शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

अरुंधती की नीयत क्या है?

अरुंधती उस देश पर तरस खा रही हैं जो लेखकों की आत्मा की आवाज़ को खामोश करता है। उन्हे तरस आता है उस देश पर जो इंसाफ की मांग करनेवालों को जेल भेजना चाहता है जबकि सांप्रदायिक हत्यारे, जनसंहारों के अपराधी, कार्पोरेट घोटालेबाज, लुटेरे, बलात्कारी और गरीबों के शिकारी खुले घूम रहे हैं। यह पूरा सच नहीं है। बहुत सारे साम्प्रदायिक अपराधी, जनसंहारों के अपराधी, कारपोरेट घोटालेबाज़, लुटेरे, बलात्कारी और ग़रीबों के शिकारी पकड़े गए हैं, उन पर मुक़दमें चलाए गए हैं और तमाम को सज़ा भी हुई है और कई मामले प्रक्रिया में है। लेकिन बहुत से ऐसे अपराधी हैं जो खुले घूम रहे हैं, यह भी सच है। लेकिन एक अधूरे सच को एक सम्पूर्ण सत्य की तरह पेश करने वाली अरुंधती की नीयत क्या है, मैं ठीक-ठीक नहीं जानता।

हालांकि मुझे उनकी इस बात पर कोई ऐतराज़ नहीं कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग नहीं है। किसी को ये लग ही सकता है, उसमें क्या समस्या है? मुझे तो कभी-कभी लगता है कि मुम्बई भी भारत का अभिन्न अंग नहीं है। भारत के मुख़्तलिफ़ हिस्से भारत के भिन्न-भिन्न अंग हैं। उनके इस बयान पर जो लोग हाय-तौबा मचा रहे हैं, वो बेकार की बाते हैं। सच तो ये है कि मैं स्वयं कश्मीरियों को अधिक से अधिक स्वतंत्रता देने के पक्ष में हूँ। अगर देश से अलग होकर पाकिस्तान से मिल जाने में ही उनकी ख़ुशी है तो मुझे उसमें भी कोई आपत्ति की बात नहीं दिखती। लोगों से अलग न तो कोई देश होता है और न कोई राष्ट्र। लेकिन क्या मामला मेरी आपत्ति का है? क्या राजनैतिक यथार्थ महज़ नैतिकताओं और सदिच्छाओं से संचालित होता है। अगर कोई ऐसा समझता है तो उसकी बचकानी समझ पर तरस खाने के सिवा मेरे पास और क्या विकल्प है?

और तरस से मैं लौटता हूँ अरुंधती के बयान पर जिसमें वे भारत पर तरस खा रही हैं। मुझे उनके इस बयान पर वाक़ई ऐतराज़ है। ये सच है कि हमारा देश कोई हमारे सपनों का भारत नहीं है, भारत में तमाम सारी समस्याएं है, भ्रष्टाचार है, विषमताएं हैं, बहुत सारा कूड़ा-करकट है। जिसको लेकर सभी सचेत नागरिक समय-समय पर चिंतित होते रहते हैं। हमारा देश, हमारा समाज कैसे और बेहतर हो, इसकी चिंता करना स्वाभाविक है मगर जो अरुंधती करती हैं उसे अंग्रेज़ी में ‘इण्डिया-बैशिंग’ (यानी भारत की पिटाई) कहते हैं। और अरुंधती ने इस ‘इण्डिया-बैशिंग’ में महारत सी हासिल कर ली है। हम सब अपने देश को कभी-कभी गरियाते हैं मगर अरुंधती का गरियाना एक्स्ट्राशक्ति और एक्स्ट्राआनन्द के साथ होता है। आज तक उनके इस गरियाने पर लोगबाग दुखी भले हुए हों मगर उन पर राज्य या सरकार ने कभी निगाहें टेढ़ी नहीं की। तो वो किस आधार पर उस देश पर तरस खा रही हैं जो लेखकों की आत्मा की आवाज़ को खामोश करता है? उनके इस अनजानेपन को मूर्खता कहा जाय या मक्कारी?

जब कोई देश को गाली देता है तो वस्तुतः उसके लोगों को ही गाली देता है। देश का अर्थ उस से लोगों से जुदा कुछ नहीं होता। जिस तरह अगर कोई किसी अन्य के ईश्वर को गाली देता है तो वस्तुतः उसे ही गाली देता है क्योंकि उसका ईश्वर उसकी भीतर के सबसे शुभ, सबसे शक्तिमान, और सबसे सुन्दर तत्व की अभिव्यक्ति है। भले ही बाक़ी जगत के लिए उसके ईश्वर में वे सारे गुण दृश्यमान न हों लेकिन उस व्यक्ति की ओर से शुभता, शक्ति और सौन्दर्य के प्रतिमान उसके ईश्वर में आरोपित होते हैं। मैं यह नहीं कहता कि देश ईश्वर है। ये कह रहा हूँ कि देश की अवधारणा में आदमी ने अपनी सामाजिक, सामूहिक पहचान को आरोपित किया होता है। कश्मीरियों और आदिवासियों की हमदर्द बनने वाली अरुंधती भारतवासियों की सामूहिक पहचान पर क्यों इस तरह से हमलावर हो जाती हैं?

क्या इसलिए कि वे भारत के भीतर मौजूद तमाम छोटी-छोटी राष्ट्रीयताओं का तो अनुमोदन करती हैं लेकिन एक अधिक सार्वभौमिक पहचान भारतीयता का खण्डन? किसी भी व्यक्ति के भीतर अपने नाम, पारिवरिक नाम, जातीय पहचान, से लेकर इंसान व प्राणी होने तक पहचानों के कई स्तर होते हैं। व्यक्ति के भीतर मौजूद एक बड़ी पहचान का खण्डन व सीमित पहचान का मण्डन करना, और परोक्ष रूप से भारतीयता में किसी भी एकसूत्रता को नकारना अरुंधती की मूर्खता है  या मक्कारी?

ये ठीक है कि कुछ लोगों में आत्मघृणा के तत्व होते हैं- एक दौर में सभी में होते हैं जिस की अभिव्यक्ति वे अपने माँ-बाप से नफ़रत करके करते हैं- लेकिन अधिकतर लोग अपने आप से, अपने परिवार से और देश से मोहब्बत करते हैं और उस पर किए हुए किसी भी हमले को पसन्द नहीं करते। लगातार भारतीयता की पहचान पर हमला करने वाली अरुंधती की इस आक्रामकता को उनकी मूर्खता कहा जाय या मक्कारी?

अरुंधती कश्मीर में जाकर कश्मीरी पण्डितों के पलायन को बहुसंख्यकों द्वारा अल्पसंख्यको पर अत्याचार न कहकर, एक त्रासदी भर बताती हैं और सैय्यद अली शाह गीलानी की मासूमियत और बदले तेवर से अभिभूत नज़र आती हैं। क्या कोई भी समुदाय अपने पूर्वजों की ज़मीन, घर-बार, ज़मीन-मकाना सिर्फ़ इसलिए छोड़कर भाग खड़ा होता है कि उसे किसी गर्वनर ने कहा है? एक क्षेत्र विशेष से, एक समूह का उसके ख़िलाफ़ बने आतंक के माहौल से घबरा कर पलायन की इतिहास में दूसरी भी मिसालें हैं। क्या अरुंधती इतनी ही मासूमियत से उन्हे भी महज़ त्रासदी, उनकी दुख भरी कहानियों को मनगढ़न्त कह सकती हैं? क्या वे यही बात जर्मनी से यहूदियों के पलायन और नक़बा के वक़्त फ़िलीस्तीन से अरबों के पलायन के लिए भी कहेंगी? यह ठीक है कि पण्डितो का मामला हत्याओं व पलायन के परिमाण में ठीक-ठीक जर्मनी के यहूदियों और फ़िलीस्तीनी अरबों जैसा नहीं है मगर उसका चरित्र वही है। महमूद अहमदीनेज़ाद के होलोकास्ट को नकारने की तर्ज़ पर अरुंधति का मानना कि पण्डितों पर हुआ अत्याचार अधिकतर मामलों में उनके द्वारा पैदा की गई एक झूठी कहानी है- यह अरुंधती की मूर्खता है मक्कारी?

याद रहे सैय्यद अली शाह गीलानी वही शख़्स हैं जिन्होने १९८९-९० में “आज़ादी का मतलब क्या? ला इलाहा इल अल्ला!” चिल्लाकर पण्डितों को हत्याओ करने और अन्ततः उन्हे घाटी से खदेड़ने वाली हिंसक भीड़ का (परोक्ष या अपरोक्ष) नेतृत्व किया था। और ये वही गीलानी हैं जिन्होने दो बरस पहले ही श्राइनबोर्ड विवाद के समय पण्डितों से निरापद हो चुकी कश्मीर घाटी की डेमोग्राफ़िक्स बदलने की साज़िश का राग अलापकर ‘इस्लाम ख़तरे में है’ का कार्ड खेला था। पाकिस्तान के ख़ुले समर्थक और जमाते 'इस्लामी'  के नेता गीलानी में गाँधी की छवि देखने वाली अरुंधती मूर्ख हैं या मक्कार?

किसी भी समस्या का एक राजनैतिक समाधान होता है- राजनैतिक समाधान का अर्थ कि जिसमें एक ऐसे हल की दिशा में अग्रसर हुआ जाता है जो व्यावहारिक हो, जिसे लागू किया जा सके, और जो सभी पक्षों को स्वीकार्य भी हो। लेकिन अरुंधती के पास किसी भी समस्या के हल जैसा कुछ भी नज़रिया नहीं है। अरुंधती जो कुछ भी विचारती हुई दिखती हैं वे आदर्शवादी नैतिकता की जुगालियाँ हैं, राजनीति नहीं। वे उत्पात को बढ़ाने में, फ़ित्‌ने की भाषा बोलने में और ऐसे अतिवादी जुमले फेंकने में तत्पर दिखती हैं जो दिखते-सुनने में तो बड़े लुभावने मालूम होते हैं मगर समस्या के निराकरण में उनकी कोई उपयोगिता नहीं होती।

मगर उनकी सबसे बड़ी ताक़त यही है कि वे एक जुमलेबाज़ हैं। जो पहले से कहे हुए प्रस्थापनाएं हैं उन्हे वे अतिश्योक्त्ति की चाशनी में डाल के परोसने में सिद्धहस्त हैं। इस लिहाज़ से वे देश के पढ़े-लिखे उदारवादी तबक़े के लिए वैसे ही हैं जैसे कि बिहार के अनपढ़ अहिरों के लिए लालू यादव थे। लालू भी अपनी जुमलेबाज़ी से एक ऐसा माहौल रचते थे कि वे कोई वास्तविक आन्दोलन खड़ा कर रहे हैं और एक वास्तविक परिवर्तन के अग्रदूत हैं। मगर सच्चाई इस से कोसों दूर थी, लालू सिर्फ़ अपने हित साध रहे थे। अरुंधती क्या साध रही हैं- ये फ़िलहाल तो ठीक-ठीक नहीं खुल रहा? यहाँ तक कि उनके खोखले जुमलों का सच भी बहुत सारी ‘लिबरल जमात’ पर नहीं खुल रहा। इकतरफ़ा और अतिरंजित जुमले पेश कर के देश की लिबरल जमात को गुमराही के राह पर धकेलना अरुंधती की मूर्खता है या मक्कारी?

अब जैसे अरुंधती का ये जुमला देखिये कि भारत एक सवर्ण हिन्दू राज्य है। क्योंकि यहाँ मुसलमानों, दलितों, ईसाईयों, सिखों, आदिवासियों, कम्यूनिस्टो और प्रतिरोध करने वालों ग़रीबों पर अत्याचार होता है। लेकिन ये कैसा सवर्ण हिन्दू राज्य है, जिसमें सवर्णों की सत्ता की रक्षा के लिए नहीं दलितों और पिछड़ों को सत्ता में शामिल करने के लिए क़ानून बनते हैं। ये कैसा सवर्ण हिन्दू राज्य है जिसमें तमिलनाडु से लेकर उत्तर प्रदेश तक सत्ता पर दलित राजनीति का वर्चस्व है? ये कैसा सवर्ण हिन्दू राज्य जिसमें देश की अनेक समस्याओं के लिए ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणों को दोषी ठहराया जाता है और गरियाया जाता है? ये कैसा सवर्ण हिन्दू राज्य है जिसमें ब्राह्मण नहीं, दलित के सम्मान की रक्षा के लिए हर सम्भव जगह बनाई जा रही है? अरुंधती जैसी ‘विद्वान’ और ‘सचेत’ महिला भी इस अन्तर को देख पाने और चिह्नित करने में क्यों चूक जाती हैं कि इस राज्य व समाज में अब अगर कोई बायस है तो अब दलितों और पिछड़ों के पक्ष में।

इस 'सवर्ण हिन्दू राज्य' पर अरुंधती समेत सभी माओवादी एक दूसरे आकलन से आरोप  लगाते हैं कि इस देश को साम्राज्यवादी शक्तियां यानी अमरीका आदि और उनके दलाल यानी सोनिया गाँधी, मनमोहन सिंह, अज़ीम प्रेम जी, अम्बानी बंधु, टाटा आदि चला रहे हैं। अगर सचमुच ऐसा है तो क्या वे मानते हैं कि इस सवर्ण हिन्दू आग्रह की जड़ अमरीका तक जाती है? और क्या अरुंधती ये मानती हैं कि टाटा, सोनिया और मनमोहन हो सकते हैं पारसी, ईसाई और सिख मगर चिंता सवर्ण हिन्दू हितों की करते हैं? और आप ख़ुद सोचिये कि अम्बानी अपनी नीतियां तय करते वक़्त हिन्दू हित की चिंता करते हैं? भारत को सवर्ण हिन्दू राज्य बतलाने वाली अरुंधती कश्मीरी आन्दोलन का स्पष्ट वहाबी सुन्नी मुस्लिम चरित्र देखने में जो चूक जाती हैं उसे मैं उनकी मूर्खता समझूँ या मक्कारी?

