सोमवार, 19 फ़रवरी 2007

कलाकार who??!!

तुलसीदास ने लिखा है वो अपने ही सुख के लिये लिख रहे हैं... स्वांतः सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा भाषा निबन्धमतिमञ्जुलमातनोति।

भक्ति काल के सारे कवि इस आदर्श का पालन करते रहे मगर रीतिकाल मे आकर कविता सामन्तो को गुदगुदाने और बदले मे पुरुस्कार पाने का अच्छा रोज़गार बनने लगी थी.. १८५७ के बाद अंग्रेज़ो के खिलाफ़ एक व्यापक गोलबन्दी के चलते कलाकार को एक नये आदर्श के दर्शन हुये और रीतिकाल के कवियों कि दुकान बन्द हो गयी। आज़ादी के कुछ साल बाद तक आदर्शों का खुमार छाया रहा...वामपंथियो ने पूरी आज़ादी की लड़ाई के लिये समाज मे जागृति का नारा दिया मगर बाज़ार की ऐसी आंधी आई कि उन्ही के पांव उखड़ गये... ममता बनर्जी उनसे ज़्यादा रैडिकल होने की धमकी दे रही है।

तो आज के समाज मे कलाकार होने का मतलब क्या है.. कला का जीवन के साथ अटूट सम्बन्ध है.. जिये हुये का भोगे हुये का अवशेष, उच्छिष्ट कला के हिस्से मे आता है.. ये लिखने का अर्थ ये नही कि कला कूड़ा कर्कट है.. कहने का मतलब सिर्फ़ इतना है.. कि जीवन कला से कहीं ज़्यादा विराट है.. कहीं ज़्यादा सूक्ष्म है...जब तक जीवन है तब तक कला होती रहेगी.. कला का प्रवाह रुक भी सकता है.. तब जब कि आदमी को जीवन जीने से फ़ुरसत ही न मिले.. और इतना मैला भी हो सकता है कि उसमे से जीवन की झलक ही लुप्त हो जाये.. संकट की बात ये है कि ऐसा हो रहा है.. बाज़ार ने हमारे सामने जीवन जीने की ऐसी शर्ते रख दी हैं कि हम जीते जाते हैं.. भोगते ही जाते हैं.. अनवरत.. इतना कि सांस लेने की भी फ़ुरसत नही मिलती...अतः आम आदमी के लिये कलाकार होने की सम्भावना क्षीणतर होती जा रही है.. बच गये वो अभागे जो बचपन मे सम्वेदनशील का तमगा पहनकर बड़े हुये हैं.. और जिन्होने ने रोटी कमाने के तुच्छ तरीको को लात मार दी थी... आज के समाज मे इन कलाकारों की क्या दशा है...? मेरे आस पास तो इन बेचारो को(मैं भी इनमे से एक हूं) बाज़ार ने नून तेल लकड़ी के प्राचीन झमेले मे फंसा कर बाज़ार का एक पुर्ज़ा बना डाला है.. ये कला बेचते हैं...एम एफ़ हुसैन से लेकर जावेद अखतर तक और शुभा मुदगल से लेकर मृणाल पाण्डे तक.. हम जैसे छुटभैयो की तो बात ही क्या है... और कला की प्रेरणा के लिये दूसरो के काम से चोरी को इन्सपिरेशन का मुलम्मा पहनाते हैं। कुछ ऐसे भी वीर हैं जो इस चोरी की सीना ठोक कर वकालत भी करते हैं। समाज के लिये तो कला दूर की बात है.. स्वान्तः सुखाय भी असम्भव हो चली है।

और हिन्दी साहित्य की दुनिया के कवि... आदर्शों के अभाव मे पुरुस्कारों के लोभ में रीतिकालीन होते जा रहे हैं... वो भी क्या करेंगे बेचारे.. उनका दोष नही.. हमारे समय का है... बेचारा कवि किस आदर्श के लिये लिखे.. आदर्श तो मुक्तिबोध के समय मे ही बेच खाये गये थे..

जम गये, जाम हुये, फंस गये,
अपने ही कीचड़ मे धंस गये!!
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में
आदर्श खा गये!
अब तक क्या किया
जीवन क्या जिया
ज़्यादा लिया और दिया बहुत बहुत कम
मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम...

विडम्बना ये है कि देश तो मर ही चुका है... उसकी लाश तक को अमरीकी हितो के हवाले कर दिया गया है... कवि बेचारा जीवित रह जाता तो कम से कम उसकी आत्म-रक्षा तो हो जाती... कवि भी मर गया... और कलाकार भी..

वियोगी होगा पहला कवि आह से उपजा होगा गान...
निकल कर आंखो से चुपचाप बही होगी कविता अनजान ।

वियोगी होने मे कोई कमी नहीं है...अपने आप से मिले महीनों गुज़र जाते हैं.. आंसू, आह और गान इनके विषय मे संदेह है...

मेरे मित्र प्रमोद सिंह अपने ब्लाग मे प्यासा की चर्चा कर रहे हैं... उनकी इस पहल से मेरे अन्दर भी दबे जमे तमाम विचारो ने आलस के मैले तालाब के ऊपर की हवा मे झांकने का मन बनाया... विचार के ये बुलबुले लोप हो जाने के पहले लिखने की कोशिश की है... मेरे कवि मित्र मुझे माफ़ करें.. और गाली देनी है तो प्रमोद सिंह को दें..ये आग उन्ही की लगाई हुयी है..

1 टिप्पणी:

रीतेश गुप्ता ने कहा…

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जम गये, जाम हुये, फंस गये,
अपने ही कीचड़ मे धंस गये!!
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में
आदर्श खा गये!
अब तक क्या किया
जीवन क्या जिया
ज़्यादा लिया और दिया बहुत बहुत कम
मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम...
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निर्मल जी,

कहने को कुछ खास नहीं ...बस आपके विचार और मुक्तिबोध की यह कविता बहुत अच्छे लगे ।

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