शनिवार, 5 अप्रैल 2008

खुदा के लिए!

पाकिस्तानी फ़िल्म खुदा के लिए एक आम मुसलमान की ज़ेहनियत को समझने के लिए बड़ी मौज़ूँ फ़िल्म है। असल में खुदा के लिए ९/११ के साथ/बाद खड़ी हुई परेशानियों की एक बेबाक तस्वीर होने के अलावा इस्लाम के प्रति उन कई भ्रांतियों के खिलाफ़ दलील भी है जिनसे ग़ैर-मुसलमान ही नहीं खुद मुसलमान भी ग्रस्त हैं।

जैसे कि एक आम मान्यता है कि इस्लाम में मौसिकी हराम है। माना जाता है कि अच्छे मुसलमान का एक खास हुलिया है और इसी तरह इस्लाम में मौजूद औरतों के हक़ को लेकर तमाम तरह की ग़लतफ़हमियाँ हैं। 'खुदा के लिए' में एक शेख़ साहब पूरी फ़िल्म भर ऐसे बयान बखारते रहते हैं मगर आखिर में इन शेख़ साहिब की सारी दलाइल को एक ज़हीन आलिम (नसीर भाई) धराशायी कर देते हैं और यह स्थापित करते हैं कि न तो इस्लाम में मौसिकी हराम है, न मुसलमान का एक खास हुलिया है और न ही इस्लाम औरतों को दबाने की वक़ालत करता है।

हर लिहाज़ से 'खुदा के लिए' अपने कथ्य में एक बहुत मजबूत फ़िल्म है जो लगभग ढाई घंटे तक अपने दर्शक को बाँधे रखती है, खराब पिक्चर क्वालिटी (सम्भवत: डीवीडी या १६एम एम का ब्लोअप किया बुरा प्रिंट), घटिया साउण्डट्रैक और ऊटपटांग एडीटिंग के बावजूद। गाने अलबत्ता बुरे नहीं है पर ज़्यादातर अभिनेताओं का अभिनय काफ़ी बचकाना है।

एक गौर करने लायक बात ये भी है कि फ़िल्म के दो नायकों के नाम मंसूर और सरमद हैं (जो कि कट्टरपंथियों के हाथों शहीद हो जाने वाले दो नामचीं सूफ़ी थे)। साफ़ तौर पर 'खुदा के लिए' भी कट्टरपंथी सोच के खिलाफ़ एक चुनौती है। मगर अपनी सारी खूबियों के बावजूद इस फ़िल्म की एक सीमा भी है जिन्हे मैं इस की कमी के तौर पर हरगिज़ नहीं लिख रहा सिर्फ़ सीमा- वो ये कि फ़िल्म का सारा ताना-बाना इस्लाम की व्याख्या के भीतर ही है। ग़लत व्याख्या के बरक्स सही व्याख्या।


यही बात फ़िल्म के अंत में भी मुखर हो कर निकल आती है जब फ़िल्म का नायक सरमद जींस और बेसबॉल कैप पहन कर मस्जिद में जाकर अज़ान देता है, यानी एक तरह से अपने दीन पर अपनी व्याख्या के साथ दावा पेश करता है। मतलब ये है कि मज़हबी चिंतन का सारा ज़िम्मा कट्टरपंथियो के लिए छोड़ना मुसीबत से हाथ धोना नहीं उसे और उलझाना है। और शायद यह ग़लत भी नहीं है।

हमारे देश में प्रगतिशील चिंतको ने धार्मिक व्याख्याओं का सारा दायित्व ‘साधु-संतो’ पर छोड़कर ऐसी ही ग़लती की है। रामचरितमानस और श्रीमदभागवत पढ़ने वालों को बजरंगी और साम्प्रदायिक घोषित कर देने वाले एक हैं? ढेर के ढेर हैं। जो लोग अपनी परम्परा से परिचित नहीं वो अपने समाज का क्या भला कर सकेंगे मेरी समझ से परे है?

6 टिप्‍पणियां:

मनोजय ने कहा…

कहते हे यह बुद्धिवादियों के लिए बनाई गई फिल्म है. आपका क्या मत है?

अफ़लातून ने कहा…

आपकी समीक्षा पढ़ लेने के बाद , खोज कर देखनी होगी ।

बोधिसत्व ने कहा…

kal parson men dekhne ki yojna hai.....

आशीष ने कहा…

वाकई शानदार मूवी है, संगीत को गजब का है

Tarun ने कहा…

sameksha ke liye dhanyvaad Abhayji, Ab ye film dekhni to paregi hi, dekhen yehan kab milti hai.

आभा ने कहा…

समीछा पढ ली , अब देखने की इच्छा भी है ,बोधि की योजना मे शामिल हो लेती हूँ।

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