गुरुवार, 12 अगस्त 2010

सदाचार और छिनार


हिन्दी जगत आजकल एक नैतिक अत्याचार की भावना से उबल रहा है। निन्दा और भर्त्सना प्रस्ताव निकाले जा रहे हैं, ज़िन्दाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगाए जा रहे हैं। आप समझ ही गए होंगे कि मैं विभूति नारायण राय के कुख्यात बयान और उससे उपजी प्रतिक्रियाओं की बात कर रहा हूँ। इसके पहले कि मैं अपनी बात रखूँ मैं मैरी ई जौन नाम की एक नारीवादी के एक ईमेल का उद्धरण देना चाहूँगा। वे इसी विवाद के सन्दर्भ में लिखती हैं-

"हम उस नैतिक आघात से सहमत नहीं है जो वेश्यावृत्ति या बेवफ़ाई के उल्लेख भर से मीडिया में आता रहा है। बल्कि हम यक़ीन करते हैं कि यौनिकता के मसले गम्भीर मसले हैं, जिन पर और सार्वजनिक बहस और समझदारी की ज़रूरत है। नारीवाद के नज़रिये से यौनिकता के मामले को और समझने के लिए हमें राय जैसे लेखकों को चुनौती देनी चाहिये ना कि सार्वजनिक नैतिकता में उलझना चाहिये।"

मैरी जौन ने सहज रूप से इस मामले के मूल में बैठी समस्या को रेखांकित कर दिया है। मेरी नज़र में हिन्दी जगत से अभी तक एक भी प्रतिक्रिया ऐसी नहीं आई जिसने इस मसले को नैतिक अतिक्रमण से अलग किसी नज़रिये से देखने की कोशिश की हो। उपकुलपति महोदय ने कहा, “लेखिकाओं में होड़ लगी है यह साबित करने के लिए उनसे बड़ी छिनाल कोई नहीं है।” उसके जवाब में कहा गया “..लेखिकाओं के बारे में अपमानजनक वक्तव्य.. न केवल हिंदी लेखिकाओं की गरिमा के खिलाफ है, बल्कि उसमें प्रयुक्त शब्द स्त्रीमात्र के लिए अपमानजनक है।”

देखने में दोनों एकदम विपरीत बयान मालूम देते हैं मगर एक जगह जाकर दोनों एक हो जाते हैं- राय जब वर्तमान स्त्रीलेखन को छिनाल के अपमानजनक विशेषण से नवाजते हैं तो वे छिनाल का इस्तेमाल इस अर्थ में करते हैं कि छिनालपन एक निन्दनीय कृत्य है जिस से बचा जाना चाहिये। और दूसरी तरफ़ उनका विरोध करने वाले इस बात पर आपत्ति करते हैं कि राय गरिमामय हिन्दी लेखिकाओं के लिए 'छिनाल' जैसा अपमानजनक शब्द कैसे प्रयोग कर सकते हैं? ‘छिनाल’ के अपमानजनक होने पर दोनों की सहमति है! दोनों ही परोक्ष रूप से मान रहे हैं कि स्त्री का वांछित, नैतिक रूप 'सती-सावित्री' वाला ही है।

एक और मज़े की बात यह है कि एक पेटीशन जो राय साहब को हटाने के लिए नेट पर चलाया जा रहा है, उस में और अंग्रेज़ी प्रेस में भी इस छिनार शब्द का अनुवाद प्रौस्टीट्यूट किया गया है। जो निहायत ग़लत है। प्रौस्टीट्यूट के लिए रण्डी या वेश्या शब्द है। रसाल जी के कोष में छिनार का अर्थ है व्यभिचारिणी, कुलटा, परपुरुषगामिनी, और इसकी उत्पत्ति छिन्ना+नारी से बताई गई है। इन्ही में इस शब्द की पूरी राजनीति छिपी हुई है, वो राजनीति जो इस शब्द की आड़ लेकर महिला लेखकों पर हमला करने वाले विभूति नारायण राय और उनका उच्च स्वर से विरोध करने वाले तथाकथित प्रगतिशीलता के ठेकेदारों को एक ज़मीन पर खड़ा कर देती है।