अरुंधती मानती हैं कि भारत एक कोलिनियल शक्ति है? अरुंधती ने ये बयान कश्मीर जाकर दिया है। कहने का मतलब ये कि वे यह असर पैदा कर रही हैं कि भारत ने कश्मीर को अपना उपनिवेश बनाया हुआ है। अब तो यह बात आमफ़हम है कि कोई भी ग़ैरकश्मीरी कश्मीर में ज़मीन ख़रीद कर वहाँ अपनी रिहाईश नहीं कर सकता। न तो कोई व्यक्ति और न ही कोई कारपोरेट। और ये भी बात सार्वजनिक है कि भारत या भारत स्थित कोई कारपोरेट कश्मीर से किसी सम्पदा का हरण नहीं कर रहा बल्कि सच्चाई उलटी है, भारत वहाँ पर करदाता के पैसे का बुरी तरह से अपव्यय कर रहा है जिससे मैं स्वयं नाख़ुश हूँ। कश्मीर के सन्दर्भ में उनका यह बयान बिलकुल निर्मूल है। फिर भी अरुंधती इसे बेहद आत्मविश्वास से प्रचारित कर रही हैं। आप बताइये कि उनके इस आत्मविश्वास के पीछे उनकी मूर्खता है या मक्कारी?

दूसरी तरफ़ उनके माओवादी साथी, जिनकी प्रवक्ता की तरह भी अरुंधती सक्रिय हैं, भारतीय राज्य को अमरीकी पूँजी का दलाल बताते हैं। जब उनके समर्थन में अरुंधती बयानबाज़ी कर रही होती हैं तो उनके मुखारविंद से यह भारत एक कोलोनियल शक्ति वाली प्रस्थापना अवतरित नहीं होने पाती, क्यों? क्या इसलिए कि उनके बाज़ू में खड़े होकर अरुंधती कोई ऐसी बात नहीं कहना चाहती जो उनकी प्रस्थापना के आड़े जाकर उन्हे नाराज़ कर दे? तो इस तरह की मुँहदेखी बात करना अरुंधती की मूर्खता है या मक्कारी?

अरुंधती मानती हैं कि भारत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन करता है? डा० ज़ाकिर नाइक जो ओसामा और तालिबान की ख़ुलेआम ताईद करने की वजह से इंगलिस्तान जाने का वीज़ा हासिल नहीं कर पाए हैं, हिन्दुस्तान में कुछ भी कहने-सुनने के लिए आज़ाद हैं। अपनी मनचाहे विचारों का प्रचार करते हुए वे मानते हैं कि भारत में बोलने की जितनी आज़ादी है उतनी कहीं नहीं। अफ़सोस कि अरुंधती डा०नाइक की तरह साफ़गो नहीं हैं, जो मनचाहे बोलने के लिए आज़ाद होने के बावजूद बेड़ियों की दुहाई देती हैं। तो इसे उनकी मक्कारी कहा जाय या मूर्खता?

अरुंधती मानती हैं कि वे एक स्वतंत्र मोबाइल रिपब्लिक हैं? सुनने में यह जुमला बेहद आकर्षक लगता है। लेकिन इस जुमले का खोखलापन किसी ने जाँचा नहीं ठोस सवालो की चोट से। पूछा जाना चाहिये कि एक विराट इम्मोबाइल रिपब्लिक के भीतर स्वतंत्र मोबाइल रिपब्लिक होने की आज़ादी उन्हे मिली कहाँ से? क्या यह आज़ादी चीन में है? क्या सोवियत रूस में थी? क्या क्यूबा, ईरान, साउदी अरब में है? और क्या कश्मीर में है? जहाँ मीरवाइज़ मौलवी फ़ारुक़, अब्दुल गनी लोन और न जाने कितने दूसरे नेता पाकिस्तान समर्थित कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवादियों द्वारा मौत के घाट उतार दिए गए, क्यो? क्योंकि वे थोड़ी सी वैचारिक आज़ादी का मुज़ाहिरा कर रहे थे। अरुंधती अपने स्वतंत्र मोबाइल रिपब्लिक होने का सेहरा अपने सर पर आप बाँधे घूमती हैं; उसी रिपब्लिक को जुतियाते और थुकियाते हुए, जिसने उन्हे ‘स्वतंत्र’ होने की आज़ादी दी है.. इसे उनकी मक्कारी कहा जाय या मूर्खता?

अरुंधती मानती हैं कि कश्मीर में पिछले तीन माह से भारतीय सुरक्षा सेनाएं निरपराध निहत्थों पर गोलियाँ चला रही हैं? एक तो ये सफ़ाई कर ली जाय कि पत्थर फेंकती भीड़ निहत्थी नहीं होती, जैसे तमाम लोग बता रहे हैं। इस मसले में पूछने की बात ये है कि सुरक्षाकर्मियों गोलियाँ चला रहे थे इसलिए लोग पत्थर फेंक रहे थे? या लोग पत्थर फेंक रहे थे इसलिए सुरक्षाकर्मी उन्हे गोली के डर से धमका कर रोकने की कोशिश कर रहे थे? मेरा ये मानना है कि एक सौ ग्यारह नहीं एक मौत भी बेहद अफ़सोसनाक है, नहीं होनी चाहिये थी। लेकिन ज़रा सोचिये दुनिया की कौन सी सरकार होगी जो पत्थर फेंकती भीड़ के आगे समर्पण कर देगी? राज्य का काम व्यवस्था रखना है, अराजक भीड़ की हिंसा के आगे समर्पण करना नहीं? अगर, मिसाल के तौर पर अगर मैं गीलानी साहब या मैडम अरुंधती की प्रेस कान्फ़्रेन्स में जाकर पत्थर फेंकना चालू कर दूँ तो क्या मेरा विरोध प्रदर्शन हिंसक कहलाएगा या अहिंसक?

पिछले कई दशकों से पाकिस्तान सक्रिय रूप से कश्मीर में तरह-तरह से फ़ित्ना खड़ा करने की मुहिम छेड़े हुए है। हर साल हज़ारों नौजवान और अरबों रुपये सीमा पार से कश्मीर में भेजे जा रहे हैं। हर मुमकिन कोशिश की जा रही है कि ऐसी सूरत खड़ी हो कि भारत में फिर से साम्प्रदायिक आधार पर बँटवारा हो; और इस विशाल देश को छियत्तर टुकड़ों में बाँट दिया जाय और कश्मीर उस योजना की एक केन्द्रीय कड़ी है। खालिस्तानियों और श्रीलंकाई तमिल अलगाववादियों के साथ दिल्ली में आज़ादी का उदघोष करने वाली अरुंधति ये मानकर चल रही हैं कि एक राष्ट्र के छिहत्तर टुकड़े हो जाने से न्याय और शांति की स्थापना हो जाएगी? छिन्न-भिन्न हो जाने में सुनहरे सवेरे को देखने की उनकी यह मासूमियत और इस पूरी तस्वीर में पाकिस्तानी पहलू को नज़रअदांज़ कर देना अरुंधती की मक्कारी है या मूर्खता?

विद्वान लोग बताते हैं कि एक चरित्र वाले लोग एक-दूजे के सदैव शत्रु होते हैं। तो फिर निश्चित ही यह संयोग नहीं है कि अरनब गोस्वामी को सबसे अधिक चिढ़ अरुंधती से है और अरुंधती को अर्नब गोस्वामी से है; अभी हाल की प्रेस कवरेज के बाद अरुंधती की प्रेस कान्फ़रेन्स से टाइम्स नाउ वालों को निकाल दिया गया। अरनब गोस्वामी, राखी सावन्त और अरुंधती राय में वैसे तो बड़ा अन्तर है। लेकिन एक स्तर पर उनमें कोई अन्तर नहीं है, कि ये सभी एक अतिवादी सोच, एक सनसनीखेज़ बयानबाज़ी करके ध्यानार्कषण की नीति में यक़ीन रखते हैं।

अरुंधती कभी माओवादियों से नहीं पूछती कि तुम इन बंदूक की नली से निकालकर सत्ता पा जाओगे तो कौन सा समाज बनाओगे? वो माओवादियों की चन्दाउगाही की भ्रष्ट नीति- जो घूस लेके उद्योगपतियों को मज़े से अपना धंधा चलाने का अधिकार देती हैं- पर कभी सवाल नहीं करतीं? क्यों? क्यों कश्मीरियों के कट्टरपंथी धार्मिकता, उनकी साम्प्रदायिकता और पण्डितों के प्रति घृणा पर वो कभी उन्हे खरी-खरी नहीं सुनातीं? क्यों कभी उनसे नहीं कहतीं कि बन्द करो मासूम नौजवानों को भड़काना? बन्द करो उनके हाथ में गोली, बन्दूक और पत्थर देकर उन्हे बरबादी के रास्ते पर धकेलना? क्यों? क्योंकि वे डरती हैं कि अगर उन्होने राज्य के साथ-साथ आन्दोलनकारियों को भी उसी सुर में गलियाना शुरु कर दिया तो उनको भाव कौन देगा? इसीलिए अगर उनका आन्दोलनकारियों से अलग उनका कोई मत हो भी तो वे उसे ‘इण्डिया-बैशिंग’ के सप्तम सुर से बहुत नीचे, बहुत मंद्र स्वर में उच्चारित करती हैं? क्यों?

अगर कोई यह समझता है कि इतिहास में बदलाव जनान्दोलनों के ज़रिये आते हैं तो वे अहमको़ की ख़ामख़याली में जी रहा है। ज़रा सोचिये मानव जीवन की जिस शकल को हम जी रहे हैं उसे किस जनान्दोलन ने पैदा किया है? मानव जीवन को संवारने और उसे ख़ूबसूरत बनाने वाली शक्तियाँ एकल व्यक्तियों की मेधा, और कुछ संयोगो का मिला-जुला करिश्मा होता है। भीड़, और ख़ासकर नारे लगाने वाली, पत्थर फेंकने वाली उन्मादी, दंगाई भीड़ लूटमार कर सकती है, आगज़नी कर सकती है, तोड़-फोड़ कर सकती है, लेकिन रच सिर्फ़ फ़ित्ना ही सकती है और कुछ नहीं। और अरुंधती, इस देश के बहुत सारे संवेदनशील नौजवान और मेरे बहुत से अज़ीज़ दोस्त अभी तक यही समझते हैं कि ग़ुस्साई भीड़ के हिंसक आक्रोश के नताईज से नया मनुष्य पैदा होगा और नया समाज रचेगा। किसी मज़लूम अवाम का स्वतःस्फूर्त तरीक़े से कभी क्रुद्ध हो उठना एक बात है लेकिन सचेत-संगठित सोच के तहत उस क्रोध को विकसित करना और उससे मुक्तिकामी परिवर्तन की उम्मीद रखने को उनकी मूर्खता माने या मक्कारी?

अरुंधती बोलती हैं एक बेहद ऊँचे नैतिक मंच से जहाँ से सारे व्यावहारिकताएं अनैतिक और अनर्गल मालूम देती हैं। वो जहाँ से खड़ी होकर बोलती हैं वहाँ से उनसे असहमत सारे लोग दलाल और अत्याचारी नज़र आते हैं। लेकिन उनकी अपनी सोच एक बेहद सर्वसत्तावादी सोच है। वे लगातार दुहाई देती हैं कि सरकार ने यह नहीं किया, वह नहीं किया, सरकार इस बात की दोषी है, उस बात की दोषी है। कहने का अर्थ ये है कि वे परोक्ष रूप से यह कहती हैं कि राष्ट्र की सीमाओं के भीतर उसके नागरिकों के जीवन में क्या-क्या घटता है, या नहीं घटता है इसकी सीधी ज़िम्मेदारी सरकार पर है, या उसके विभिन्न घटकों पर है। अरुंधती घटको की अलग से बात नहीं करती, वे सीधे एक मोटे तौर पर राज्यसत्ता की बात करती हैं। मुझे नहीं लगता कि ऊपर-ऊपर से इसमें कोई आपत्तिजनक बात दिखती है लेकिन ये बात अन्दर से बेहद ख़तरनाक अवधारणा है। इसी सोच के साथ जब लोग सत्तातंत्र पर क़ाबिज़ होते हैं तो लोगों के जीवन के नियंता बन बैठते हैं और सार्वजनिक जीवन ही नहीं लोगों के व्यक्तिगत जीवन के भी हर पहलू में दखलंदाज़ी करने लगते हैं क्योंकि ऐसा करना वे अपनी ज़िम्मेदारी मानते हैं। इस सोच के क्या दुष्परिणाम निकलते हैं वो हम तमाम ऐतिहासिक उदाहरणो से पहले से ही जानते हैं।

भारतीय विषमताओं और समस्याओं के प्रति सचमुच दुखी व पीड़ित रहने वाले लिबरल जमात के लोग जो अरुंधती जैसी अतिवादी राजनैतिक समझ के जुलूस में मुर्दाबाद के नारे लगाने वाले हुए ये देख नहीं पाते कि यह उनके नैतिकमोक्ष का मार्ग नहीं है। व्यावहारिकता का रास्ता नीरस, कठिन और लम्बा होता है, क्रांतिकारिता आकर्षक, आसान और फ़ौरी? मगर व्यावहारिकता का मध्यमार्ग ही वह एकमात्र उपाय है जिस से सबका मंगल और सब ओर शांति संभव है। लेकिन व्यावहारिकता की धुरविरोधी अरुंधती हमेशा एक अतिवादी नैतिकता बघारती नज़र आती हैं। फिर पूछता हूँ इसे उनकी मूर्खता माना जाय या मक्कारी?

