बुधवार, 23 अप्रैल 2008

जूजू..

बचपन में आप ने भी कभी जूजू का पीछा किया होगा शायद.. जो कभी हाथ नहीं आता है। जितना आप उसके पीछे भागिए वो उतना ही फ़िसलता जाता है। लगभग असम्भव सा होता है इस जूजू को पकड़ना। क्योंकि उसे पकड़ने के लिए जैसे आप हवा को चीरते हुए अपने हाथों को आगे बढ़ाते हैं और वैसे ही हवा में पैदा हुआ यह संवेग जूजू को और आगे फेंक देता है। सच में हवा से भी हलके होते हैं ये जूजू..!

बचपन में कभी नहीं समझा कि होते क्या हैं जूजू.. ? हाँ ये पता था कि मदार/आक की झाड़ी के सुन्दर सफ़ेद फूल पककर बड़ी सी हरी गुझिया जैसे फल में बदलकर एक दिन फूट जाते हैं तो उस में से ये रूई के फाहे सब ओर उड़ने लगते हैं। तब मन को बड़ा लुभाते तो थे ये यहाँ-वहाँ उड़ते हुए जूजू मगर एक पेड़ के बतौर मदार का कोई औचित्य समझ नहीं आता था। बताइये बाकी सभी पेड़ ऐसे फल देते हैं जिनको आदमी खा-पी सकता है मगर ये कैसा फल है जिसके बारे में उलटा कहा जाता है कि ज़हरीला है.. !

पर कुछ और पढ़ने लिखने और डेविड एटनबरो की कुछ डॉक्यूमेन्टरी देखने के बाद समझ आया कि प्रकृति में मदार का भी उतना ही महत्व है जितना किसी दूसरे पेड़-पौधे का। आखिर सभी अपने बीज का प्रसार ही तो कर रहे हैं। मामला बस इतना है कि एक जगह पर जड़ जमाए बैठे खुद चलकर दूर-दूर तक अपने बीज नहीं फेंक नहीं सकते तो तरह तरह की तरक़ीबें निकालते हैं।

अपने बीज के साथे कुछ ऐसी लुभावना माल लपेट देते हैं जो जानवरों (आदमी समेत) के लिए आकर्षक हो। वे बीज को तोड़ें, आकर्षक लुभावने गूदे को खाएं, और चलते-चलते कहीं दूर निकल जाकर बची हुए बेकार चीज़ यानी बीज को यहाँ-वहाँ की ज़मीन पर फेंक दे या बीज को भी अगर खा गए तो पेट के रास्ते होते हे मल रूपी खाद समेत भूमि पर पहुँच जाए। ऐसा आम तौर पर उन बीजो के साथ होता है जो एक फल के भीतर सैकड़ों की संख्या में होते हैं। यदि एक फल में एक बीज होता है तो अक्सर वो अखाद्य होता है।

पर मदार ने यह तरक़ीब नहीं अपनाई। उसने अपने पुनुरुत्पादन के लिए/ प्रसार के लिए जानवरों का सहारा नहीं लिया। उसने अपने बीजों को पंख दे दिये। बीज बनाने की प्रक्रिया पूरी हो जाने पर फल फट जाता है सारे बीज हवा के साथ उड़ चलते हैं.. जहाँ अनुकूल वातावरण मिल जाएगा.. जड़ जमा लेगा ।
इस उड़ते हुए बीज का कितना गहरा मक़सद है.. मैं सोच कर हैरान हूँ। पर अकसर मैं एक आदमी की तरह अपने मक़सद को लेकर भी गहरी तौर पर उलझा रहता हूँ.. कि इस दुनिया में मेरा क्या मक़सद है। आप ने भी ज़रूर कभी सोचा होगा इस बारे में?


नीचे की तस्वीर में पुणे की व्यस्त सड़क के किनारे सुस्ताता मदार के बीजों का एक दल।

8 टिप्‍पणियां:

अनिल रघुराज ने कहा…

आखिरी सवाल का कोई सुसंगत उत्तर अभी तक नहीं समझ पाया हूं। वैसे, इस जूजू को हम लोग गांव में बुढिया के बाल कहा करते थे, उस बुढिया के जो चांद पर बैठकर चरखा काट रही है।

anitakumar ने कहा…

मदार के बीज और खुद का मकसद, वाकई सोचने वाली बात है।

सायमा रहमान ने कहा…

हम तो बस जीजू को जानते है.

vimal verma ने कहा…

हम तो बचपन में इस जूजू के पीछे बहुत भागा करते थे,बचपन में सुना था मदार का दूध आँख में पड़ जाय तो आँख फूट जाती है,और किसी पके फोड़े में दवा के काम आता है...पर आपने जानकारी बढिया दी है....ये सायमा रहमान को इसी बहाने अपने जीजू की याद आ गई...जूजू का कुछ और नाम नहीं है क्या?

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

ha.n hame pata hai, ise pakar kar ulti hatheli par rakh ke, fir a.nkh banda kar ke udane se hamlog achchhe no. se pass ho jate the.

बोधिसत्व ने कहा…

बचपन की याद दिला दी आपने ......

ab inconvenienti ने कहा…

ha ha........आज भी छोटे बच्चे इसके पीछे भागते हैं

अनूप शुक्ल ने कहा…

जीवन का मकसद समझना लफ़ड़े का काम है। अच्छा है।

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