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शनिवार, 12 जून 2010

चिड़ीनिहार

शहरों में आज भी बहुत सी चिड़िया रहती हैं, आती-जाती हैं, गाती-चिल्लाती हैं। मगर हमारे पास उन्हे देखने-सुनने के लिए आँख-कान नहीं बचे हैं। ट्रैफ़िक और टीवी के शोर में किस के पास चिड़िया को देखने का धीरज और स्थिरता है। बिना स्थिरता के आप चिड़िया नहीं देख सकते!

जब से मेरे बड़े भाई ने मुझे इस शग़ल से संक्रमित किया है तब से मैं हर जगह चिड़िया देख लेता हूँ। मेरे बालकनी के सामने जो विलायती सिरिस का पेड़ है उसमें पन्द्रह-सोलह तरह की चिड़िया आती हैं। कौए, कबूतर, मैना, कोयल के अलावा तोते, मैगपाई रौबिन या दहियल, शकरख़ोरा, छोटा बसन्ता, गोल्डन ओरियल, छतरदुमा, गुलदुम, दर्ज़ी और कौडिन्ना या किंगफ़िशर भी। इधर-उधर घूमने पर भुजंगा, श्राइक या लटोरे, रौबिन या कलचुरी, और पत्रिंगा या बीईटर भी दिख जाते हैं।

फिर भी कुछ चिड़िया हैं जो ख़तरे में है। कई बार मुझ लगता है कि विकास क्रम में चिड़ियां हम से आगे हैं। उन्होने पानी और धरती को छोड़ कर हवाओं और आकाश से नाता बनाया है। आदमी आज़ादी के लिए तड़पता रहता है मगर चिड़िया तो फ़्रीबर्ड हैं। सूफ़ी मत में पहुँचे हुए साधक परिन्दे ही कहलाते हैं।

चिड़ियों को लेकर मेरे मन की कुछ बातें चन्दू भाई ने की हैं.. उन्हे भी पढ़ें!


तस्वीर में छोटा बसन्ता या कौपरस्मिथ बारबेट
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