शुक्रवार, 10 जून 2011

एक गड्डी धनिया


पहले गोभी सिर्फ़ जाड़े में मिला करती थी। बाज़ार में गोभी के आने के बहुत पहले से घरों में गोभी का इन्तज़ार शुरु हो जाता। गर्मी और बरसात में लौकी और निनवा खा-खाके बड़े भी आजिज़ आ जाते। बच्चे भी रोज़-रोज़ भिण्डी खाके थक जाते। सब्ज़ीवाले गाहकों की फ़र्माईशों को धीरज से सुनते और गोभी के साथ आने वाली मटर की मिठास पर भी दो मिनट बतियाते। अब वो दिन नहीं रहे। गोभी बारहों मास मिलती और लौकी भी। उनका स्वाद कभी नहीं मिलता। सब्ज़ी वालों से उस तरह बात करने का सुख भी नहीं मिलता। उस दिन जब शांति ने दफ़्तर से घर जाने के लिए स्कूटर को किक मार के स्टार्ट किया तो उसे बिलकुल पता न था कि जीवन की लगभग मध्यायु में पहुँच जाने के बाद वो बचपन में पढ़े एक पाठ का वास्तविक अर्थ जीवन की पाठशाला में समझने जा रही है; एक सब्ज़ी वाले से।

दफ़्तर से घर लौटते हुए शांति हर तीसरे-चौथे दिन तिलकनगर के बाज़ार से सब्ज़ी खरीदती हुई लौटती है। दुकानें भले ही दो हैं और दरें भी थोड़ी ज़्यादा पर सहूलियत के लिए वो इतना समझौता करती है। पहले वो दो में किसी भी सब्ज़ीवाले से सौदा ले लेती। प्रकाश भाई की दुकान एकदम बाहर की तरफ़ है और उसने अपनी झल्लियों को दुकान से बाहर सड़क तक फैला रखा है। प्रकाश के तीन और भाई हैं; कपिल, जीवन और हनुमान। हनुमान के पास एक अलग गाला है फलों के लिए। मगर फलों के भाव किसी भी भाई से पूछ लीजिये और किसी भी कांटे पर नाप-तौल कर लीजिये, सब एक है। चारों भाईयों की माँ भी सुबह के वक़्त अक्सर पालक और मूली धोती दिख जाती है। उनकी दुकान की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि ज़कूनी और बेलपेपर जैसी विदेशी सब्ज़ियों से लेकर कंटोला और लसोढ़ा जैसी देसी सब्ज़ियाँ सब मिल जाती हैं। अपने इस गुण के लिए प्रकाश की दुकान पर सब्ज़ी खरीदने लोग दूर-दूर से चले आते हैं।

मगर शांति उनके यहाँ से सब्ज़ी नहीं खरीदती। उसी बाज़ार में थोड़े अन्दर की तरफ़ बद्रीप्रसाद की एक और दुकान है, शांति पिछले डेढ़-दो बरस से वहीं से सब्ज़ी खरीदती रही है। दुबला-पतला बद्री ज़कूनी और लसोढ़ा तो नहीं रखता पर काम भर की सारी सब्ज़ी उसके पास मिल जाती है। तेरह-चौदह बरस का शरमीला सा आकाश, स्कूल की वर्दी में अपने बाप का हाथ बँटाता है। ज़ाहिरन वो स्कूल से सीधे घर न जाकर दुकान चले आता है। जहाँ प्रकाश की दुकान पर गाहको के कंधे और हाथों की टोकरियां एक दूसरे से टकराती रहती हैं वहीं बद्री के दुकान के सामने का गलियारे में हवा बिना किसी गाहक से टकराए आती-जाती है। इस तरह से एक दुकानदार की उपेक्षा शांति को अच्छी न लगी। होना तो ये चाहिये कि दोनों दुकानदारों को बराबर का मौक़ा मिले। बद्री की दुकान ज़रा अन्दर होने का उसे इतना नुक्सान हो यह शांति को ज़रा नहीं जंचा। और उसने तय किया कि बाक़ी दुनिया करे बद्री के साथ पक्षपात वो नहीं करेगी। वो बद्री से ही सब्ज़ी लेगी। और अपने इसी आग्रह के चलते वो एक बचपन में पढ़े पाठ का वास्तविक अर्थ सीख सकी।