एक ऐसी दुनिया जिसमें सत्ता की शकल अब तक हिंसा से तय होती आई है, अरुंधती का यह अपेक्षा कि अहिंसा की सर्वोच्च नैतिकता निभाने की ज़िम्मेवारी राज्य पर है, हास्यास्पद है। ये एक आदर्श के रूप में तो भली मालूम देती है लेकिन व्यावहारिक कसौटी पर यह बात किसी समाज को एक दिन भी सुरक्षा और शांति नहीं दे सकती। अन्त में मैं कहता हूँ कि मैं कश्मीरियों की साम्प्रदायिक आन्दोलन से मूलभूत असहमति रखता हूँ फिर भी कश्मीरियों, और नागाओं को अपने भाग्यनिर्धारण का हक़ मिलना चाहिये, इसका समर्थन करता हूँ। साथ ही मैं माओवादियों के साथ भले न होऊँ लेकिन आदिवासियों की वनसम्पदा का उपयोग किस तरह से हो इस प्रक्रिया में उनकी राय सब से अहम हो, इस माँग की भी ताईद करता हूँ। मेरी विनम्र असहमति सिर्फ़ अरुंधती के अतिवाद और उनकी इण्डियाबैशिंग से है।

77 टिप्‍पणियां:

मैथिली गुप्त ने कहा…

बहुत प्रभावशाली लिखा है अभय जी.
काश पोस्ट तीन लेखों की श्रंखला में होती.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

देश की परिस्थितियों से विलग, हवाई चिन्तन धारा लगती है इनकी।

मुनीश ( munish ) ने कहा…

@ ''फिर पूछता हूँ इसे उनकी मूर्खता माना जाय या मक्कारी? ''
कई वर्ष हुए श्रद्धेय पंडित अनिल शर्मा ने एक मूवी बनाई थी जिसमें जाट -पुत्र सन्नी देओल कहता है '' दूध मांगो खीर देंगे , कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे '' --और यही एक तर्कसंगत उत्तर है जिसे क्रियान्वित किये जाने की ज़रुरत है . हालांकि सनी जी का ये ऐलान पाकिस्तान वासियों के लिए था किन्तु समय -चक्र देखिये देश के भीतर ही इस आदर्श वाक्य की आवश्यकता आन पडी है.

Shiv ने कहा…

बेहतरीन लेख.
वाजिब सवाल. जवाब कहाँ से आएगा?

आभा ने कहा…

देश की नागरिकता के नाते, सोच समझ से भरपूर,पर स्वदेश हित की नीयत होनी चाहिए। अच्छा आलेख .

सिरिल गुप्ता ने कहा…

शानदार लेख.

The Innovator ने कहा…

"अरुंधति का ये जुमला देखिये कि भारत एक सवर्ण हिन्दू राज्य है। क्योंकि यहाँ मुसलमानों, दलितों, ईसाईयों, सिखों, आदिवासियों, कम्यूनिस्टो और प्रतिरोध करने वालों ग़रीबों पर अत्याचार होता है। लेकिन ये कैसा सवर्ण हिन्दू राज्य है, जिसमें सवर्णों की सत्ता की रक्षा के लिए नहीं दलितों और पिछड़ों को सत्ता में शामिल करने के लिए क़ानून बनते हैं।"... ऐसे कई सवाल है जिसके उत्तर नदारद है अरुंधती राय के पास .. और आपने एक दम बेहतरीन प्रस्तुति की है..आशा करता हु की ऐसे ही कुछ लेख शीघ्र हमें पढने को मिले

mukti ने कहा…

"लोगों से अलग न तो कोई देश होता है और न कोई राष्ट्र।" इस बात से मैं भी सहमत हूँ और इसी आधार पर मैं भी कश्मीरियों और नागाओं की भावनाओं का सम्मान करती हूँ. अरुंधती के भारत के विषय में जारी किये गए वक्तव्यों से ये जाहिर होता है कि
-भारत एक ऐसा कोलोनियल राष्ट्र है, जिसने कश्मीर को उपनिवेश बना रखा है और खुद अमेरिका का उपनिवेश है.
-ये एक ऐसा देश है, जहाँ की सरकार अल्पसंख्यकों और दलितों का दमन करती है, लेकिन फिर भी उसे इसके लिए कोसा जा सकता है.
-यहाँ अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं है, पर फिर भी इसे आराम से गरियाया जा सकता है.
-भारत में अनेक धर्म, जाति, जनजाति, वर्ग, सम्प्रदाय, क्षेत्र आदि के लोग आपस में झगडे करते हैं. इसलिए उन सबको उनका हक देकर भारत के टुकड़े-टुकड़े कर देने चाहिए. इसके बाद वो लड़ना बंद कर देंगे, जैसा कि पाकिस्तान ने बंटवारे के बाद किया.
... अरुंधती के बयान खुद हद दर्जे के अंतर्विरोधों से भरे पड़े हैं. आगे क्या कहा जाए?

Kirtish Bhatt, Cartoonist ने कहा…

बेहतरीन लिखा है .

संजय बेंगाणी ने कहा…

पीठ ठोकता हूँ जी आपकी, इस लेख के लिए.

Suresh Chiplunkar ने कहा…

मैथिली जी, सिरिल, बेंगानी जी से पूर्ण सहमत…
बेहतरीन लिखा हुआ लेख… अरुंधती को पढ़वाया जाये…
अब तो मुझे "बुकर" पर भी संदेह होने लगा है… :)

अभिषेक मिश्रा ने कहा…

nirmal aanand ji, mujhe nahi lagta hai ki aapne arundhati ke likh pure padhe hain ya koi bhi bhashan pura suna hai.

अभिषेक मिश्रा ने कहा…

nirmal aanand ji, mujhe nahi lagta hai ki aapne arundhati ke likh pure padhe hain ya koi bhi bhashan pura suna hai.

संगम पांडेय ने कहा…

अंतिम पैरा में आप कश्मीर के सांप्रदायिक आंदोलन से असहमत हैं, फिर भी उनकी मांग का समर्थन कर रहे हैं। यह तो बड़ी ही विचित्र बात है। आपकी तुलना में अरुंधती की राय में ज्यादा सिलसिला है। वे आंदोलन का भी समर्थन करती हैं और मांग का भी। फिर आपका यह भी मानना है कि 'जनआंदोलनों के जरिये इतिहास में बदलाव की बात अहमकों का खयाल है'। जबकि आपकी राय के विरुद्ध तो इतिहास में बहुत सारे तथ्य हैं। कृपया कश्मीर के बारे में अगर आपकी कोई दो टूक राय हो तो स्पष्ट करें, अन्यथा आपकी और अरुंधती की राय अंततः एक ही ठहरती है।

अभय तिवारी ने कहा…

संगम जी, यह लेख अरुंधति पर है, कश्मीर पर नहीं। मैं कश्मीरियों के साम्प्रदायिक आधार पर एक अलग देश बना लेने से या पाकिस्तान में शामिल हो जाने से असहमत हूँ, लेकिन ऐसा कर लेने की आज़ादी उन्हे मिलनी चाहिये- इससे सहमत हूँ, इसमें क्या विचित्र है?

shikha varshney ने कहा…

अभय जी ! बहुत ही अच्छा लिखा है आपने .जाने क्यों ये फैशन बन गया है गलियां दो और चर्चा में रहो.वे बुद्धि जीवी जिन्हें अरुंधती जी के बयान सच्चे लग रहे हैं.उन्हें हिन्दुस्तान के और ५-६ टुकड़े होने पर भी कोई अफ़सोस न होगा क्योंकि समस्याएं तो बहुत से राज्यों में हैं .

डॉ .अनुराग ने कहा…

शुक्रिया अभय जी .इस लेख के लिए पिछले दिनों जिस सोच से मै गुजरा हूँ आपने लगभग उसी सोच को अपने शब्द दिए है ...
लाल्टू जी ओर मोहल्ला पर मैंने लगभग एक दिन पहले मैंने वही बात की है जो आपने अपने कमेन्ट में कही है.....बुद्दिहीन अनुसरण से इतर इधर एक ओर लोगो का समूह पैदा हुआ है ......बौदिक अनुसरण ...जो प्लांड होता है ....ऐसी .क्रान्ति खासी रोमांटिक है ...कुछ लफ्फाजी.. शब्दों के विन्यास ...अपने को सही साबित करत...े तर्क ...यही तो करना है.......अजीब बात है के अब अपराधी कौन है ओर उसका वाद क्या है ये देखकर उसका पक्ष तय किया जाता है न की ...अपराध देखकर ........भ्रमित संद्रर्भो में आदर्श अपना न्यूट्रल विज़न खो देता है .....कभी कभी किसी विचार को सपोर्ट करने के अतिरेक उत्साह में लोग उन लोगो के हाथो का टूल बन जाते है जो एक स्वस्थ समाज के लिए हानिकारक है ......क्या यदि यही बात किसी ए .. बी या सी ने कही होती तो यही लोग उनके समर्थन में होते.?....एतराज अरुंधति के सवाल उठाने पर नहीं है......एतराज मंच ओर उस व्यक्ति के साथ ये प्र्शन उठाने पर है ....जिसका न भारतीय संविधान में विश्वास है ..ओर जो नैतिकता ओर सिद्दांत की राजनीति से कही ज्यादा घ्रणित ओर स्वार्थ भरी है .....यदि आप हमारे विचार से सहमत नहीं तो आप कट्टर वादी ? ये भी एक तरह की हिंसा है ...भाषा की हिंसा ....वैसे किसी को गिलानी के बारे में कुछ पता भी है ...उसका राईट हेंड सय्यद सल्लुद्दीन तीन दिन पहले ही उसने पकिस्तान में एक रेली की है ......
अरुंधति.... . अफ़सोस ...ऐसे लोग अपने भ्रमित आदर्शो में इस्तेमाल होते टूल भर है

Tarkeshwar Giri ने कहा…

eeee sasuri to pagla gai hai......

thoda chhota-chhota likha kariye, itna bada padha nahi jata hai.

अनामदास ने कहा…

एकदम सटीक अभय भाई. मगर क्या कीजै कि इस देश मं अरुंधति की बहुत ज़रूरत है, आप जितनी सधी हुई बात कह रहे हैं वह कम ही लोगों की समझ में आती है, अरुंधति भी खूब समझती हैं, बेवकूफ़ नहीं हैं लेकिन डेलिबरेटली प्रोवोकेटिव हैं. माओवादियों और कश्मीरियों के मामले में सिवा चिदंबरम के, किसी और पक्ष की कितनी आवाज़ मीडिया सहित सार्वजनिक मंचों पर सुनाई देती है, सिवाय आउटलुक में छपने वाले अरुंधति के लेखों के. वे निश्चित तौर पर अतिवाद के नज़दीक हैं लेकिन भयानक रूप से पनप रहे एकांगी राष्ट्रवादी, उपभोगवादी नज़रिए के बरअक्स दूसरा पहलू सामने रखने के लिए जो दुस्साहस (अडासिटी) अरुंधति ने दिखाया है उसकी तारीफ़ ज़रूर की जानी चाहिए, हाँ इस वैधानिक चेतावनी के साथ कि उनके विचार संपूर्ण सत्य नहीं हैं, ठीक वैसे ही जैसे करोड़ों शिक्षित मध्यवर्गीय भारतीयों के. आप, मैं और अरुंधति एक बात पर तो सहमत हैं न कि देश या राष्ट्र सिवा लोगों के कुछ और नहीं होता, मगर उसमें कश्मीरी, मुसलमान, दलित, कंधमाल के ईसाई और माओवादी कहे जाने वाले आदिवासी भी तो आते हैं न, उनकी बात कोई तो कहे, कोई तो सुने.

ALOK KHARE ने कहा…

behdar prabhavshali lekh, badhai,
aise hi dajjiyan udani chahiye, jo hindustaan ki mukhalfat ki bat kare

dhurvirodhi ने कहा…

पिछले साल अप्रेल के महीने में चीनी अर्धसरकारी वेबसाईट (http://iiss.cn) पर चीन की एक योजना प्रकाशित हुई थी जिसके अनुसार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, श्री लंका के सहयोग से हिन्दुस्तान को 20-30 टुकड़ों में विभाजित कर दिया जाना है.

उक्त योजना के अनुसार हिन्दुस्तान को अनेक कौमों में बांट दिया जाना है. जिनमें आसामी, तमिल, बंगाली, नागा, काश्मीरी, हिन्दू भारत, सेक्यूलर भारत, इस्लामिक भारत, दलितिस्तान और भी ना जाने कितने टुकड़े हैं. चीनी योजना के अनुसार धर्म, जाति, रहन सहन, शक्ल सूरत, रंग, शैली और राज्यों के बीच पानी को लेकर लड़ाईयां होनी हैं,

आखिर देश है ही क्या? राष्ट्र लोगों के सिवा कुछ नहीं होता. हम कभी भी एक राष्ट्र नहीं रहे, हमें तो हमारे अंग्रेजों ने गुलाम बनाकर एक देश के रूप में एकजुट किया था. हमें सिर्फ गुलामी ही जोड़ सकती है. राष्ट्रवाद तो फासीवाद होता है.

जिस तरह अरुन्धती समेत सारे के सारे माओवादी जोर शोर से काश्मीर को भारत से अलग कर देने की वकालत कर रहे है, मुझे विश्वास है कि उक्त चीनी योजना को जोर शोर से क्रियान्वियन होना शुरू हो चुका है.

अभय जी, आप विभाजित हिन्दुस्तानों में से इसके किस टुकड़े में रहना पसन्द करेंगे? मेरे लिये कौन सा टुकड़ा सही रहेगा?

