शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

साथ



सतीश के घर से लौटने के अगले तीन दिन तक अजय और शांति में अबोला बना रहा। झगड़ा ऐसी बात को लेकर हुआ था जिसका उनके निजी जीवन से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं था। सतीश की बिटिय़ा के जन्मदिन के बहाने बड़े दिनों बाद ऐसा मौक़ा आया था कि तीन लंगोटिया यार अजय, मुकुल और सतीश एक साथ जुट पाए थे। अंशुला के नाम का केक कटने, हैपीबर्थडे गा लेने और बच्चों की फ़रमाईश पर गुब्बारे फोड़-फाड़ चुकने के बाद यारों की असली महफ़िल की शुरुआत हुई। बच्चों से छिपकर जाम बनाए गए और बीवियों से छिपके चुस्कियाँ ली गईं। पहले चुटकुले सुनाए गए, फिर पुरानी गुदगुदी यादों से दिल को बहलाया गया। पर क्रिकेट में हार और बेईमानी की मार पर बातचीत का तबादला होते देर नहीं लगी। उसके पहले तक सतीश का घर तीन भागों में बँटा हुआ था- पहला तो वही जिस बैठक में यारों की तिकड़ी जमा थी, दूसरे बच्चों की रेलमपेल वाला कमरा और इन दोनों सीमाप्रदेशों के बीच तीसरा था रसोई और डाइनिंग टेबल का सम्मिलित प्रभाग, जिसकी और जिसमें शांति, सीमा और प्रभा की आवाजाही हो रही थी। जब बहस शुरु हुई तो दलील की लहरों के साथ एक-एक करके तीनों महिलाएं बैठक के तट पर आ लगीं।

'ये सब सोची-समझी नौटंकी थी', सतीश ने हिकारत से कहा, 'उनको बिल पास करना ही नहीं था..'
सतीश की बात सुनते ही मुकुल अपनी जगह बैठे-बैठे ही सर हिलाने लगा, 'नहीं-नहीं! ये तू ग़लत बोल रहा है.. आधी-आधी रात तक लगे पड़े रहे लोग और तू कह रहा है कि बिल पास नहीं करना था.. '
'बिल्कुल नाटक था.. जनता को मूर्ख बनाने के लिए..', सतीश तरंग में आ चुका था और मुकुल के सामने खड़े होकर नेताओं की नक़ल उतारते हुए हाथ लहरा-लहरा कर कहने लगा, 'देखो भैय्या हम तो बड़े भोले हैं.. हम तो रोकना चाहते हैं भ्रष्टाचार, लाना चाहते हैं लोकपाल, पर विपक्ष हमें लाने ही नहीं दे रहा..अब बताओ हम क्या करें?'
सतीश की भड़ैती से मुकुल भी भड़क गया, 'तो इसमें क्या गलत है.. यही तो हो रहा है..विपक्ष ने पहले कहा कि हम साथ देंगे और ऐन मौक़े पर गच्चा दे दिया.. जनता के साथ असली गद्दारी तो आपके विपक्ष ने की है.. वो हमेशा के गद्दार हैं..'
'अच्छा और तू जिनका साथ दे रहा है वो दूध के धुले हैं.. साठ साल से वही तो लूट रहे हैं.. ' सतीश और तैश में आ गया।
'माना.. लूट रहे हैं.. पर लूट बंद करने का क़ानून भी तो वही ला रहे हैं.. जिसे लाने नहीं दिया गया..'
'किसने मना किया लाने को.. लाओ.. बिलकुल लाओ.. किसने रोका है.. ' इतना कहकर सतीश ने अपने हाथ के गिलास को होठों से लगाके मुँह में उल्टा लिया पर गिलास ख़ाली था।
'एक मिनट रुक.. पेट्रोल ख़तम हो गया.. रुक.. मैं रिफ़िल लेके आता हूँ', सतीश कोने में जाके अपना इन्तज़ाम करने लगा।
अब अभी तक मौन अजय की बारी थी, 'वैसे वो नहीं ला रहे थे क़ानून.. उन्हे मजबूर किया गया ये क़ानून लाने के लिए.. "
अच्छा!? तुम्हे लगता है सरकार को कोई मजबूर कर सकता है?', मुकुल ने तंज़ किया।
'किया न.. '
जो सरकार बम-गोले लेके युद्ध करने वालों के हाथों मजबूर नहीं होती वो अनशन करने से मजबूर हो जाएगी..? क्या बकवास कर रहा है यार..'
बकवास नाम सुनते ही अजय को भी आग लग गई, 'मेरी बात तुझे बकवास लग रही है..? लंगोटी वाले फ़कीर ने लाल वर्दी वाले साम्राज्य को हिला के रख दिया था.. और किसी बमगोले से नहीं.. उपवास और अहिंसा की शक्ति से..'
'और बकवास किए जा रहा है तू.. अंग्रेज़ क्या गाँधी जी की वजह से देश छोड़कर गए.. दूसरे विश्वयुद्ध में उनकी बैण्ड बज गई थी.. इसलिए गए..'

