगा नहीं लेगा। सरकार हिन्दुओं की हिफाजत की गारण्टी देगी। उस गारण्टी की क्या वैल्यू है - वह घाटी से विस्थापितों से पूछा जाये।
बाकी दोनो पार्टियां मलाई कटेंगी!

अशोक पाण्डेय ने कहा…

बिल्‍कुल ठीक। जो हिन्‍दुस्‍तान में रहना ही नहीं चाहते, उन्‍हें जबरिया क्‍यों रखा जाये। लेकिन तब भी समस्‍या लाइलाज ही रहेगी, क्‍योंकि तुष्‍टीकरण से वोट बैंक बनानेवाले लोग वहां से आनेवाले घुसपैठियों को बसाना शुरू कर देंगे।

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