मुनीश ( munish ) ने कहा…

@''मैं कश्मीरियों के साम्प्रदायिक आधार पर एक अलग देश बना लेने से या पाकिस्तान में शामिल हो जाने से असहमत हूँ, लेकिन ऐसा कर लेने की आज़ादी उन्हे मिलनी चाहिये- इससे सहमत हूँ, इसमें क्या विचित्र है?''
इसमें विचित्र है भूगोल को नज़रंदाज़ किया जाना . नक्शा उठा कर ५ मिनट ध्यान से देखें --नदियों को, दर्रों को , पड़ोसियों को और फिर कहें कि क्या वाकई "ऐसा कर लेने की आज़ादी उन्हे मिलनी चाहिये-" रही बात अरुंधती की तो उसे इच्छित ,वांछित पब्लिसिटी मिल गयी है !

एस.एम.मासूम ने कहा…

भारत एक महान देश है, हम सबको अपनी धरती से प्रेम है, हाँ इन्साफ अक्सर लोगों को नहीं मिल पता.
अरुंधति को लगता है की यहाँ सांप्रदायिक हत्यारे, जनसंहारों के अपराधी, कार्पोरेट घोटालेबाज, लुटेरे, बलात्कारी और गरीबों के शिकारी खुले घूम रहे हैं" तो क्या हुआ ? वोह भी घूमें. परेशान तो देश के भोले भले नागरिकों को होना है.

रंजना ने कहा…

आलेख और टिप्पणियों ने जिस प्रकार विषय को विस्तार दिया है..पढ़कर बड़ा संतोष मिला....

व्यावहारिक रूप में हमारे इस प्रयास से कितना फर्क पड़ेगा, पता नहीं...पर प्रयास तो हमें जारी रखना ही होगा....क्योंकि सत्य है कि हजार बार एक झूठ को को दुहराकर लोगों को उसे सच मानने के लिए तैयार किया जा सकता है...

अरुंधती हो,गिलानी हो या इन जैसे असंख्य जाहिर, गुप्त अतिवादी और विध्वंसक ,इनके मकसद को उनतक पहुँचाना जो शब्दों के पीछे की मंशा को नहीं पढ़ पाते,बहुत बहुत आवश्यक है...

अस्त्रों से बहुत अधिक प्रभावशाली शब्दों की लड़ाई होती है...इनके सम्मुख मौन आत्मसमर्पण हमें नहीं करना चाहिए...

सुगठित और सार्थक इस आलेख के लिए आपका बहुत बहुत आभार !!!!

ePandit ने कहा…

बहुत सुन्दर यथार्थवादी लेख। यद्यपि आपने कहा है कि, "मुझे उनकी इस बात पर कोई ऐतराज़ नहीं कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग नहीं है।" पर आपके कहे से हमें कतई बुरा नहीं लगा क्योंकि आपके दिल में ईमानदारी है जबकि अरुंधती के दिल में मक्कारी।

अरुंधती को किसी गरीब, शोषित से हमदर्दी नहीं है, वह तो बस चक्कर में है कि ऐसे हवाई बयान देकर वह भी नेल्सन मंडेला, सू की आदि की तरह महान अन्तर्राष्ट्रीय नेता बन जाय, लेकिन अरुंधती नहीं जानती कि इन लोगों ने इस महानता के स्तर को पाने के लिये कितनी तपस्या और त्याग किया, कितना जुल्म सहा। अरुंधति इन महान लोगों के पैर की जूती लायक भी नहीं।

हम लोग चकित हैं कि यदि अरुंधती को भारत इतना खराब लगता है तो वह अपने पसंदीदा आदर्श मुल्क क्यों नहीं चली जाती। भारत के खिलाफ दुष्प्रचार करने वालों को तो इस्लामिक और पश्चिमी देश बड़ी प्रसन्नता से नागरिकता दे देते हैं।

"अरुंधति मानती हैं कि भारत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन करता है?"

हम्म भारत स्वतन्त्रता का दमन करता है, क्या अरुंधती सऊदी अरब, चीन जैसे मुल्कों में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की स्थिति जानती है। उसके पसंदीदा माओवादी देश चीन में वो चीन के खिलाफ ऐसे बयान जारी करती तो कब का उसे गोली से उड़ा दिया गया होता और पाकिस्तान में करती तो आतंकी उसे मौत के घाट उतार चुके होते।

"अब जैसे अरुंधति का ये जुमला देखिये कि भारत एक सवर्ण हिन्दू राज्य है। क्योंकि यहाँ मुसलमानों, दलितों, ईसाईयों, सिखों, आदिवासियों, कम्यूनिस्टो और प्रतिरोध करने वालों ग़रीबों पर अत्याचार होता है।"

क्या अरुंधती को भारत के बारे में दसवीं के छात्र जितनी भी जानकारी नहीं है। संविधान के अनुसार तो भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है ही अघोषित रुप से ये अल्पसंख्यक तुष्टिकरणवादी राष्ट्र है। यहाँ कोई असुरक्षित है तो वो सबसे ज्यादा हिन्दू, सिख आदि कौम हैं। चाहे वो कश्मीरी पण्डित, सिख हों या सीमान्त ईसाई बहुल प्रदेश के हिन्दू। यहाँ हिन्दुओं, सिखों के कत्लेआम पर कोई चर्चा तक नहीं होती, वो उनकी नियति मानी जा चुकी है जबकि किसी मुस्लिम को अपराध साबित होने पर गिरफ्तार करने पर भी "धर्मनिरपेक्षों" को नींद आनी बन्द हो जाती है।

"अरुंधति मानती हैं कि कश्मीर में पिछले तीन माह से भारतीय सुरक्षा सेनाएं निरपराध निहत्थों पर गोलियाँ चला रही हैं?"

अगर अरुंधती के ऊपर कोई पत्थर फेंके तो क्या वह उन्हें बचाव की कार्यवाही करेगी या उन्हें निरपराध, निहत्था मान कर उनकी प्रशंसा करेगी।

आपके लेख से पसंदीदा पंक्तियाँ कोट कर रहा हूँ।

----

जब कोई देश को गाली देता है तो वस्तुतः उसके लोगों को ही गाली देता है। देश का अर्थ उस से लोगों से जुदा कुछ नहीं होता।

अरुंधति कश्मीर में जाकर कश्मीरी पण्डितों के पलायन को बहुसंख्यकों द्वारा अल्पसंख्यको पर अत्याचार न कहकर, एक त्रासदी भर बताती हैं

पाकिस्तान के ख़ुले समर्थक और जमाते 'इस्लामी' के नेता गीलानी में गाँधी की छवि देखने वाली अरुंधति मूर्ख हैं या मक्कार?

अगर, मिसाल के तौर पर अगर मैं गीलानी साहब या मैडम अरुंधति की प्रेस कान्फ़्रेन्स में जाकर पत्थर फेंकना चालू कर दूँ तो क्या मेरा विरोध प्रदर्शन हिंसक कहलाएगा या अहिंसक?

ePandit ने कहा…

बहुत सुन्दर यथार्थवादी लेख। यद्यपि आपने कहा है कि, "मुझे उनकी इस बात पर कोई ऐतराज़ नहीं कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग नहीं है।" पर आपके कहे से हमें कतई बुरा नहीं लगा क्योंकि आपके दिल में ईमानदारी है जबकि अरुंधती के दिल में मक्कारी।

अरुंधती को किसी गरीब, शोषित से हमदर्दी नहीं है, वह तो बस चक्कर में है कि ऐसे हवाई बयान देकर वह भी नेल्सन मंडेला, सू की आदि की तरह महान अन्तर्राष्ट्रीय नेता बन जाय, लेकिन अरुंधती नहीं जानती कि इन लोगों ने इस महानता के स्तर को पाने के लिये कितनी तपस्या और त्याग किया, कितना जुल्म सहा। अरुंधति इन महान लोगों के पैर की जूती लायक भी नहीं।

हम लोग चकित हैं कि यदि अरुंधती को भारत इतना खराब लगता है तो वह अपने पसंदीदा आदर्श मुल्क क्यों नहीं चली जाती। भारत के खिलाफ दुष्प्रचार करने वालों को तो इस्लामिक और पश्चिमी देश बड़ी प्रसन्नता से नागरिकता दे देते हैं।

"अरुंधति मानती हैं कि भारत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन करता है?"

हम्म भारत स्वतन्त्रता का दमन करता है, क्या अरुंधती सऊदी अरब, चीन जैसे मुल्कों में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की स्थिति जानती है। उसके पसंदीदा माओवादी देश चीन में वो चीन के खिलाफ ऐसे बयान जारी करती तो कब का उसे गोली से उड़ा दिया गया होता और पाकिस्तान में करती तो आतंकी उसे मौत के घाट उतार चुके होते।

"अब जैसे अरुंधति का ये जुमला देखिये कि भारत एक सवर्ण हिन्दू राज्य है। क्योंकि यहाँ मुसलमानों, दलितों, ईसाईयों, सिखों, आदिवासियों, कम्यूनिस्टो और प्रतिरोध करने वालों ग़रीबों पर अत्याचार होता है।"

क्या अरुंधती को भारत के बारे में दसवीं के छात्र जितनी भी जानकारी नहीं है। संविधान के अनुसार तो भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है ही अघोषित रुप से ये अल्पसंख्यक तुष्टिकरणवादी राष्ट्र है। यहाँ कोई असुरक्षित है तो वो सबसे ज्यादा हिन्दू, सिख आदि कौम हैं। चाहे वो कश्मीरी पण्डित, सिख हों या सीमान्त ईसाई बहुल प्रदेश के हिन्दू। यहाँ हिन्दुओं, सिखों के कत्लेआम पर कोई चर्चा तक नहीं होती, वो उनकी नियति मानी जा चुकी है जबकि किसी मुस्लिम को अपराध साबित होने पर गिरफ्तार करने पर भी "धर्मनिरपेक्षों" को नींद आनी बन्द हो जाती है।

"अरुंधति मानती हैं कि कश्मीर में पिछले तीन माह से भारतीय सुरक्षा सेनाएं निरपराध निहत्थों पर गोलियाँ चला रही हैं?"

अगर अरुंधती के ऊपर कोई पत्थर फेंके तो क्या वह उन्हें बचाव की कार्यवाही करेगी या उन्हें निरपराध, निहत्था मान कर उनकी प्रशंसा करेगी।

आपके लेख से पसंदीदा पंक्तियाँ कोट कर रहा हूँ।

----

जब कोई देश को गाली देता है तो वस्तुतः उसके लोगों को ही गाली देता है। देश का अर्थ उस से लोगों से जुदा कुछ नहीं होता।

अरुंधति कश्मीर में जाकर कश्मीरी पण्डितों के पलायन को बहुसंख्यकों द्वारा अल्पसंख्यको पर अत्याचार न कहकर, एक त्रासदी भर बताती हैं

पाकिस्तान के ख़ुले समर्थक और जमाते 'इस्लामी' के नेता गीलानी में गाँधी की छवि देखने वाली अरुंधति मूर्ख हैं या मक्कार?

अगर, मिसाल के तौर पर अगर मैं गीलानी साहब या मैडम अरुंधति की प्रेस कान्फ़्रेन्स में जाकर पत्थर फेंकना चालू कर दूँ तो क्या मेरा विरोध प्रदर्शन हिंसक कहलाएगा या अहिंसक?

Arvind Mishra ने कहा…

'अगर देश से अलग होकर पाकिस्तान से मिल जाने में ही उनकी ख़ुशी है तो मुझे उसमें भी कोई आपत्ति की बात नहीं दिखती।'

बिलकुल ठीक बात -अगर शरीर का नासूर लाईलाज हो जाय तो उसे काटकर फेकना ही बुद्धिमानी है ..थोड़ी अपंगता फिर भी ठीक है -

'विद्वान लोग बताते हैं कि एक चरित्र वाले लोग एक-दूजे के सदैव शत्रु होते हैं।
आपको ब्लागजगत के कई लोगों से सावधान होना पड़ेगा {वाईस वेरसा भी :) }
बाकी तो विद्वानों ने भाष्य कर ही दिया है -
मेरे एक मित्र हैं इलाहाबादी अरविन्द पांडे जी जो आंग्लभाषा में काफी लम्बा लिखकर और आप हिन्दी भाषा में काफी लम्बा लिखकर पाठकों पर अत्याचार की प्रवृत्ति रखते हैं -आप दोनों में समानता इस बात की है कि लिहते इतना सारवान हैं कि बीच में छोड़ा नहीं जाता और अत्याचार की अनुभूति बढ़ती जाती है ...मैथिली जी का कहना ठीक है -यह पूरा आलेख तीन भागो में होना चाहिए था ....
पता नहीं आगे ध्यान देगें भी या नहीं ...विद्वानों की इडियोसिंनक्रैसीज के बड़े किस्से हैं !

Pratik Pandey ने कहा…

बहुत उम्दा लेख है। ज़्यादातर बातों पर आपसे पूरी तरह सहमत हूँ। हालाँकि जब आप कहते हैं कि कश्मीरियों को हक़ होना चाहिए कि वे ख़ुद तय करें कि क्या वे आज़ाद होना चाहते हैं या नहीं, तो क्या आप भी उसी उच्च आदर्शवादिता के शिखर पर सवार होकर व्यावहारिक धरातल को नज़रअन्दाज़ नहीं कर रहे हैं? यदि सभी को अपनी आज़ादी तय करने का हक़ हो तो आपको हर शहर में अलग-अलग तथाकथित धार्मिक समुदायों के ऐसे मुहल्ले मिल जाएंगे, जो भारत की अपेक्षा पाकिस्तान में जाना चाहते हैं। क्या उन्हें भी आज़ादी दे देनी चाहिए?