उस दिन भी घर लौटते हुए जब शांति ने स्कूटर तिलकनगर बाज़ार पर रोका तो प्रकाश की दुकान के आगे दर्ज़न भर लोग टोकरियां लेके इधर-उधर टहल रहे थे। और बद्री की दुकान पर कुल जमा ढाई लोग थे। दो औरतें और एक बच्चा। हरे रंग के अनेक आभाओं के बीच टमाटर और बैंगन अलग चमक रहे थे। शांति ने आदतन सबसे पहले वही टोकरी में छांटकर डाल दिये। पानी से धोकर और कपड़े से चमका कर रखी पूरे साल दिखाई देने वाली शेष सब्ज़ियां उसके भीतर कोई उत्साह पैदा करने में असफल रहीं। फिर भी अनमने भाव से उसने आधा किलो करेला, और आधा किलो लोबिया ले ही लिया। और एक-एक गड्डी धनिया, पुदीना, थोड़ी मिर्चा और अदरक भी। शांति ने देखा धनिया एकदम मुरझाया हुआ है।
ये कैसा धनिया है बद्री?
आजकल ऐसा ही आ रहा है, भाभी।
पालक ले लीजिये, एकदम ताज़ा है, बद्री ने आग्रह किया।

शांति ने देखा कि बद्री का बेटा आकाश बाहर से गीले बोरे में बंधी हुई पालक और दूसरे हरे साग ला रहा है। पालक सचमुच ताज़ा था। और पालक के ही साथ धनिया और पोदीना भी अपने ताज़गी में लहलहा रहे थे।
अरे ये धनिया तो अच्छा है बद्री.. वो धनिया निकाल दो, ये वाला दो!
जी भाभी!, बद्री ने सधे स्वर में कहा।
आकाश को बोरा खोलकर पालक औ धनिया निकालने में समय लग रहा था। तो उसने सोचा कि तब तक बगल की दुकान से फल ही ले ले। और जब शांति जिस पल फल की दुकान से खरबूजे की मिठास महक रही थी, उसी पल में वो घटना घटी जो आगे चलकर उसे जीवन का वो अहम पाठ पढ़ाने में सहायक बनी। शांति ने जब घर लौटकर अपना झोला खोलकर धनिया निकाला तो पाया कि बद्री ने उसके इसरार के बावजूद धनिया नहीं बदला था। अपने पुराने सूखे और मुरझाए धनिया से भी बद्री ने पाँच रुपये निचोड़ लिए थे। शांति को एहसास हुआ कि वह ठग ली गई है!
और तब पाखी ने आकर पूछा कि, 'ममी इसका मतलब क्या है.. प्राकृतिक चयन वो प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी प्रजाति की आबादी में जैविक गुण उनके वाहकों के अस्तित्व पुनरुत्पादन पर निरन्तर प्रभाव के कारण से प्रचुर या विरल हो जाते हैं।

ये डार्विन की विकासवास की परिभाषा है.., शांति ने थैला रखते हुए कहा।
विकासवाद नहीं ममी.. ये प्राकृतिक चयन की परिभाषा है..
हाँ, एक ही बात है..
पर ममी इसका मतलब क्या हुआ..

शांति जानती है ईवोल्यूशन क्या है और नैचुरल सिलेक्शन क्या है। वो जीवन भर विज्ञान की विद्यार्थी रही है। मगर उस खीज भरे पल में ठीक-ठीक सोच पाना और अपनी सोच को सही शब्दों में अपनी बच्ची को समझा पाना, उस से नहीं हो पा रहा था।