वैवाहिक सम्बन्ध से इतर दैहिक सम्बन्ध बनाने से जिसका चरित्र खण्डित होता हो, वह है छिनाल। हज़ारों सालों तक थोड़े से भी दैहिक विचलन की कड़ी से कड़ी सज़ा स्त्री को दी जाती रही है हर समाज में। आज भी कई समाज ऐसे हैं जहाँ किसी भी ‘अवैध’ सम्बन्ध की सज़ा अकेले नारी को ही मिलती है, पुरुष को कुछ नहीं। इसी तरह के दोहरे व्यवहार, दोहरी नैतिकता का नतीजा है यह छिनार का शब्द।

स्त्री को अपने शरीर का स्वामित्व नहीं है। आज भी कई समाज व नैतिक परम्पराएं उसे गर्भनिरोध या गर्भपात नहीं कराने देतीं। कई उसे परदे से बाहर नहीं आने देतीं। स्त्री सम्पत्ति है इसीलिए उसका ‘स्वामी’ होता है, उसका ‘पति’ होता है। उसकी कोख पर उसका नहीं उसके स्वामी का अधिकार है। इसीलिए अगर वह किसी अन्य से यौन सम्बन्ध बनाये या गर्भधारण करे तो पापचारिणी कहलाती है। और सन्तान भी नाजायज़ हो जाती है। बहुत हाल तक सन्तान की माता के प्रति ही पूरे सत्यापन से कहा जा सकता था, पिता के प्रति हरगिज़ नहीं। मगर फिर भी अज्ञात पिता होने से, या वैधानिक पति की सन्तान न होने से सन्तान अवैध / नाजायज़ / हरामी हो जाती थी/ है।

गर्भनिरोध आदि के ज़रिये आज स्त्री के लिए अपने शरीर पर स्वामित्व और अधिकार पाना मुमकिन हो गया है। इतिहास में पहली बार, सारे प्राणियों से अलग, आज औरत के लिए यह सम्भव है कि वह बिना गर्भधारण की चिंता किए दैहिक सुख ले सके जैसे आदमी लेता रहे हैं हमेशा। लेकिन ‘पुरुष’ मानसिकता उस की इस आज़ादी के साथ सहज नहीं है; वह उसे मातृत्व और पत्नीत्व के दायरे में ही क़ैद रखना चाहता है, जहाँ स्त्री मनुष्य नहीं, देवी होती है, सती-सावित्री होती है। स्त्री यदि भोग की, दैहिक आनन्द की बात करती है तो लोग असहज हो जाते हैं; कहते हैं कि बाक़ी सब बात करो, ये मत बात करो!

अपने साक्षात्कार में राय कहते हैं “इस पूरे प्रयास में दिक्कत सिर्फ इतनी है कि यह देह विमर्श तक सिमट गया है और स्त्री मुक्ति के दूसरे मुद्दे हाशिये पर चले गए हैं।” मेरा मानना है कि यह सलाह वैसे ही है जैसे कि बहुत सारे लोग मायावती की राजनीति से नाक-भौं सिकोड़ते हैं कि वे 'जातिवाद' फैला रही हैं। वे कहते हैं कि आरक्षण की बात मत करो, योग्यता की बात करो। इसी तरह राय कह रहे हैं “देह से परे भी बहुत कुछ ऐसा घटता है जो हमारे जीवन को अधिक सुन्दर और जीने योग्य बनाता है” मेरा कहना है कि ज़रूर होगा और ज़रूर है मगर जिस आधार से स्त्री वर्ग को हज़ारों सालों से पीड़ित किया गया हो वो थोड़ी आज़ादी मिलने पर उस आधार की उपभोग न करे, तो ये कैसे आज़ादी है? स्त्री का शोषण और उत्पीड़न उसकी देह के आधार पर ही हुआ है, तो अब यह लाज़िमी है कि उसकी आज़ादी के संक्रमण में दैहिक विमर्श एक केन्द्रीय भूमिका में रहे। और फिर सबसे बड़ी बात ये भी है कि स्त्रियां स्वयं तय करेंगी कि वे किस बारे में लिखना चाहेंगी और किस बारे में नहीं।

