रविवार, 8 मई 2011

बैण्ड बाजा बारात

नीचे गली के कुत्तो ने बेचैन होके रोना शुरु कर दिया। पाखी और अचरज अपना होमवर्क कर रहे थे। और सासू माँ संध्याकालीन टीवी की अपनी ख़ुराक़ ले रही थीं। न चाहते हुए भी शांति दफ़्तर का काम घर पर कर रही थी। धीमे सुर में कुत्तों का रोना खिड़की के रस्ते उसके कानों से होता हुआ उसके दिल में उतर कर एक विचित्र तरंगे रचने लगा। ऐसी तरंगे जो अरुचि और भय का अजब घालमेल थीं। शांति ने बहुत कोशिश की कि वो अपना ध्यान रपट में लगाए रहे। मगर वो अप्रिय तरंगे मस्तक की सूक्ष्म तरंगो से टकराने लगीं। शांति उठकर खिड़की पर चली आई। क्या बात है? क्यों रो रहे हैं कुत्ते? गली के कुत्ते किसी भी एक दिशा में नहीं देख रहे थे। न जाने किस अनागत की आशंका से वो इधर-उधर या आकाश की ओर मुँह करके हलके-हलके भौंक रहे थे। जैसे किसी अदृश्य शत्रु की उपस्थिति की सूचना दे रहे हों। या अपने क़बीले के कुत्तों और आदमियों को चेता रहे हों और किसी आने वाले दुश्मन से मुक़ाबले के लिए तैय्यार कर रहे हों। पर कौन दुश्मन? कैसा दुश्मन? कहीं भी कोई भी तो नहीं था। फिर दूर से नगाड़ों की धमक आनी शुरु हो गई थी। तिगड़िग तिगड़िग धूम धूम धूम तिगड़िग तिगड़िग धूम धूम धूम। बैण्ड-बाजे के साथ एक बारात आ रही थी।

वो कोई पहली बारात नहीं थी जो आ रही थी। शांति की बिल्डिंग के पीछे एक बारातघर है। शादियों का सीज़न आते ही वहाँ बारातों का तांता लग जाता। किसी-किसी दिन तो दो-दो तीन-तीन बारातें आतीं। और उस दिन कुत्तों के साथ आस-पास के इन्सानों का भी जी करने लगता कि आसमान की ओर मुँह उठाकर रोने लगें। परेशानी बारात से नहीं थी। परेशानी बैण्ड-बाजे से थी। जो शरीर की लय को अपनी गिरफ़्त में कर लेने वाली ताल से हर इन्सान समेत, हर जानवर को बेबस कर देता। शांति ने देखा कि सामने की इमारत में रहने वाली मिसेज़ कटियार का तोता जो दिन भर बालकनी में रखे अपने पिंजड़े से टेंटें करता है, बारात के आने पर और बेचैन होकर टिटयाने लगता। आज़ाद होता तो उड़कर किसी दूर के गूलर की डाल पर मचल रहता। उस मिट्ठू तोते की तरह इन्सान अपने घरों में क़ैद हैं और कुत्ते अपनी गलियों में। वो उड़कर किसी दूसरे गूलर या पाकड़ की छांव में बैठकर नहीं सुस्ता सकते। आदमी अपने सुविधा और शौक के सामान से बंधा रहता है और कुत्ते अपनी गली की सरहदों से जिनके पार जाते ही दूसरे कुत्ते उनकी गरदन पर दांत गड़ा देंगे। लिहाज़ा वो सिर्फ़ अपनी हदों में बेचैन होकर घूमते हैं। और ढोल-नगाड़ों से निकल कर उनके भीतर उतर रही उत्तेजनाओं को रुदन और ग़ुस्से में बदलता हुआ देखते हैं। बेबस।

और शांति को ग़ुस्सा आ रहा था। ढोल और नगाड़े जितने नज़दीक़ आ रहे थे उसके गु़स्से का पारा उतना चढ़ता जा रहा था। वो संयत रहना चाह रही थी। रपट को पढ़कर ख़त्म करना चाह रही थी। पाखी को गणित में मदद भी करनी थी। और कुर्सी पर बैठे-बैठे ये सोचकर उसे और कोफ़्त होने लगती है कि पाखी को उसकी गणित की कोई प्रतिभा नहीं मिली। क्यों? मगर बारातियों का बैण्ड-बाजा उसे कुछ सोचने नहीं दे रहा। उसके अन्दर युद्ध की उत्तेजना भर रहा है। आख़िर ढोल बजाते क्यों हैं लोग? उसने बहुत सोचने की कोशिश की लेकिन उसके दिमाग़ ने पूरी तरह से काम करना बंद कर दिया था। उसने कुरसी छोड़ दी और वापस खिड़की पर आकर खड़ी हो गई। बारात गली में आ गई थी और नगाड़ों की आवाज़ इतनी बढ़ चुकी थी कि अब उसके लिए कुछ भी सुनना असम्भव हो चुका था। उसने चिल्लाकर कुछ कहा। उसे ख़ुद को भी सुनाई नहीं दिया कि वो क्या शब्द थे। उसका दिमाग़ सुन्न पड़ चुका था। लेकिन शरीर फड़क रहा था। उसने चाहा कि बैठ जाय मगर बैठा न गया। मन कर रहा था कि कमरे की चीज़ों को फेंक-फेंक कर किसी को मारे। इस हिंसक विचार से बचने के लिए वो कमरे से बाहर आ गई। पाखी और अचरज अपना होमवर्क छोड़कर बालकनी से नीचे झांक रहे थे। सासू माँ कान पर हाथ रखकर अपने कमरे में जा रही थीं। उन्होने तेज़ी से दरवाज़ा बन्द किया मगर उसकी ज़ोर की आवाज़ धीरे से भी नहीं आई। शांति से एक जगह खड़े होना भी मुश्किल हो रहा था। उसने दरवाज़ा खोला और लिफ़्ट का भी इन्तज़ार नहीं किया। सीढ़ियों से नीचे उतर गई।