सिर्फ़ घाटी में भारत सरकार ऐसा क्या और क्यों कर रही है जिसके लिए आज़ादी की ज़रूरत है, लद्दाख और जम्मू में वही आज़ादी बेमानी क्यों है? ब्लॉगर साथी रमण कौल जी ने कुछ दिन पहले इस विषय पर बेहतरीन आलेख लिखा था। आपने अवश्य पढ़ा होगा, नहीं पढ़ा तो कृपया समय निकालकर पढें - Kashmir is too small for azadi.

अरुंधति की नीयत का आपका विश्लेषण सटीक है और खुलकर उसे सामने रखने के लिए आप बधाई के पात्र हैं।

प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI ने कहा…

बहुत सही अभिव्यक्ति !
एक आम भारतीय जो समस्याओं से ग्रस्त हो सकता है ...लेकिन उसे यह भी पता होना चाहिए कि उसे भारत में रहते हुए कितनी आजादी प्राप्त है !

.........इस मामले में अरुंधती को मैं प्रचार के लिए भूखा से अधिक कुछ नहीं कह सकता !!
.....इसीलिए मैं कहता हूँ कि आज अरुंधती उस सामजिक वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रही है जो जाने अनजाने उसी धनात्मक पर खड़े हो उसी नकारात्मकता को गरिया रहा है |
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.
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आखिर नोबेल चाहिए ना अरुंधती राय को ?

प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI ने कहा…

और अभय जी !
एक लेख इसके बाद और .....बचे खुचे कुछ निर्लज्ज सवालों के जवाब सहित!

अभिषेक ओझा ने कहा…

एक और सटीक सुलझा हुआ लेख. कल से पढ़ रहा हूँ किस्तों में. अभी ख़त्म हुआ. लगभग हर मुद्दे पर सहमती है आपसे.

cmpershad ने कहा…

`फिर पूछता हूँ इसे उनकी मूर्खता माना जाय या मक्कारी'

यह न मूर्खता है न मक्कारी... यही तो होता है विदेशी एजंटों का काम :(

बेनामी ने कहा…

aap jaise logon k liye taras kahana bhi apna time khrab karna h.muje karna par raha h.aange mw khyal rakhunga ,aapko kya lagta h k aap jaise chand sir-fere ko kuch bhi bolne ka aadhikar cheen kar jab aapko bajaya jay to bolne ke keemat aapko pata lagegi.

सतीश पंचम ने कहा…

Mumbai Paused ब्लॉग चलाने वाले श्री एम एस गोपाल ने मुंबई के गिरगांव चौपाटी पर एक शख्स की तस्वीर खिंची थी जिसके टी शर्ट पर पीछे लिखा हुआ था -

Create a big Wave..
Grab a board..
and start Surfing it....

- अरूंधती जैसी टिटिहिरी शख्सियतें वही कर रही हैं।

बोल बोल कर ........चहकते हुए.....रिसियाते हुए....गरियाते हुए अपने लिए एक सुविधाजनक लहर बना रही हैं....एक स्पेस बना रही हैं.....ताकि उन लहरों पर सवार हो उनका आनन्द उठा सकें।

इस तरह के बयान देकर अरूंधति ने एक लहर क्रियेट करने की कोशिश की है, सहानुभूति और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के बने सर्फ बोर्ड के बजरिए धीरे धीरे अन्य कई तरह के पुरस्कारों का आनंद उन्हें मिलने ही वाला है...यह तय है।

और यही उनकी मंशा भी है।

इसी मुद्दे को लेकर मैंने सफेद घर पर भी कुछ लिख मारा है :)

ई रहा लिंक :)

http://safedghar.blogspot.com/2010/10/blog-post_30.html

अनूप शुक्ल ने कहा…

अच्छा लेख लिखा है। इस बात से सहमत हूं कि अरुंधती राय एक जुमलेबाज हैं।

संतोष त्रिवेदी ♣ SANTOSH TRIVEDI ने कहा…

मोहतरमा का लिखा आम भारतीय तो पढ़ नहीं पाया मगर उनके 'लेखकीय-स्वतंत्रता'की आड़ में दिए गए बचकाने और देश-विरुद्ध बयान को क्या कहा जा सकता है.एक तरफ इसी देश के संविधान की दुहाई देकर वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बातें करती हैं ,दूसरी ओर उसी देश पर ,उसके सांविधानिक ढांचे पर कुल्हाड़ी भी चला रही हैं,इसे मूर्खता के अलावा क्या कहा जायेगा?

स्वप्नदर्शी ने कहा…

बाबरी मस्जिद के फैसले पर आपके पिछले लेख में, आपने ये खुद ही रेखांकित किया है कि फैसला बहुसंख्यक जनसंख्या की आक्रमकता को देखते हुये अमन के हक मैं है, इन्साफ के हक में नहीं. इस लेख की पृष्ठ-भूमी में समाज का वों चरित्र सर के बल खड़ा होकर अल्पसंख्यकों और दलितों के पक्ष में हो गया है. सिर्फ १० दिन भी नहीं हुये. मालूम नहीं अपने समाज को किस आयने में देखा जाय?
कश्मीर का मुद्दा सिर्फ इतने तक सीमित नहीं है कि लोगो को आज़ादी का हक होना चाहिए, अलहदा होने के लिए, या कोई बड़ी मुसलमान आबादी पड़ोसी देश में मिल जाय. फिर खुश रहेगी या फिर सैनिक शासन में खुश रहेगी. उसके बहु आयाम है, और सिर्फ हिन्दुस्तान पाकिस्तान ही नहीं है, ग्लोबल राजनीती के बड़े तार भी होंगे, और आतंकवाद के भी है. सामरिक दृष्टी से भी भारत के लिए कश्मीर का महत्तव है. और इन सबके मद्दे नज़र संजीदा तरीके से लोगो के लिए कोई पालिसी होनी चाहिए, मुख्यधारा में उनके मिलने के प्रयास होने चाहिए. ये जो देश है इसका विकास इस तरह का है कि सभी सीमावर्ती राज्य, दूर दराज़ के देहात, और सबसे गरीब लोग इसकी परिधि के बाहर है, और जनतंत्र के पास उन्हें देने के लिए सैनिक शासन से बेहतर कुछ होना चाहिए.

कश्मीर के अलगाव का मुद्ददा जटिल है, पर उसका सही हल राजनितिक ही होना चाहिए, या उसकी जमीन बनने के संजीदा प्रयास होने चाहिए. अरुंधती से असहमति के बाद भी, उनकी आवाज़ , विरोध और असहमति की आवाज, एक स्वस्थ जनतंत्र के लिए ज़रूरी है. अरुंधती की जुमलेबाजी भी अगर लोगों को साथ साल की लम्बी चुप्पी के बाद कश्मीर के राजनैतिक समाधान की तरफ सक्रिय करती है तो ये पोजिटिव बात होगी. इतना तो निश्चित है कि पुराने जोड़तोड़ के फैसले, राजनैतिक अवसरवाद, और सैनिक शासन का फोर्मुला बर्बादी और आतंकवाद ही लाया है. संजीदे पन से जब हिन्दुस्तान के नागरिक सोचेंगे, तभी जो सरकार है, नीती नियंता है, किसी संजीदा दिशा में जायेंगे.
अरुंधती की इंडिया बैशिंग और रास्ट्रवाद की छतरी के नीचे अरुंधती की बैशिंग से समाधान नहीं निकलने वाला.

अभय तिवारी ने कहा…

स्वप्नदर्शी जी, बाबरी मस्जिद वाला फ़ैसला एक फ़ैसला है, एक उसके आधार पर पूरे समाज का चरित्र निर्धारित नहीं किया जा सकता; समाज जटिल चीज़ होती है, उसमें सैकड़ों अन्तर्विरोध होते हैं विशेषकर भारत जैसे बहुआयामी समाज में। फिर अरुंधति समाज की नहीं राष्ट्र-राज्य के चरित्र की बात कर रही हैं- समाज में समस्याएं अधिक हैं लेकिन हमारे राष्ट्र या संघ की अवधारणा में कहीं अधिक प्रगतिशीलता निहित है। समाज के पिछड़ेपन के कारण वह पूरी तरह से लागू नहीं हो पा रही। वो कह रही हैं कि राज्य में एक सवर्ण आग्रह है, यह ग़लत है; न तो संविधान में ऐसा कुछ है, न राजनीति में, और न ही यहाँ की पूँजी के चरित्र में।

दृष्टिकोण ने कहा…

आज यदि कश्मीर की आमजनता यह चाहती है कि उन्हें अकेला छोड़ दिया जाए, तो इसे हम अपने प्रजातंत्र की नाकामी क्यों नहीं मानते ? क्यों नहीं हम यह स्वीकार कर लेते कि हमने अलग-अलग राष्ट्रीयताओं को मिलाकर एक राष्ट्र तो बना लिया मगर हम एक राष्ट्रीय संस्कृति विकसित करने में असफल रहे हैं जो हमारे अलग-अलग राष्ट्रीयताओं वाले देश को एक सूत्र में पिरो पाती। क्यों हमारे देश में अब भी भाषा, और प्रांतीय झगड़े मौजूद हैं। क्यों मुम्बई में मराठियों के द्वारा गैर मराठियों का जीना हराम किया जाता है।
Read Full Post at
http://drishtikon2009.blogspot.com/2010/10/blog-post_27.html

viruslover ने कहा…

अरे भैया अरुंधती जैसे लोगो को तो जो भी सम्मान या पुरुस्कार भारत सरकार ने या विदेसी सरकारों ने दिए है सब कुछ छीन कर इनको उठाकर पाकिस्तान की सीमा पर फेंक देना चाहिए क्योकि अब इनको अपना भारत देश दुश्मन और यहाँ इनको घुटन महसूस होती है तो जाये और पाकिस्तान का गुणगान करे कश्मीर को उनका अभिन्न अंग बता कर पाकिस्तान रत्न का पुरुस्कार प्राप्त करे क्या जरूरत है भारत जैसे गरीब और गुलाम देश के सम्मान का यहाँ तो सिर्फ इनको सजा मिले गी क्योकि भारतीय संविधान सबके साथ समानता का अधिकार देता है वोह चाहे राजनेता हो या इनके जैसा शीर्ष लेखक सजा तो जरुर मिलेगी मिलनी भी चाहिए यार बुद्धि नहीं है फिर काहे की समाज चिन्तक या समाज सुधारक अरे इनको अगर समाज के लिए लगा दो तो ये आपस में ही सांप्रदायिक हिंसा भी करवा सकती है अपने कडवे लेखन और भाषण से
सजा तो मिलेगी जरुर मिलेगी जिससे अब कोई अन्य इस तरह की बातें न करे

भारत भूषण तिवारी ने कहा…

बिल्कुल सच है, मानव जीवन की जिस शकल को हम जी रहे हैं उसे किसी जनान्दोलन ने नहीं पैदा किया. मजदूर एक दिन सुबह-सुबह जगे और पाया कि दिन में काम के लिए अधिकतम आठ घंटों का निर्धारण हो गया है; महिलाओं को रातों-रात मताधिकार दे दिया गया; मालिकों का हृदय-परिवर्तन हुआ और उन्होंने 'मैटर्निटी लीव' लागू कर दी; अमरीकी गोरों का दिल पसीजा और उन्होंने कालों को गले लगा लिया और नागरी अधिकार दे दिए; किसी ने जादू की छड़ी घुमाई और इस राज्य और समाज में दलितों और पिछड़ों के पक्ष में तथाकथित 'बायस' तैयार हो गया. करिश्मा है!
समता पर आधारित समाज के निर्माण के लिए प्रयासरत, मनुष्य के मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्षरत एक पूरी परंपरा को आपने 'भीड़तंत्र' से प्रभावित बता ही दिया है. और हाँ, जो अब तक 'भीड़तंत्र' के शैदाई हैं ऐसे आपके अज़ीज़ दोस्तों में कुछ अगर आभासी दुनिया में भी सक्रिय हैं; तो उम्मीद है कि वे भी इस पर कुछ बोलेंगे.

एस.एम.मासूम ने कहा…

जब कोई देश को गाली देता है तो वस्तुतः उसके लोगों को ही गाली देता है।

हलके अंदाज़ मैं यह बात सही लगती है, लेकिन ऐसा है नहीं. अगर किसी देश के नेता भ्रष्ट हों. इन्साफ मिलने मैं सालों लगजाते हों, दंगा फसाद करवा के लोग आज़ाद भूम सकते हों तो उसके खिलाफ आवाज़ उठाना , देश को गली या उस देश के नागरिकों को गली देना नहीं कहा जाएगा. अरुंधति के खिलाफ मेडिया मैं बहुत बोला गया. ज़रा ध्यान से देखीं, सरकार ने क्या किया? और क्यों?