अंत में मैं एक बात यह भी कहूँगा कि इस मसले पर विभूति नारायण राय के जो विचार हैं उनसे मैं ज़रूर असहमत हूँ, मगर निजी तौर पर मुझे उनमें ऐसा कुछ भी नहीं लगता कि जिस पर इस तरह का 'राजनीतिक' बावेला खड़ा किया जाय। ये सब साहित्य की अन्दरूनी बहस के मसले हैं इन पर ज़ोरदार बहस होनी चाहिये न कि लोगों का मुँह बन्द करने की कोशिशें। छिनाल जैसा शब्द अपमानजनक ज़रूर है और 'नैतिक' आधार पर ग़लत भी, परन्तु उसी नैतिकता के आधार पर जिसकी ऊपर चर्चा की गई। दूसरी ओर छिनार के समान्तर अंग्रेज़ी के 'स्लट 'और 'बिच' जैसे शब्द, अपमानजनक बने रहते हुए भी, सहज इस्तेमाल में आ गए हैं और नारीवाद ने भी उन के अर्थों को पुनर्परिभाषित कर के समाज को अपना रवैया बदलने पर मजबूर किया है।

पिछले दिनों रवीश कुमार ने भी पंजाब में आए एक नए बदलाव को पकड़ा। हज़ारों सालों से उत्पीड़ित दलित सीना ठोंक कर गा रहे हैं-अनखी पुत्त चमारा दे। जबकि दलित मामलों के प्रति संवेदनशील उत्तर प्रदेश में इसी शब्द के इस्तेमाल पर सज़ा हो सकती है।

हिन्दी समाज की नैतिकता के रखवाले शब्दों के प्रति कुछ अधिक ही संवेदनशील है और समाज के 'सदाचार उन्नयन अभियान' में संलग्न हैं। उल्लेखनीय है कि शब्दों को लेकर सदाचारी और असहिष्णु रवैये की एक अभिव्यक्ति जौर्ज औरवेल के ‘१९८४’ जैसे समाज में भी होती है।



20 टिप्‍पणियां:

Farid Khan ने कहा…

पिछले कई दिनों से मैं हर जगह 'राय' के समर्थन और विरोध में पढ़ पढ़ कर पक गया था। अच्छा हुआ इस समय आपकी यह टिप्पणी आई। आप शायद ऐसा इसलिए लिख पाये कि आप साहित्य की किसी गुटबाज़ी में नहीं है। किसी का ऋण नहीं चुकाना है आपको।

Neeraj Rohilla ने कहा…

पिछ्ले गुरूवार को एक मित्र का जन्मदिन था तो उसके कुछ मित्रों के साथ एक पियानो बार साथ में दारू पीने गये। मेरी मित्र की एक सहेली भी थी साथ में जो यहाँ स्कूल में साहित्य में शोधरत हैं।
बार का मजमून कुछ इस प्रकार था कि वो कभी पुरूषों, अधिकतर महिलाओं को स्टेज पर बुलाते थे और तरह तरह से उनसे मौज लेते थे।

जब उन्होने सभी लडकियों से साथ में नाचने का आग्रह किया तो मेरे बगल में खडी उस सहेली से मैने कहा कि, "You should join them"

इस पर वो हंसी और बोली, "Like I am nothing but a sex object" हम हंस दिये और कहा कि खुशकिस्मत हो कि बुला रहे हैं हम देखो खडे हैं और नाचने का इन्तजार कर रहे हैं।
इसके बाद मौज होती रही, और हर लडकी को स्टेज से विदा करने से पहले बार के पियानो बजाने वाले और गाना गाने वाले और सभी मेहमान एक स्वर में (लडकियां भी साथ में) चिल्लाते थे, "You Bi***, you sl**, you wh***"|

इस पर हमने फ़िर बगल वाली से पूछा (जो इस स्वर में स्वर मिला रही थी), "So, the feminist movement goes down the drain?"