नीचे जाकर उसने देखा कि बारात में न सिर्फ़ नगाड़ों का शोर था बल्कि पटाखों की भी धमक उसमें शामिल थी। उन धमाकों और शोलों के भय से गली के कुत्ते कारों के नीचे और नालियों में दुबक चुके थे। शांति सीधे बारातियों के बीच घुस गई। और जो उसके सामने आया उससे अपने मस्तक की पीड़ा का हिसाब माँगने लगी। पर जिनसे जवाब की दरकार थी वो पीकर इस तरह धुत्त थे कि उन्हे अपनी ही कोई ख़बर नहीं थी दूसरे के दर्द की क्या सोचते। उस बारात में कोई ऐसा नहीं था जिसे दूसरों की तक्लीफ़ और सहूलियत को कोई ख़याल हो। लगता तो ऐसा था कि वो अधिक से अधिक आतंक और दबदबा क़ायम करने का इरादा रखते हों। घोड़े, दुल्हे, और बैण्ड-बाजे के साथ बारात, बारातघर में जाकर जमा हो गई। और कुछ देर बाद वो अनन्त शोर थम गया। ऐसा लगा कि एक ज़लज़ले के बाद जीवन फिर से पैदा हुआ हो!
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देर रात सोने से पहले शांति ने अजय से पूछा, तुम हमारी शादी में बैण्ड-बाजा लेके क्यों आये थे?

अजय अचानक दाग़े गए इस सवाल से अचकचा गया। क्यों आया था माने? रसम है.. शादी में तो बैण्ड-बाजा बजता ही है। उसके बग़ैर शादी कहाँ होती है?

क्यों नहीं हो सकती उसके बग़ैर शादी? किस किताब में लिखा है कि बैण्ड-बाजा के बिना हुई शादी शादी नहीं है? और बैण्ड-बाजा बजाना भी है तो अपने घर में खिड़की दरवाज़े बन्द करके जितना मनचाहे बजाओ.. इसका क्या मतलब है कि जिन लोगों से न कोई लेना न देना.. उनके सर पर नगाड़ा बजाओ? गली-गली घोड़े पर बैठकर घूमो? कमर पर तलवार बाँधकर? लड़की से शादी करने जा रहे हो? या अपने गैंग के साथ लड़की का अपहरण करने जा रहे हो?

बहुत सोचने पर भी शांति के सवाल का कोई जवाब अजय के ज़ेहन में न आया। और  इस वैचारिक हमले से बचने की कोई पनाह नहीं दिखी। तो उसने आसान रस्ता लिया और सोचकर सुबह बताने के लिए कहा और मुँह ढककर सोना चाहा। पर शांति को चैन नहीं था। उसने लैपटाप औन कर दिया। 

अजय कुनमुनाया, क्या हुआ?

शांति ने कहा, देखी रही हूँ नेट पर क्या मिलता है इसके बारे में?

अजय ने घड़ी देखी फिर सर को तकिए के नीचे दबा, पलट कर लेट गया। शांति ने विकीपीडिया में देखा कि पुराने शास्त्रों में आठ तरह के विवाह बताए गए हैं। जिनमें से एक में भी बैण्ड-बाजे की अनिवार्यता नहीं थी। पर आठ में से एक विवाह ज़रूर मिला जिसमें लड़का लड़की की इच्छा के विरुद्ध उसका अपहरण कर ले जाता है। लेकिन उसे निन्दनीय बताया है और राक्षस विवाह का नाम दिया है।

शांति अजय को बताती इसके पहले ही फोन बजा। मौसी का था। अर्चना की शादी तय हो गई और तेईस जून की तारीख़ पक्की हुई है। आओगी न शांति? न नहीं सुनूंगी.. तुम्हारे अलावा दूसरी कोई मौसेरी बहन नहीं है उसकी.. तुम्हे तो आना ही होगा!

ठीक है, आ जाऊँगी मौसी। शांति ने कहा, बस मेरी एक शर्त है!

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(इसी इतवार को दैनिक भास्कर में प्रकाशित)  

6 टिप्‍पणियां:

sandeep sharma ने कहा…

nice post

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

बढ़िया आलेख !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सिमटती, साँस ले बढ़ती जिन्दगी।

gyanduttpandey ने कहा…

शादी, बिना ताम-झाम के?!
बन्दर मामा की शादी है

जंगल में है शोर

भालू ढ़ोल बजाता ढम ढम

नाच रहा है मोर

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जुगनू ले कर चले मशालें और खरगोश नगाड़ा

कुत्तों का रंगदार बैण्ड है, बहुत लिया है भाड़ा

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जब बैण्ड बाजा न होगा तो इस प्यारी कविता का क्या होगा? :)

अभय तिवारी ने कहा…

:-)

विष्णु बैरागी ने कहा…

बिना सोचे-समझे, परम्‍पराओं को ढोए जा रहे हम लोगों की वास्‍तविकता है यह पोस्‍ट।

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