अभय तिवारी ने कहा…

भारतभूषण, जो उदाहरण आपने दिए हैं वे हमारे जीवन की शकल निर्धारित नहीं करते, थोड़ी बहुत रियायत के मामले हैं। लेकिन उसमें भी जनांदोलनों की भूमिका से अलग दूसरी ताक़ते काम कर रही होती हैं, जैसे स्त्रियों को मताधिकार। क्या यह अनायास हो गया? मार्क्स खु़द कहते हैं कि पूँजीवाद सस्ते श्रम के लिए औरतों को श्रमबाज़ार में खींचेगा। पूँजीवादी समाज में ही आके ये क्यों सम्भव हुआ? पूँजीवाद के विकास में किस जनांदोलन की भूमिका है? फिर आठ घण्टे की सीमा आज कितने सेक्टर्स में लागू है? टाटा ने अपनी फ़ैक्ट्री में बिना किसी आन्दोलन के आठ घण्टे का दिन, घर आदि तमाम सुविधाएं क्यों दी? भारत में बिना किसी महिला आन्दोलन के उन्हे मताधिकार क्यों मिल गया जबकि योरोप में उसके लिए महिलाओं को कुछ संघर्ष करना पड़ा? तमाम सारे सवाल हैं जिसके लिए एक स्वतंत्र लेख की ज़रूरत है। मुश्किल यह है कि बदलावों को लेकर वामपंथियों ने जनांदोलनों की भूमिका को अतिरंजित तरह से पेश किया है। उसका पुनराकलन करने की सख़्त ज़रूरत है।

मासूम जी, इस्लाम में बहुत सारी समस्याएं हैं लेकिन जब कोई उन्हे लेकर इस्लाम की कटु आलोचना करता है तो बहुत सारे ऐसे मुस्लिम भी जिनके जीवन में धर्म की भूमिका लगभग नगण्य है, वे बुरा महसूस करते हैं। उसी तरह हिन्दू मित्र भी ऐसा महसूस करते हैं। और यह स्वाभाविक है। हम चाहे-अनचाहे एक समुदाय का हिस्सा होते हैं, उस पर की गई 'कटु' टिप्पणी हमें अखरती हैं।
हम सब अपने देश की आलोचना करते हैं, लेकिन अरुंधति कुछ हद कर देती हैं, इसलिए लोग उनसे ख़फ़ा हो जाते हैं।
आप का ख़्याल है कि अरुंधति के ख़िलाफ़ बोलने वालों पर कारवाई होनी चाहिये?

गिरीश बिल्लोरे ने कहा…

मूर्खों की नियत क्या हो सकती है कुल मिला के मूर्खता भरी
ताज़ा-पोस्ट ब्लाग4वार्ता
एक नज़र इधर भी मिसफ़िट:सीधी बात
बच्चन जी कृति मधुबाला पर संक्षिप्त चर्चा

मनीषा पांडे ने कहा…

@ अभय, लेकिन,(हमारे राष्ट्र या संघ की अवधारणा में कहीं अधिक प्रगतिशीलता निहित है) राष्‍ट या संघ की यह अवधारणा मात्र अवधारणा ही है। प्रैक्टिकली ऐसा कहां होता है।
पूरे लेख में एक ऐसी अंडरटोन सी महसूस हो रही है कि कहीं आप राज्‍य के पक्ष में तो नहीं खड़े हैं, जबकि राज्‍य सत्‍ता का बुनियादी चरित्र ही (खासकर भारत जैसे पिछड़े गरीब मुल्‍क में) ताकतवर का तटवाचाट और कमजोरों का शासक हुक्‍मरान होना है।

मनीषा पांडे ने कहा…

एक बात और अभय, मैं भी इसी देश में पैदा हुई हूं। तीन साल की उम्र से स्‍कूल में तीन रंगों वाले झंडे को सलामी देते और राष्‍ट गान गाते बड़ी हुई हूं। मैं भी अपने देश पर गर्व महसूस करना चाहती हूं, लेकन क्‍या करूं, गर्व होता ही नहीं। मुझे मालूम नहीं, ये मेरे कैरेक्‍टर का प्रॉब्लम है या कुछ और। लेकिन सुबह उठने से लेकर रात में सोने तक जिंदगी में जो कुछ भी घटता है, मुझे वो हरेक बात नापसंद है। मैं उस पर गर्व नहीं कर सकती। एक-एक चीज पर उंगली रखने लगूं तो बात बहुत लंबी हो जाएगी। लेकिन एक पंक्ति में बात ये कि मुझे सबकुछ गलत अन्‍यायपूर्ण और कपट से भरा हुआ लगता है। लोग चोर हैं, मक्‍कार हैं, भोले, निरीह, गरीब, मूर्ख, पथ भूले, कपटी सब हैं, लेकिन गर्व के लायक नहीं हैं। 30 सितंबर को कोर्ट का फैसला आते ही मेरे पास दसियों ऐसे मैसेज आए जो मुझे हिंदू होने पर, जीत पर गर्व करने और दिवाली मनाने का संदेश दे रहे थे। सब गर्व से भरे हैं, और आप देखिए न, इस लेख को पढ़कर घोषित भगवा ब्रिगेड भी कितने गर्व से भरी है। लेकिन ये मूरी मूर्खता है या मक्‍कारी कि मुझे गर्व नहीं होता। मुझे अपने देश पर, अपने हिंदुस्‍तानी होने पर बिलकुल गर्व नहीं होता।

अभय तिवारी ने कहा…

हुआ क्या है न मनीषा भारत में वामपंथ ने चिंतन परम्परा का बहुत कबाड़ा किया है। विरोध करने को ही अपनी वैचारिक ज़िम्मेदारी का चरम मान लिया गया है। जो जितने ऊँचे स्वर में विरोध करेगा वो उतना बड़ा विचारक सिद्ध होने का प्रबल दावेदार हो जाता है।

और राज्य को ऐसी शै मान लिया है जिस से जितनी जल्दी मुक्ति मिल जाय उतना भला? हज़ारों साल के मानव समाज का विकास है राज्यतंत्र, उसकी एक भूमिका है, उपयोगिता है। और मैं ऐसा कोई भविष्य देख पाने में असमर्थ हूँ जिसमें राज्य बिला जाएगा, हर मनुष्य नैतिकता की प्रतिमूर्ति होगा, और अपराध और हिंसा सदा के लिए समाप्त हो जाएगा। माफ़ करें, राज्य कहीं जाने वाला नहीं है, बस उसकी भूमिका परिष्कृत होती जाएगी।

गर्व करने और गाली देने के बीच बहुत सारी जगह ख़ाली रहती है, कुछ लोग वहाँ पर भी मक़ाम कर सकते हैं। मेरे ब्लौग पर सब तरह के लोग आते हैं। लेकिन मैं संवाद किनसे कर रहा हूँ इसे भी ध्यान में रखो!

camarun ने कहा…

After independence the British left without leaving concrete borders between India and Pakistan. Some of these issues were resolved and the territories were annexed without any serious problems later. However the situation in Kashmir remained ambiguous for a very long time. For a few months post indepedence, it actually stayed as an independent nation. Then the tribal invasion happened, backed by Pakistan. Maharaja Hari Singh appealed to the Indian government for military assistance and fled to India. He signed the Instrument of Accession, ceding Kashmir to India on October 26. Indian and Pakistani forces fought their first war over Kashmir in 1947-48.
India referred the dispute to the United Nations on 1 January. In a resolution dated August 13, 1948, the UN asked Pakistan to remove its troops, after which India was also to withdraw the bulk of its forces.
Once this happened, a "free and fair" plebiscite was to be held to allow the Kashmiri people to decide their future.
This has not happened till date.

It was only In 1957, Kashmir was formally incorporated into the Indian Union. It was granted a special status under Article 370 of India's constitution, which ensures, among other things, that non-Kashmiri Indians cannot buy property there.

There is this letter Pandit Nehru had written to Maharaja Hari Singh, that I read recently in Ramchandra Guha’s book, India After Gandhi, “..It is of vital importance that Kashmir should remain within the Indian Union.. but however much we may want this, it can not be done ultimately except through the goodwill of the mass of the population. Even if military forces held Kashmir for a while, a later consequence might be a strong reaction against this. Essentially, therefore, this is a problem of psychological approach to the mass of the people and of making them feel they will be benefitted by being in the Indian Union. If the average Muslim feels that he has no safe or secure place in the Union, then obviously he will look elsewhere. Our basic policy must keep this in view, or else we fail.”
Have we failed?
...or is it wrong just to ask this question?

अजित वडनेरकर ने कहा…

वामपंथी मक्कार हैं। जैसा कि विद्यार्थी जीवन में होता है, मैं अल्पसमय के लिए इनके प्रभाव में आया था, पर ज्यादा दिन रहा नहीं। अरुंधती मूर्ख तो हरगिज़ नहीं, मक्कार ज़रूर हैं।

देश की व्यवस्था या राजनीति से नफ़रत के चलते लोग अनजाने में कह बैठते हैं कि उन्हें देश पर गर्व नहीं है। भाई, सदियों की व्यवस्थाओं से हटकर संस्कृति, परम्पराओं, भूगोल के बारे में सोचिए। फिर जवाब दीजिए। गर्व करने लायक शायद कुछ नज़र आ जाए। सिर्फ राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक विषमता से ही तो यह तय नहीं हो जाता।

आपने बहुत संतुलित लिखा है।

भारत भूषण तिवारी ने कहा…

अभय जी,
पता नहीं क्यों आप प्रतिरोध की परंपरा को और उसके अवदान को अंडरप्ले कर रहे हैं. शायद मार्क्स-एंगेल्स की इस बात को आप हाईलाईट करना चाहते हैं कि पूंजीवाद एक बहुत बड़ी क्रांतिकारी शक्ति है.
जो उदाहरण मैंने दिए हैं वे अगर पूंजीवाद में ही आकर संभव हुए हैं तो पूंजीवाद भी कोई बैठे-बिठाये नहीं आ गया. आप जानते ही हैं कि उसके लिए भी बुर्जुआज़ी को सामंती शक्तियों के साथ लड़ाई लड़नी पड़ी है. मुझे नहीं पता कि आपके हिसाब से हमारे जीवन की शकल कैसी है पर मेरे दिए गए जिन उदाहरणों को आप 'थोड़ी-बहुत रियायतों' का मामला बता रहे हैं, मेरे विचार में उन (जैसी कई) रियायतों के समुच्चय ने ही वह 'शकल' डिफाइन की है. जहाँ आठ घंटे की सीमा आज लागू नहीं है, क्या कोई करिश्मा उन सेक्टर्स में यह सीमा लागू करवाएगा?
मुझे लगता है आप चीज़ों को बहुत आइसोलेशन में देख (या दिखा) रहे हैं. अगर टाटा में काम करने वाले कामगारों को आठ घंटे का दिन और घर आदि तमाम सुविधाएं मिल गई, तो इसके लिए कहीं न कहीं किसी न किसी ने लम्बी लड़ाई लड़ी है. चलिए आप ने यह तो माना कि महिला मताधिकार के लिए यूरोप में महिलाओं को संघर्ष करना पड़ा, पर उस पर भी आपने 'कुछ' विशेषण लगाकर 'इंटरनेश्नल वीमेंस सफ्रेज मूवमेंट' को खारिज सा कर दिया. मैंने दिए हुए उदाहरणों में से एक 'अमेरिका में कालों के के नागरी अधिकार' के बारे में भी क्या आपको लगता है कि उसे हासिल करने में जनांदोलन की भूमिका अतिरंजित रूप से पेश की गई है? पिछली सदी की दूसरी और तीसरी चौथाई में भारत समेत अन्य एशियाई और अफ्रीकी देशों में आई आज़ादी के लिए क्या केवल दूसरे विश्वयुद्ध का करिश्मा या संयोग ज़िम्मेदार था?
माफ़ कीजिये पर मुझे लगता है कि इस लेख में 'अरुंधति-बैशिंग' के माध्यम से आप 'लेफ्ट-बैशिंग' कर रहे हैं जो आजकल काफी लोगों का प्रिय शगल है. मनीषा जी को दिए गए गए जवाब में आपने वामपंथ को चिंतन परंपरा का कबाड़ा करने वाला करार भी दे दिया है. मगर गर्व करने और गाली देने के बीच में स्थित जिस बहुत सारी खाली जगह की बात आप कर रहे हैं, उसी जगह में रहकर ही बहुत सारे वामपंथी सोच वाले लोगों ने 'रचनात्मक' काम किया है और कर रहे हैं.

अभय तिवारी ने कहा…

भारतभूषण@
अरुंधति को 'माँ अरुंधति' और जनांदोलनो को 'इतिहास की सबसे रचनात्मक शक्ति' देखना मेरे अधिकतर मित्रों के लिए स्वाभाविक बुद्धि है। तो मेरे मित्र, या तुम मेरी बात सहज तौर पर मान लोगे, यह उम्मीद मैं कर भी नहीं रहा हूँ।

मेरी बात मत मानो, लेकिन इस पर सोचते रहना, धीरे-धीरे इनकी भूमिका को तोलते रहना। कभी फ़ुरसत हुई तो मैं इस पर स्वतंत्र लेख लिखूँगा।

चंद्रभूषण ने कहा…

अभय जी, किसी तकनीकी कारण से एक बार लिखी मेरी टिप्पणी यहीं पड़े-पड़े गायब हो चुकी है। दोबारा लिखने की बोरियत आप समझ सकते हैं। आपसे निवेदन है कि अरुंधति राय और गिलानी के चक्कर में कश्मीर के आम लोगों की तकलीफों की अनदेखी न करें। अरुंधति के बयान से अगर भारतीय मुख्यधारा के किसी एक व्यक्ति में भी कश्मीरी अवाम की तकलीफ के बारे में जानने की इच्छा पैदा होती है तो यह खुद में एक बड़ी सफलता होगी। नक्सल आंदोलन के दौरान बिहार के जिन गांवों में सीआरपीएफ के कैंप लगे होते थे, उनकी दशा मैंने देखी है। कश्मीर के जिन गांवों और कस्बों में पिछले पचीस वर्षों से कैंप लगे हैं, उनके दुख की कल्पना भी कर सकता हूं। गिलानी को मत देखिए। ये सज्जन अभी डेढ़ साल पहले श्रीनगर के अपने शानदार घर में बैठे मक्खियां मार रहे थे। सच पूछिए तो जिस दिन मीडिया नहीं पहुंचता उस दिन आज भी मारते हैं। कश्मीर के सुदूर गांवों और कस्बों में सरकारी दफ्तरों और गाड़ियों पर पत्थर चला रही औरतें वे हैं, जिनके शौहर सालों से लापता हैं, जिनके बेटों को अमानुषिक यातनाएं दी गई हैं, जिनकी बेटियों के साथ बलात्कार हुआ है। यह सब कहीं से पढ़ कर नहीं बोल रहा हूं। यह अपने करीब के हजार स्रोतों के जरिए जानी गई हकीकत है। दुनिया का कोई महाविमर्श इन दुखों की भरपाई नहीं कर सकता। आप किससे बहस करते हैं, यह नहीं, किसके पक्ष में खड़े होकर किसके खिलाफ बहस कर रहे हैं, यह महत्वपूर्ण है। अतीत में कई बार मैं आपको देश-दुनिया की सबसे मक्कार ताकतों के पक्ष में खड़े होकर बहस करते देख चुका हूं। कभी-कभी इन बहसों में काम की बातें भी पाई हैं। मसलन यहां भी पाई हैं। लेकिन अंतिम निष्कर्ष में ज्यादातर मौकों पर मुझे आपका नजरिया ताकतवर को सहलाने वाला ही लगता है। शायद वहां खड़े होकर आप अपनी विचार सरणियों में अतिरिक्त आत्मविश्वास पाते होंगे। बड़े विचारक तो आप अब बन ही चुके हैं। वामपंथी होने की अपेक्षा आपसे नहीं है- ऐसी अपेक्षा रखने वाला मैं होता कौन हूं- लेकिन आपकी बौद्धिक ऊर्जा में विश्वास और पुरानी दोस्ती के तकाजे से कभी-कभी कमजोर के पक्ष में सारे लात-जूते सहकर अकेले खड़े होने का जोखिम उठाने की अपेक्षा आपसे अंतिम सांस तक रहेगी।