वो फ़िर से हंसी और बोली कि, "I don't care right now because I am just having fun"

इससे बडी फ़ैमिनिस्ट की परिभाषा और नहीं हो सकती, उसे जब बुरा लगेगा इसका फ़ैसला वो खुद लेगी। और अगर एक बात पर वो हंस कर टाल दे तो इसका मतलब नहीं कि आपको बदतमीजी करने का लाईसेंस मिल गया।
यही स्वतंत्रता भी है, आप और मैं केवल अपना व्यवहार तय कर सकते हैं, उसका व्यवहार और उससे सम्बधित बातें महिला खुद तय करेगी।

विषयांतर हो जायेगा लेकिन एक बार एक मित्र से Racism पर बात हो रही थी। मैने कहा कि लोग अक्सर दूसरे खेमे के सबसे अच्छे व्यक्ति का उदाहरण देते हैं और बोलते हैं कि उसे तो आज तक कभी ऐसा सामना नहीं करना पडा।
हम कहते हैं कि दोनों खेंमों में से एक्दम आर्डिनरी या फ़िर उससे भी गिरे हुये (ये ज्यादा जरूरी है) दो लोगों के समान व्यवहार पर अगर आपकी प्रतिक्रिया समान नहीं है तो आप Prejudiced हैं।

डॉ .अनुराग ने कहा…

कुछ शब्दों के सामाजिक अर्थ डिक्शनरी नहीं बताती ..... किसी पढ़े लिखे व्यक्ति ओर किसी झुग्गी झोपडी वाले की भाषा में असहमति जताने वाली भाषा में अंतर होता है ..... . .. इंटरव्यू में जिस सन्दर्भ में कहा गया है ....वो आपतिजनक है .....वो बात ओर है के अब इस मुद्दे का "हाइज़ेकीकरन "हो गया है ... .एक विचार के विरोध के प्रति जो असहमति बनी थी....वो जायज थी.....व्यक्ति विरोध की राजनीति गलत है. . ..दो दोनों पक्षों की ओर से खेली जा रही है ...जो अब ..उबाऊ ..तर्कों .ओर शब्दों की लफ्फाजी से इतर कुछ नहीं है ......माफ़ी मांगने के बाद इस घटना का पटाक्षेप हो जाना चाहिए .था......दरअसल इससे साबित होता है हिंदी के सो काल्ड बुद्दिजीवी सरोकारों के मामलो में अब भी भर्मित है .........
एक बात ओर है भले ही बेवफाई विशेषांक सुनने में थोडा अटपटा सा लगे .पर इस अंक में पढने जैसा बहुत कुछ है...........कमलेश्वर से लेकर ...प्रियवंद तक

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

बात एक शब्द या कुछ शब्दों की नहीं है। शब्द तो अभिव्यक्ति का माध्यम हैं। बात कुछ लोगों की भी नहीं है। बात समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों की है। वे बदले जाने को उतारू हैं और उन्हें बदले जाने से रोकने की शक्तियाँ भी पूरी तरह से सक्रिय हैं। मात्रात्मक परिवर्तन लगातार हो रहे हैं। गुणात्मक बदल भी होगा ही।

Neeraj Rohilla ने कहा…

@अनुराग जी,
इस अंक की कोई कापी आनलाईन उपलब्ध है क्या?

बहुत सुना है, अब पढ भी लें अगर मिल जाये तो...

नीरज...

डॉ .अनुराग ने कहा…

नीरज दुर्भाग्य से ...ऑन लाइन अपडेट होने में हिंदी वाले थोड़े ढीले है ...शायद दो महीने में हो...