थोड़ा सांस लेने दे..बताती हूँ.. शांति ने कह तो दिया मगर ठगे जाने की हार जैसे भाव में उसके विचार वापस बद्री की ओर लौट गए। उस रात शांति पाखी को कुछ नहीं बता सकी। बात आई-गई हो गई। पाखी दूसरी बातों और दूसरे पाठों में लग गई। फिर तीसरे रोज़ दफ़्तर से बाहर निकलते हुए शांति ने स्कूटर को किक मारी तो उसने आप को सब्ज़ी लेने का काम याद दिलाया। और उसे बद्री याद आया। उसने सोचा कि वो बद्री की कस के ख़बर लेगी, जम के डाँटेगी उसे।

स्कूटर स्टैण्ड पर चढ़ा कर और डिकी से झोला निकाल कर जब वो बद्री की दुकान की तरफ़ बढ़ने लगी तो अचानक उसे लगा कि बद्री से बात करने का कोई मतलब नहीं.. अच्छा यही होगा कि वो उसके यहाँ से सब्ज़ी लेना ही बंद कर दे। मामूली नफ़े के लिए गाहक को धोखा देने की बद्री की इस आदत को हतोत्साहित करने का इससे अच्छा और तरीक़ा नहीं है। और फिर ये सोचते हुए वो प्रकाश की दुकान पर जा खड़ी हुई कि प्रकाश की लोकप्रियता का कारण अकेले बाहर की तरफ़ दुकान होना नहीं है। और जब उसने एक टोकरी अपने हाथ में ले ली तभी उसे समझ आ गया कि उसने जो किया वो नैचुरल सिलेक्शन है। प्रकृति के अनुकूल गुण को स्वयं प्रकृति, अस्तित्व में बने रहने का ईनाम देती है और आगे बढ़ाती है। और तुरन्त उसे पाखी का ख़्याल आया। अब उसे घर पहुँचने की जल्दी होने लगी। डार्विन के प्राकृतिक चुनाव की परिभाषा का सरल अर्थ पाखी को जो बताना था।
***

(पांच जून दो हज़ार ग्यारह, इतवार को दैनिक भास्कर में छपी)

6 टिप्‍पणियां:

सतीश पंचम ने कहा…

बढिया !

नेचुरल सेलेक्शन का फंडा ब्लॉगिंग में भी खूब चलता है। जहां एक दो बार भड़काउ और फालतू शीर्षक लगाकर मजमा जुटाता कोई ब्लॉगर पाया जाता है उसके दो चार पोस्टों के बाद ही पाठक दुकान बदल देते हैं।

किंतु यहां एक पेंच भी है, मसलन उन दुकानों का क्या जो अपनी क्वालिटी के बल पर नहीं बल्कि अपनी लेनी देनी प्रक्रिया के कारण चलते हैं ?

वैसे भी डार्विन के जमाने में ब्लॉगिंग नहीं होती थी वर्ना उनके सिद्धांत कुछ और परिष्कृत और संशोधन के साथ आते :)

कहानी बिढया लगी।

सतीश पंचम ने कहा…

* उपर्युक्त टिप्पणी में 'बिढया' की बजाय 'बढ़िया' पढ़ें।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सब कुछ बारहमासी हो गया है, प्रकृति न माने न सही, बाहर से खरीद कर खा रहे हैं, उस डण्डा चलाकर उगा रहे हैं।

Mired Mirage ने कहा…

पहले जब सब्जियां अपने मौसम में ही मिलती थीं तो शायद कुछ स्वाद प्रतीक्षा का भी होता था.
घुघूती बासूती

मीनाक्षी ने कहा…

बरसों से बेमौसम खाते खाते उसी पर ही संतोष करना सीख लिया...इसी रौ में ज़िन्दगी भी कुछ वैसी ही हो गई,,

Poorviya ने कहा…

मामूली नफ़े के लिए गाहक को धोखा देने की बद्री की इस आदत को हतोत्साहित करने का इससे अच्छा और तरीक़ा नहीं है। और फिर ये सोचते हुए वो प्रकाश की दुकान पर जा खड़ी हुई कि प्रकाश की लोकप्रियता का कारण अकेले बाहर की तरफ़ दुकान होना नहीं है। और जब उसने एक टोकरी अपने हाथ में ले ली तभी उसे समझ आ गया कि उसने जो किया वो नैचुरल सिलेक्शन है।

jai baba banaras....

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