चंद्रभूषण ने कहा…

अभय जी, किसी तकनीकी कारण से एक बार लिखी मेरी टिप्पणी यहीं पड़े-पड़े गायब हो चुकी है। दोबारा लिखने की बोरियत आप समझ सकते हैं। आपसे निवेदन है कि अरुंधति राय और गिलानी के चक्कर में कश्मीर के आम लोगों की तकलीफों की अनदेखी न करें। अरुंधति के बयान से अगर भारतीय मुख्यधारा के किसी एक व्यक्ति में भी कश्मीरी अवाम की तकलीफ के बारे में जानने की इच्छा पैदा होती है तो यह खुद में एक बड़ी सफलता होगी। नक्सल आंदोलन के दौरान बिहार के जिन गांवों में सीआरपीएफ के कैंप लगे होते थे, उनकी दशा मैंने देखी है। कश्मीर के जिन गांवों और कस्बों में पिछले पचीस वर्षों से कैंप लगे हैं, उनके दुख की कल्पना भी कर सकता हूं। गिलानी को मत देखिए। ये सज्जन अभी डेढ़ साल पहले श्रीनगर के अपने शानदार घर में बैठे मक्खियां मार रहे थे। सच पूछिए तो जिस दिन मीडिया नहीं पहुंचता उस दिन आज भी मारते हैं। कश्मीर के सुदूर गांवों और कस्बों में सरकारी दफ्तरों और गाड़ियों पर पत्थर चला रही औरतें वे हैं, जिनके शौहर सालों से लापता हैं, जिनके बेटों को अमानुषिक यातनाएं दी गई हैं, जिनकी बेटियों के साथ बलात्कार हुआ है। यह सब कहीं से पढ़ कर नहीं बोल रहा हूं। यह अपने करीब के हजार स्रोतों के जरिए जानी गई हकीकत है। दुनिया का कोई महाविमर्श इन दुखों की भरपाई नहीं कर सकता। आप किससे बहस करते हैं, यह नहीं, किसके पक्ष में खड़े होकर किसके खिलाफ बहस कर रहे हैं, यह महत्वपूर्ण है। अतीत में कई बार मैं आपको देश-दुनिया की सबसे मक्कार ताकतों के पक्ष में खड़े होकर बहस करते देख चुका हूं। कभी-कभी इन बहसों में काम की बातें भी पाई हैं। मसलन यहां भी पाई हैं। लेकिन अंतिम निष्कर्ष में ज्यादातर मौकों पर मुझे आपका नजरिया ताकतवर को सहलाने वाला ही लगता है। शायद वहां खड़े होकर आप अपनी विचार सरणियों में अतिरिक्त आत्मविश्वास पाते होंगे। बड़े विचारक तो आप अब बन ही चुके हैं। वामपंथी होने की अपेक्षा आपसे नहीं है- ऐसी अपेक्षा रखने वाला मैं होता कौन हूं- लेकिन आपकी बौद्धिक ऊर्जा में विश्वास और पुरानी दोस्ती के तकाजे से कभी-कभी कमजोर के पक्ष में सारे लात-जूते सहकर अकेले खड़े होने का जोखिम उठाने की अपेक्षा आपसे अंतिम सांस तक रहेगी।

मनीषा पांडे ने कहा…

अजीत जी, आई ऑब्‍जेक्‍ट कि वामपंथी मक्‍कार होते हैं। वामपंथियों में ऐसे बहुत से व्‍यक्ति होंगे जिनकी सोच या चरित्र मक्‍कारी भरा हो सकता है, लेकिन एक ही झाडू से सबको हांक देना और यह कह देना कि वामपंथी मक्‍कार होते हैं, से मैं सहमत नहीं। और हां जहां तक गर्व की बात है तो बेशक भोपाल की झीलों पर मुझे गर्व है, डिंडोरी के पहाड़ों और जंगलों पर, मंडला की बरसात पर, यहां की आदिवासी संस्‍कृति पर, हमारे देश की संस्‍कृति की बहुत सारी चीजों पर, इतिहास पर। इन सब पर गर्व है, लेकिन इस गर्व वे चीजें कमजोर नहीं हो जातीं, जिस पर गर्व नहीं शर्म है।

भारत भूषण तिवारी ने कहा…

अभय जी,
बहस के दौरान जब अंग्रेज़ी वाले 'माइ फ्रेंड' बोलते हैं तो उसमें यूफेमिज़्म मिला होता है; उम्मीद है आपके 'मेरे मित्र' संबोधन में वह छटा नहीं है.
अपने आपको वामपंथी मानने वाले बहुत सारे लोग (जिनमें शायद आपके मित्र भी शामिल होंगे) अरुंधति को 'माँ अरुंधति' के रूप में यूलोजाइज़ नहीं करते. वे लोग जनांदोलनों को 'इतिहास की सबसे रचनात्मक शक्ति' मानते हैं यह कहना भी एक खतरनाक सरलीकरण है.
मगर एक महीने के भीतर ही लेफ्ट-विंग और राइट-विंग (या बकौल अजित भाई, मक्कार और अदरवाइज़) दोनों को पुलकित करने वाली आपकी अदा माशाअल्लाह है:)
आपके स्वतंत्र लेख का इंतज़ार रहेगा.

अभय तिवारी ने कहा…

चन्दू भाई, मैं टीवी व फ़िल्म की दुनिया का एक मामूली लेखक हूँ, जो अभी भी अपनी जगह ठीक से नहीं बना सका है। ताक़तवर की सरिणियों में खड़े होने का मेरा अनुभव शून्य है। किसी छोटे-मोटे सरकारी अफ़सर तक से मेरी जन-पहचान नहीं है। सत्ता के दलालों के बारे में मैं सुनता रहता हूँ। लेकिन उनसे मुझे मिलने वाले जिस आत्मविश्वास की कल्पना आप कर रहे हैं, वो मेरे पास नहीं है।

मैं आप जैसे मित्रों से ही आईडेन्टीफ़ाई करता हूँ और उनके साथ ही जो कुछ सोचता-समझता हूँ, उसे लेकर सफ़ाई हासिल करने की कोशिश करता हूँ। अन्तिम सत्य प्राप्त कर लेने का कोई मुग़ाल्ता मुझे नहीं है। एक प्रक्रिया है, उसमें इस पल में जो सही समझ आ रहा है उसे ईमानदारी से पेश करना मैं ज़रूरी समझता हूँ। बेईमानी तो यह होगी कि अपने संशयों को किनारे करके पुरानी प्रस्थापनाओं को दोहराते जाना। और मेरी दुनिया आप जैसे मेरे प्रगतिशील-वामपंथी मित्र हैं जिनसे अलग-थलग हो जाने का जोख़िम उठाते हुए मैंने यह लेख लिखा है।

मेरा एक प्रिय दोस्त भी एलटीजी की उस प्रसिद्ध सभा में अरुंधति के बगल वाली कुर्सी पर बैठा था, और वह तब से लगातार अरुंधति और गीलानी के पक्ष में लेख लिख रहा है। यह लेख लिखते हुए मैंने बराबर उसे ख़फ़ा करने के ख़तरे के साथ संघर्ष किया है।

सत्ता में, राज्य में मेरा निवेश ही क्या है, दोस्त ही वो असली निधि होते हैं जिनके न होने पर आदमी सचमुच अकेला पड़ जाता है, और वह जोखिम मैं उठा रहा हूँ।

अजित वडनेरकर ने कहा…

@मनीषा,
मेरा आशय राजनीति के मक्कारों से या बयानवीरों से है। निश्चित ही मेरा पूर्व कथन असावधानीवश लिखा गया है। नैतिक और ईमानदार चरित्र वाले भी हर संगठन में होते हैं।

अभय तिवारी ने कहा…

भारत भूषण,

आग का आविष्कार? अरा वाला पहिया? खेती? भाप का इंजन? नक्षत्र विज्ञान? खनन? औज़ार? बिजली? बल्ब? कैमरा? मकान? मुद्रा? भाषा? लिपि? रौकेट? दूरबीन? खुर्दबीन? कम्प्यूटर? इन्टरनेट? क्या इन चीज़ों से नहीं बनी है हमारे जीवन की शक्ल? और इन में क्या है जनांदोलनों का योगदान? और यह भी सोचो, क्या ईसा और बुद्ध की करूणा भी किसी जनांदोलन से उपजी थी? इमैन्वल काण्ट ने क्या मानवाधिकारों की कल्पना करने के लिए कोई जनांदोलन किया था या किसी जनांदोलन के दबाव में ऐसा चिन्तन पेश किया था?

और अगर यह अदाबाज़ी ही है तो फिर इस संवाद की ज़रूरत ही क्या है?

भारत भूषण तिवारी ने कहा…

अभय जी,
ज्ञान-विज्ञान की उपलब्धियों (और उन से मनुष्य के जीवन-स्तर में हुए बदलावों) के सामने आप मनुष्य की सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों और उन से प्रभावित होने वाले जीवन को नज़र-अंदाज़ कर रहे हैं. जिन बातों का आपने उल्लेख किया है उनके महत्त्व से कोई इनकार नहीं है.जैसा कि मैंने पहले भी कहा मार्क्स-एंगेल्स ने खुद पूंजीवाद को क्रांतिकारी शक्ति बताया है. ईसा और बुद्ध की करुणा और एमैन्युएल कांट की मानवाधिकारों की संकल्पना जैसे बातों को जनांदोलनों से जोड़ना कन्फ्यूजन पैदा करना है,आप इन बातों को इंडीविज्युअल महानताओं का शाहकार बताकर उन महानताओं को महान बनाने वाली सोशल डायनामिक्स को डाउनप्ले कर रहे हैं. जनांदोलनों को 'सबसे रचनात्मक शक्ति' माना जाये यह मेरा आग्रह बिलकुल नहीं है.
'अदाकारी' शब्द के इस्तेमाल से आपको बुरा लगा; माफ़ी चाहता हूँ. मगर आपने अपने लेख में 'मक्कारी', 'मूर्खता' जैसे शब्दों को कई बार रीपीट किया है. इनके आधार पर मैं क्यों न कहूँ कि 'संवाद की ज़रुरत ही क्या है'?

अभय तिवारी ने कहा…

मूर्खता व मक्कारी वाले पद अब मुझे ख़ुद ही अतिरंजित लग रहा है, लेकिन चला गया तो चला गया। उसकी आलोचना सुनने के लिए मैं तैयार हूँ। शायद उसकी जगह अधिक उपयुक्त होता - वे नासमझ है या शातिर? या कुछ और ही..

और मेरा संवाद अरुंधति से नहीं मेरे मित्रों से है.. लेकिन आप मेरी अदाबाज़ी पर मुझसे बात करना चाहते हैं, क्या हासिल करेंगे। क्योंकि आप ने तो पहले ही तय कर लिया कि मैं बूझ-समझ कर एक खेल खेल रहा हूँ।

अजित वडनेरकर ने कहा…

मूर्खता और मक्कारी वाले पद में कोई अतिरंजना नहीं है अभय भाई। शातिर और नासमझ में कुछ जुदा ध्वनित नहीं होता और न ही अर्थवत्ता बदलती है खासतौर पर प्रस्तुत संदर्भों में, चर्चित संदर्भों में।
डटे रहिए।

भारत भूषण तिवारी ने कहा…

अभय जी, आप बूझ-समझ कर खेल कर रहे हैं ऐसा मेरा मानना बिलकुल नहीं है और और यह जताने की मेरी कोशिश भी नहीं है. अजित जी की टिप्पणी नहीं पढ़ी होती तो मैं भी कह देता कि 'अदा' शब्द का इस्तेमाल भी अतिरंजना है. अजित जी या आप बताइए कि 'अदा' से डेलीबरेशन का बोध होता है या नहीं. या फिर मैं यह सवाल शब्द-चर्चा समूह पर उछाल देता हूँ. अगर ऐसा है तो फिर एक बार माफ़ी मांगता हूँ और नहीं तो आप बेवजह बुरा मान रहे हैं:)

मनीषा पांडे ने कहा…

Please read this -

http://www.tehelka.com/story_main47.asp?filename=Ne061110Coverstory.asp

अभय तिवारी ने कहा…

देखा है इस लेख को..
यह अरुंधति के बोलने के अधिकार के पक्ष में है और कश्मीरियों के आत्मनिर्णय के अधिकार के पक्ष में। मेरी दोनों से सहमति है।
लेकिन मेरे इस लेख की दिशा दूसरी है.. और अगर अरुंधति को बोलने का हक़ है तो हम को भी तो है। या दूसरे लोगों से सिर्फ़ सुनने की अपेक्षा की जाती है?