आशुतोष कुमार ने कहा…

छिनाल निस्संदेह अपमानजनक शब्द है, slut और bitch और whore की तरह ही . अपनी देह पर अपना हक़ मानने वाली स्त्री भी इन खिताबों से नवाज़ा जाना पसंद नहीं करेगी. दर असल ये सभी शब्द उस पुरुष मानसिकता की पैदावार हैं , जो स्त्री की कामवृत्ति पर उस के स्वाधिकार को अनैतिक मानती है. दोस्ती यारी में गालियाँ भी अछ्छी लगतीं हैं ,लेकिन वह एक अलग मसला है.

बोधिसत्व ने कहा…

अभय भाई
1-
मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि किसी मुद्दे पर हुई या हो रही बहस से कोई सोचने-विचारने वाला व्यक्ति 'पक' कैसे सकता है। क्या अब बहस 22 मिनट के एपीशोड की तरह होगी। न पकाने वाली, मनोरंजक। सरेदार।
2-समाज का कौन सा हिस्सा है जिसमें गुटबाजी न हो। समाज तो 'गुटबाजी' से ही बनता है। क्या कभी कोई समाज गुटहीन हो सकता है। जो गुट निरपेक्ष होते हैं उनका भी एक गुट होता है।

3- गुट का अर्थ देख लें एक बार- गोस्ठ, समूह, झुंड, समुदाय, दल, और यूथ। क्या समाज अब इस कमेंट के बाद समुदाय हीन हो जाएगा। वही बात हुई कि सब सबसे सभी अवस्था में सहमत हों, बहुत बात न करके भले लोंगों की तरह चुपचाप अपना-अपना काम करें।

5- क्या देश भर से जितने भी लोग इस मामले पर बोल रहे हैं, चाहे वे पक्ष में हों या विपक्ष में सभी किसी ना किसी से अपना-अपना ऋण उतार रहे हैं।

6- क्या यह एक लोकतांत्रिक बहस चाहे वह बहुत संसदीय न हो उसके मुँह पर थूकने जैसा नहीं है।
कि देखो कितना उबाऊ बहस कर रहे हैं सब फुरसतिया(खलिहर) लोग।

7- क्या जो फरीद का जो महान मत वही भर न 'पकाने' वाला और जायज और रसवान हैं।

8- क्या दिनेश राय द्विवेदी, अनुराग आर्य, अशोक कुमार पाण्डे, या मैं जितने लोगों ने इस या उस पक्ष में लिखा है या यहाँ भी बहस कर रहे हैं सब केवल 'पका' रहे हैं और ऋण उतार रहे हैं।

रंजना ने कहा…

जिस इलाके से हम हैं, छुटपन से ही अभ्यस्त हैं इस शब्द को सुनने के...गाँव में भाभियाँ प्यार ममत्व और मजाक में हमें हमेशा छिनरी कहा करतीं थीं...पर ये हंसी ठिठोली सम्बन्ध प्रगाढ़ ही करते थे...

खैर, जितना बोला लिखा गया है ,इस विषय पर,मुझे लगता है पर्याप्त है...बहुत सारे शब्दों के मायने ,समय सिद्ध और स्थापित कर देता है...
यदि पक्ष विपक्ष में बहुत कुछ बोला गया या अनबोला छोड़ दिया गया,तो भी स्त्री समाज अपनी परिधि रीडिफाइन करता चला ही जायेगा...बदलाव की इस बयार को बहने और बढ़ने से न छिनाल बोलकर कोई रोक सकता है और न ही स्त्री का पक्ष लेकर...

