मिस्र ‘आज़ाद’ हो गया। यह एक ऐतिहासिक लम्हा है। अरब देशों के इतिहास में यह पहला मौक़ा है जब जनता के दबाव में शासक को झुकना पड़ा हो। बहुत सारे लोग इस क्षण में क्रांति की अनन्त सम्भावनाएं देख सकते हैं। पर मेरा नज़रिया हमेशा की तरह थोड़ा संशयपूर्ण है। ये कोई समाजवादी क्रांति नहीं है। ये सर्वहारा का जयघोष भी नहीं है। ये व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की लड़ाई भी नहीं है। इस आन्दोलन में पहले से बने-बनाए समीकरण आरोपित करने के बजाए इसको इसकी सीमाओं में पहचानने की ज़रूरत है। ये कैसी आज़ादी है? किस से आज़ादी है? होस्नी मुबारक ने गद्दी छोड़ दी है लेकिन सत्ता अभी भी सेना के हाथ में है। अब ये सेना की सदाशयता होगी कि वह मिस्र में निष्पक्ष चुनाव कराये और जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों को जनता की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति करने का अवसर दे। ये मान लीजिये कि चुनाव करवा भी दिये तो उसके बाद क्या सेना अपनी अपरिमित ताक़त को अपने हाथों से दूसरे हाथों में सौंप देगी?
ये भी याद रखने की ज़रूरत है कि मिस्र की सेना पूरी तरह से अमरीका की साझीदार है। मुबारक को सत्ता से बाहर कर के ‘जनता की आंकाक्षाओं’ के एहतराम करने का जो सराहनीय काम सेना ने किया है वह भी अमरीकी सलाह या दबाव पर किया गया है। तो उस सेना से अमरीकी हितों के विरुद्ध कोई क्रांतिकारी सूरत उभरने में सहयोग की उम्मीद रखना भूल होगी। फिर भी यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता के अरमानों और सेना की विधानों का अन्तरविरोध मिस्र में किस शकल में विकसित होता है। और यह भी कि इस पूरी परिघटना का असर बाक़ी अरब देशों में क्या होता है?
मिस्र और दूसरे अरब देशों की जनता का एक बड़ा तबक़ा इख़्वानुल मुस्लमीन में आस्था रखता है और देश में शरिया लागू करने का पक्षधर है। इस सन्दर्भ में यह बात भी उल्लेखनीय है कि अरब देशों के शासकों की अलोकप्रियता का एक कारण उनकी तानाशाही तो है ही मगर अधिक बड़ी वजह उनकी अमरीकापरस्ती है। जनान्दोलन की इस लहर से मिस्र में आम आदमी के जीवन में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन आएगा, मुझे नहीं लगता मगर इस लहर से पश्चिम एशिया के मौजूदा राजनैतिक समीकरण बुनियादी तौर पर बदलने वाले हैं, ये तय है। उम्मीद ये की जाय कि एक बेहतर सूरत पेश आएगी क्योंकि अभी जो गतिरोध है वह सिर्फ़ असंतोष और हिंसा को ही पोसता रहा है।