इसके बाद बहुत देर तक बहस गांधी, उपवास, सदाचार और भ्रष्टाचार के मुद्दे के गिर्द उमड़-घुमड़ करती रही। शांति समेत दूसरी महिलाओं ने अपनी राय को सदन के पटल पर रखना चाहा पर उनकी बात सदन के हंगामें में हवा हो गई। बच्चे अपने खेल-वेल छोड़कर पापाओं के पौरुष को देखने के लिए इकट्ठा हो गए। अजय नेता विपक्ष की भूमिका में था और सतीश उसके मुखर समर्थक के किरदार में लगातार आवाज़ बुलन्द कर रहा था। मुकुल सत्तापक्ष में अकेले पड़ गया था और सत्ता उससे सम्हल नहीं रही थी। तो मुकुल ने अपने पक्ष में मज़बूती लाने के इरादे से महिलाओं पर नज़र डाली और सबसे पहले शांति पर निशाना साधा-
'अच्छा शांति भाभी आप बताइये.. आप क्या कहती हैं.. क्या उन्हे अनशन करना चाहिये था?'
बहस कई मंज़िलों-मक़ामों से गुज़रकर अनशन पर आ ठहरी थी।
शांति की राय स्पष्ट थी पर वो स्थिर नहीं थी, '..मेरी समझ में उन्हे इस बार अनशन नहीं करना चाहिये था..'   
'क्या बात कही भाभी.. यही तो मैं भी इतनी देर से इस गधे को समझाने की कोशिश कर रहा हूँ पर इसके भेजे में जा ही नहीं रहा.. अबे घोंचू! तुझसे समझदार तो तेरी बीवी है...'
मुकुल के ये शब्द अजय के दिल में तीर की तरह चुभ गए। पर अजय ने उस से कोई ज़्यादा अहमियत नहीं दी। वो शांति की ओर सन्न होके देखता रहता जैसे शांति ने उसका कोई बड़ा गहरा अपराध कर डाला हो क्योंकि उसको उम्मीद थी कि शांति उसी का पक्ष लेगी..
'क्यों.. क्यों नहीं करना चाहिये था अनशन?', अजय ने दागा।
'इसलिए कि जो मूल माँगे थी वो तो मान ही ली गई थीं.. और आप संसद पर कुछ थोप थोड़ी सकते हैं.. वहाँ क़ानून बनने की एक... ' शांति कहती गई पर अजय के ज़ेहन में कुछ भी दर्ज़ होना बंद हो चुका था। और भी बहुत कुछ कहा-सुना गया पर अजय के दिल में शांति के उसके विरोध पक्ष में जाने की बात धंस कर रह गई। सबके सामने कुछ बोला नहीं और अपनी भावना को ज़ब्त किए रहा लेकिन कार के चलते ही वो शांति पर बरस पड़ा।
'ऐसे बड़ा आन्दोलन-आन्दोलन करती हो पर जब मौक़ा आया तो धोखा दे दिया..?'
अरे..?! मुझे जो ठीक लगा मैंने कहा.. और मुझे अपनी राय बदलने का हक़ है..' पहले चौंकने के बाद शांति ने अपनी सफ़ाई देनी चाही।
अच्छा.. तो क्या पति बदलने का भी हक़ है.. मेरी बीवी होके तुम मुकुल का साथ दे रही थीं?'
इस तरह की बेतुकी बात सुनते ही शांति एक पल के लिए हकबका गई। और उसके बाद अजय घर लौटने तक लगातार जो बकता रहा वो सब सुनना शांति के लिए लगभग असहनीय था। वो इस बात पर हैरान थी कि अजय जैसा पति उससे भी उससे सिर्फ़ एक समर्थक भर होने की उम्मीद करता है- जैसे शांति का कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व, कोई स्वतंत्र सोच हो ही ना!? वो नशा था, क्रोध था या अस्थायी पागलपन था- जो भी था शांति को बिलकुल नापसन्द था और पूरी तरह अस्वीकार्य था।

इसीलिए जब अगली सुबह नशा उतरा और अजय ने अपनी तरफ़ से बोलचाल में कोई दिलचस्पी न दिखाई तो शांति ने भी एक उदासीनता का चोला पहन लिया और तब तक पहनी रही जब तक अजय, तीन दिन गुज़र जाने के बाद, सामान्य बरताव पर कुछ इस तरह लौट आया जैसे कुछ हुआ ही न हो। शांति ने भी बीती बात को कुरेदना ठीक नहीं समझा, ये जानकर भी कि वो बात किसी दबी हुई चिंगारी की तरह उनके सम्बन्ध में सुलगती रहेगी।

***

(८ जनवरी को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुई) 


1 टिप्पणी:

Richa ने कहा…

bhut hi sundar rachana hai.. aksar esa dekhne ko mil hi jata hai jisme pati apni sahi glt sabhi baton m apni dharm-patni ki sahmti chahta h..or jab wo esa nhi krti to..... jane anjane bich m aayi barik si duri bhut hi gahri khayi me badl jati hai...

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