अजित वडनेरकर ने कहा…

आपने अच्छा लिखा। बोधिभाई के बिन्दुओं पर भी ध्यान गया। फिलहाल रंजना जी की इन पंक्तियों के साथ हूं...
"यदि पक्ष विपक्ष में बहुत कुछ बोला गया या अनबोला छोड़ दिया गया,तो भी स्त्री समाज अपनी परिधि रीडिफाइन करता चला ही जायेगा...बदलाव की इस बयार को बहने और बढ़ने से न छिनाल बोलकर कोई रोक सकता है और न ही स्त्री का पक्ष लेकर... "

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

विचारणीय यह है कि हमारी मानसिकता किसी भी प्रश्न में लिंग का आधार क्यों ले लेती है? पुरुषत्व व स्त्रीत्व क्या ताल ठोंक कर निपटने के विषय हैं। कैमरा कहाँ रखना है, मीडिया को समझना होगा।

mukti ने कहा…

आपकी बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ, साथ ही नीरज जी की टिप्पणी भी अपनी जगह सही है और रंजना जी की टिप्पणी भी.
मुझे इस मामले में उपर्युक्त बात खटक रही है. लेकिन बात ये भी सही है कि स्त्री-विमर्श में यौनिकता का मुद्दा इतना हल्का नहीं है कि उसे इंटरव्यू देकर मज़ाक बना दिया जाए. मैं इस बात से सहमत हूँ कि इस पर लेखक-लेखिकाओं के मध्य स्वयं विचार-विमर्श होना चाहिए, लेकिन यहाँ तो औरतों में भी एक तबका ऐसा है, जो स्वयं को सबसे बड़ी सती-सावित्री साबित करने पर तुला होता है. एक ओर नारीवादी विमर्श की बात करता है तो दूसरी ओर उसी पितृसत्ता की दृष्टि में "भली औरत" भी बने रहना चाहता है. तो ऐसे लोगों के रहते किसी स्वस्थ बहस की उम्मीद कैसे की जा सकती है.
दूसरी प्रवृत्ति जो मुझे खटकी इस प्रकरण में वो एक तबके द्वारा राय का पक्ष लेने की कि उनकी बात को गलत रूप में संदर्भित किया गया है वगैरह-वगैरह. अगर गंभीर लोग इस समय स्त्री की यौनिकता सम्बन्धी बहस की बात उठाते हैं, तो वे भी उन्हीं लोगों की श्रेणी में समझे जायेंगे, जो राय को बचाने के प्रयास में लगे हैं.
खैर, मैं चाहूँगी कि आप ये लेख पढ़ें, जो स्त्री की यौनिक-स्वतंत्रता के विषय में बहस को बहुत ही पुराना सन्दर्भ लेकर उठाता है.

mukti ने कहा…

लिंक ये रहा-
http://www.boloji.com/hinduism/panchkanya/pk01.htm

सुमंत ने कहा…

विभूति राय उस शब्द से बच सकते थे जिसको लेकर इतना वितंड़ा खड़ा किया गया है। लेकिन पूरे साक्षात्कार को देखने के बाद यह अवश्य लगता है कि उनके साथ राजनीति की जा रही है। बदलते हुए परिवेश में नारी जिस प्रकार अपनें आप को ढ़ाल रही है, पुरुषवादी समाज को वह रास नहीं आनें वाला, यह एक सच है, वहीं दूसरी ओर परंपरागत भारतीय परिवारों पर इस सबका क्या असर पड़ने वाला है, यह उससे भी भी महत्वपूर्ण पहलू है। हमारे इधर एक कहावत है रांडे़ तो रंड़ापा छॊड दें जब रड़ुवन छोड़न दें, कोठे की रण्डी के लिए आखिर पुरुष भडुए ही ग्राहक जुटाते थे, आज बिल्कुल खत्म हो गये वैसा लगता नहीं। मुझे लगता है कि बहस खतम नही शुरु हुई है।

डॉ .अनुराग ने कहा…

वैसे एक बात समझ नहीं आती ...के एक आदमी ने एक गलत बात कही ....सबने उसे गलत कहा ....उसने क्षमा मांग ली ...अब रोज रोज उसपे अलग अलग जगह चौपाल लगाईये ..शाब्दिक अर्थो से खेलिए ...लफ्फाजिया करिए .....जैसे किसी स्कूल के बच्चे को पकड़ कर आप कई दिनों तक में सजा देंगे के बेटे तुमने फलां दिन वो गलती की थी....इससे क्या हिंदी में राजनीतिया रुक जायेगी ....