मुनीश ( munish ) ने कहा…

देखिये आप चर्चा करें अच्छा है किन्तु अंततोगत्वा श्रद्धेय पंडत अनिल शर्मा जी द्वारा प्रतिपादित नीति ही कश्मीर विषयक प्रत्येक बयान की कसौटी हो सकती है . बाकी बातों की जहाँ तक बात है तो गलत आप भी नहीं हो पर हम ठीक हैं :)

बेनामी ने कहा…

गज़ब भाई. कुछ टिप्पणियां पढ़कर लग रहा है कि इस देश में या तो अरुंधति, सुजात भद्र और माओवादी रहेंगे या फिर मोहन भागवत. बाकी लोगों के लिए जगह नहीं है?

ये तो जार्ज बुश वाली बात हो गई. आप हमारे साथ नहीं है तो आप हमारे खिलाफ हैं.

डॉ .अनुराग ने कहा…

अभय जी.......बहस की दिशा गलत दिशा में मुड गयी है ....सच कहूँ तो मुझे ऐसा लगता है .इस देश के वामपंथी अरुंधती से असहमति को वामपंथ पे हमले की तरह देख रहे है ..मुझे यही हैरान कर देने वाला है......
वे ऐसा क्यों मानते है के केवल अरुंधती के हस्तक्षेप से ही केंद्र सरकार इस मुद्दे पर गंभीर होगी .....या इस मुद्दे पर इससे पहले कोई गंभीर नहीं हुआ ? क्लिंटन के दौरे से ठीक पहले चालीस सिखों की हत्या ? कितने साल हुए ?

दरसल ओबामा के आगमन से पहले मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर जगह देने का अलगवादी तरीका था .जिसमे अरुंधती इस्तेमाल हुई है ....सवाल सच कहाँ कैसे ओर किन परिस्थितियों में बोला जाये इस पर है ..नीयत पर है....यदि हम मधु कौड़ा के साथ मंच साझा करते हुए इमानदारी ओर भ्रष्टाचार पर दलीले देंगे तो जाहिर है नीयत पर शक होगा ही
..देख रहा हूँ बड़े बड़े बुद्दिजीवी लम्बे चौड़े तर्कों .से सीधे कई चीजों के तौर एक साथ जोड़ रहे है .....बिना ये सोचे के ये एक राजनैतिक जटिल समस्या है ....जिसका हल रातो-रात .किसी आदर्शवादी तरीके से नहीं हो सकता .....
अरुंधती जैसी सोच यदि हम इख़्तियार रखते तो शायद आज पंजाब इस देश का हिस्सा होता ?
अरुंधती क्या नादान है ?वे फ़ौज के लिए विशेष तौर पर "सबसे क्रूरतम" शब्द का इस्तेमाल करती है ? भारतीय समाज की व्यवस्था को सीधे कश्मीर से जोड़ देती है ?
क्या कश्मीर में अपराध नहीं होते है ?क्या कश्मीर में ताकतवर या कमजोर की लड़ाई नहीं होती है ?क्या पूरे विश्व में कोई ऐसा समाज है जहाँ एक आदर्श व्यवस्था हुई है .?जहाँ शोषण न होता है ....कौन सा देश .....चीन......भारत का बंगाल राज्य ?क्या वे आदर्श राज्य है ?कोई भी समाज मनुष्यों के समूहों से बनता है .....ओर मनुष्य अपनी स्वभाव नहीं भूलता चाहे वो भी किसी भी वाद में यकीन करता है ..ईष्या....सत्ता ...लालच ...ये वाद नहीं देखते है ....न जात .न पात..........?
जिन लोगो ने अरुंधती का पहला लेख नक्सल वाद पर पढ़ा था ...वे जब हिंसा को गलेम राइज़ करती है(outlook में नक्सलवाद पर उनका लेख ) तो समझ नहीं पाता हूँ के किसी लोकतान्त्रिक देश में किसी जटिल समस्या के हल के लिए उनके पास सर्जिकल टूल ही इस्तेमाल के लिए क्यों है .यदि है तो एक हिंसा को न्यायोचित ठहराती है दूसरी ओ अन्याय क्यों ?क्या नक्सल वादी हिंसा अपने मार्ग से भटकी नहीं है ..क्या हिंसा का भी कोई आदर्श होता है ?

अजीब बात है हम एक व्यवस्था से निकलकर सिर्फ दूसरी व्यवस्था बना रहे है .....ओर ऐसी कल्पना कर रहे है .....वो इससे इतर होगी ..हम ऐसा करके कितने टुकड़े करेगे ?
सवाल ये नही के कश्मीर पे अब तक जो कुछ हुआ जायज है .... .....सरकार सरकारी तंत्र बिलकुल बेदाग़ है .......पर ये भी सच है के वहां सब कुछ इतना पाक साफ नहीं है ..

डॉ .अनुराग ने कहा…

किसी भी संवेदनशील जगह जहाँ सेना लम्बे समय से तैनात है जहाँ सेना .लोग .....दोनों बेहद तनाव की स्थिति से गुजर रहे है ?एक ऐसा प्रदेश जो भारत के लिए सुरक्षा की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है ....जिस पर पड़ोस के दो देश बरसो से घात लगाए बैठे है .ओर उनकी विदेश -नीति का एक बड़ा हिस्सा है .वहां एक मौत भी अपने कई असर रखती है .इतना के सामान्य अपराधिक हालात में हुई मौते भी बदल कर किसी भी दिशा में विस्फोटक स्थिति पैदा कर सकती है ....
लोकतान्त्रिक तरीके से से चुनी हुई ऐसी सरकार जो किसी अति संवेदनशील क्षेत्र में काम कर रही है .....उससे अतिरिक्त सूझ बूझ ओर सतर्कता की अपेक्षा की जाती है .क्यूकी उसमे शामिल नुमाइंदे वहां की लोकल जनता के प्रतिनिधि है .....दुर्भाग्य से वे हालात के आकलन में फेल हुए ये मेनेजमेंट फेलियर है ..... किसी ऐसी समस्या को जो ६३ साल से हमारे देश के लिए चिंता का विषय रही किसने कहा के कश्मीर में अन्याय नहीं हुआ ? हुआ है .....
...किसी आदर्शवादी हल की अपेक्षा करना भी यथार्थ से उतना ही मुंह मोड़ना है .क्या कारण है ४ महीने पहले सामान्य की ओर बढ़ते ऐसे प्रदेश में अचानक ऐसे हालात क्यों पैदा हुए के स्थितिया इतनी विस्फोटक हो गयी...इसके पीछे असंतोष के अलावा कई राजनैतिक ओर अंतर्राष्टीय आंतकवाद से घुले मिले कई कारण है .

डॉ .अनुराग ने कहा…

इस सबसे जरूरी बात ये है के हम कश्मीर के लोगो को आत्मनिर्णय देने के अधिकार में उन पांच लाख हिन्दुओ की भागीदारी ओर वर्तमान में वहां रह रहे ८० हज़ार सिखों की भागेदारी ओर उनके भविष्य के विषय में कश्मीर की कोई भी राजनातिक पार्टी स्पस्ष्ट व्याख्या नहीं करती है ?किसी ने उन निष्काषित हिन्दुओ को वापस लौटने ...उनकी संपत्तियों को वापस सौपने ओर उसी राज्य में अन्य नागरिको की तरह आज़ादी से जीने की बात नहीं की है ...मै ब्लॉग ओर फेसबुक में भी अलग अलग समझदार लोगो से ये प्रशन पूछ चूका हूँ ...तमाम मेग्जिनो ओर टी.वी चैनलों में सारे इंटरव्यू देख सुन चूका हूँ....पर सब इससे बड़ी समझदारी से बचके निकल जाते है....

क्या मुझे यहाँ कोई उत्तर देगा ?

आखिर न्याय ओर नैतिकता का तो कोई धर्म ?वाद या जात नहीं होता ?

या होता है ?

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कहा…

सचमुच आपका लेख बहुत खरा है। आपके बार-बार पूछे गये एक प्रश्न का सीधा उत्तर है कि मोहतरमा कहीं मूर्ख भी हैं और कहीं मक्कार भी। शातिर होना तो उनके लिए बहुत स्वाभाविक है।

आपने कहा कि कश्मीरियों के अलग होने के अधिकार से आप सहमत हैं। अपने बारे में निर्णय लेने की आजादी उन्हें होनी ही चाहिए। सिद्धांत रूप में इससे पूरी तरह सहमत होने के बावजूद मुझे मौजूदा परिस्थितियों में इसके क्रियान्वयन पर आपत्ति है।

भारत जैसे एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य से अलग होकर एक धर्मांध कट्टर इस्लामी अलोकतांत्रिक अस्थिर देश के साथ पूर्ण या आंशिक रूप से मिल जाने को आतुर कुछ भ्रष्टबुद्धि के गिलानियों के हाथ में कश्मीर की आम जनता का भविष्य सौंप देने की संभावना से भरे कथित आत्मनिर्णय के अधिकार का प्रयोग करने की स्थिति अभी नहीं बन पायी है। भारत से अलग होने का निर्णय कश्मीरियों के लिए हर प्रकार से एक मूर्खतापूर्ण और आत्मघाती निर्णय होगा। लेकिन लादेन के बताये रास्ते पर चलने वालों ने वहाँ की परिस्थिति इस समय ऐसी ही बना दी है कि सभी पक्षों के अहित से भरा निर्णय वे सुना सकते हैं।

कहना न होगा कि भारत की सुरक्षा की दृष्टि से भी कश्मीर का हाथ से निकल जाना बेहद खतरनाक है।

बेनामी ने कहा…

देश का जितना नुकसान इन संघियों और नकली वामपंथियों ने किया है उतना तो अंग्रेजों ने भी नहीं किया था। और यह सब मजदूर वर्ग और आम जनता को भुलावे में डालने के लिए पूँजीपति वर्ग का षडयंत्र है। मगर कोई यह ना भूले की थसीस से ही एन्टी थिसीस थॉट पैदा होता है। असली कम्यूनिस्ट ताकतें जिस दिन सिरमौर होंगी उस दिन ये दानों एक दूसरे की चढ्ढी में घुस जाएंगे।

गौरव ने कहा…

अभय जी , इस शानदार लेख के लिए बहुत-बहुत बधाई ! जिस तरह से आपने अरुंधती की कई बातों से सहमत होते हुए भी , उससे अपना विरोध प्रकट किया , वह वाकई प्रशंसा के लायक है. कुछ ही लोग मिल पाते हैं जो "राइट विंग - लेफ्ट विंग" , "हम / वो " की बाइनरी से उपर उठकर सोच पाते हैं.

"मूर्खता है या मक्कारी ?" अरुंधती जैसी लेखिका को इन सरल खाचों मैं शायद ऩही डाला जा सकता, जैसा आप खुद मान रहें हैं. शायद मानव समझ की कमज़ोरियों पर ये लिंक कुछ मददगार साबित हो :
http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_cognitive_biases

specially http://en.wikipedia.org/wiki/Confirmation_bias

JHAROKHA ने कहा…

praveen trivedi ji,
arundhati rai ke baare me main aapke vihaaro ka swagat karti hun.saath hi saath nirmal anand ji ke aalekh ko prastut karne ke liye aapko v nirmal ji ko bahut bahut badhai.dipawali avam bhia-duuj ke pawan parv par aapko bahut bahut
shubh kamna.
poonam

डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

इस आलेख का शीर्षक "अरुंधति कौन है" शायद बेहतर होता, किसी व्यक्ति की नीयत जानने के लिए वह कौन है जानना जरूरी है ।
मूर्ख मक्कार नहीं हो सकता और मक्कार मूर्ख नहीं।
कुछ लोगों के विचार हैं उन्हे इस देश से कोई लगाव या खुशी नहीं है , बढ़िया है , ये इस देश को छोड़ क्यों नहीं देते। इनका हाल भी भारत सरकार की सोच जैसा लगता है जो हमेश इस आशंका से ग्रस्त रहती है की कहीं कानून व्यवस्था न बिगड़ जाए इस अंदेशे में कुत्ते भौंके हजार हाथी चले बाजार की नीति पर चल रही है।

डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

?

Mukta ने कहा…

अरे वह तो पूरी तरह फँस गई। अब उसको गालियाँ देने या आलोचना करने से कुछ भी नहीं होने वाला। वह पैर पीछे नहीं हटा सकती, चाहे उसकी जान ले लो। उसको पुरस्कार ही यह काम करने के लिये दिया गया था। मरती क्या न करती। उसको मरते दम तक यह सब करना ही होगा। बुकर हो या आस्कर या नोबेल इसके निशाने पर कौन लोग आते हैं क्या इतना भी नहीं समझते? सावधानी उसे पहले दिखानी थी, लेकिन- बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय? लिया पुरस्कार विदेश का तो चैन कहाँ से होय। बुकर वालों का बकरा बन गई वह तो।

Arun ने कहा…

बहुत दिनो बाद इंटरनेट पर इतना प्रभावशाली
लेख पढ़ा ,वो भी हिन्दी मे
अरुंधती रॉय या और कोई जो भी सस्ती लोकप्रियता चाहता है, इसी प्रकार के सनसनीखेज बयान देता रहता है और अपने भारत देश को गाली देना तो जैसे फैशन बन गया है
सभी लोग बस गाली देते है कोई भी सुधारने का प्रयत्न नही करता है
ये लेख मैने प्रकाशित होने के बहुत दिनो बाद पढ़ा है ये मेरा दुर्भाग्य है
मै आशा करता हूँ कि अब मै इस ब्लॉग से लगातार संपर्क मे रहूँगा
धन्यवाद !

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