अभय तिवारी ने कहा…

डा० अनुराग,
हिन्दी में राजनीति वाली आप की बात ठीक है। मुझे भी अक्सर लगता है कि हमारा हिन्दी समाज एक बीमार अपरिपक्व समाज है जो व्यर्थ के मसलों को बेवजह महत्व देता रहता है और मुद्दे की बातों से जी चुराता रहता है।

हिन्दी समाज के अधिकतर लोग पिछड़ेपन के अँधेरे में डूबे हुए हैं और जो थोड़ी बहुत चेतना व प्रगतिशीलता आई भी है वह भी अकसर उधार की, और ओढ़ी हुई है। लोग प्रगतिशील हैं नहीं दिखने की कोशिश करते हैं। सम्भव ये भी है कि जो लोग वास्तविक जीवन में बलात्कारी हों, वे नारी मुक्ति का झण्डा लेकर सबसे आगे वही चलते दिखाई दें।

लेकिन दूसरी तरफ़ मुझे लगता है कि इस पर अभी बात हुई ही नहीं है; राय साहब पर नहीं छिनाल प्रसंग पर। हो सकता है मैं इस पर और लिखूँ।

डॉ .अनुराग ने कहा…

चर्चा तो बहुत हुई है अभय जी.....जरा यहाँ देखिये

क्षितिज के पार ने कहा…

बहुत बढ़िया विमर्श चल रहा है। ​डा.अनुराग की राय मानें तो अब इसपर बहस बंद होनी चाहिए, लेकिन मुझे लगता है, कि सही गलत का पता चलना चाहिए। रंजना की बात में दम है। आशुतोष कुमार की राय बकवास है। छिनाल शब्द गंदा है, तो रंडी और वेश्या भी। ​इन्हें शब्दकोष से निकाल दो। लेकिन, इसमें पुरुष मानसिकता की क्षुद्र बात कहां से आ गई। आखिरकार, दलाल, भांड, भंडुए जैसे शब्द भी तो हैं, तो क्या इसे स्त्री मानसिकता की उपज मानकर गाली निकाली जाए। फिर तो सबसे बड़ी वेश्या भाषा है, गाली किसी व्यक्ति विशेष को क्यों। पूर्वी ग्रामीण अंचलों में तो हर शब्द में मिठास आ जाती है। छिनरी-बुजरी जैसे शब्द आम हैं। लालची को कुत्ता, बेवकूफ को वैशाखपंचम और चालाक को कौआ कहा ही जाता रहा है। इसमें बुरा लगने की बात नहीं है। असल मुद्दा यह है कि जो बात विभूति नारायण ने कही है, क्या वह गलत है। इसपर खोज-पड़ताल हो सकती है। अन्याय तो उन्होंने जरूर किया, सिर्फ छिनालों की ही नहीं, दलालों की भी पड़ताल की जानी चाहिए। इसी मुद्दे को खंगालती पोस्ट लिखी है। कृपया, मेरे भी ब्लाग पर आएं, पढ़ें और विमर्श जारी रखें।

mukti ने कहा…

@ अनुराग, अभय, मुझे भी यही लगता है कि हिन्दी साहित्य-समाज-मीडिया बहुत ही पिछड़ा हुआ है, तो अंगरेजी में लिखने वाले भारतीय भी वैसे पिछड़े हैं क्योंकि हैं तो वे इसी समाज का हिस्सा... साहित्य में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कभी-कभी इस स्तर तक चले जाते हैं कि उबकाई आने लगती है. ब्लॉगजगत का भी वही हाल है. पर वहीं कभी-कभी किसी ब्लॉग पर अच्छी बहस चल जाती है, जैसे यहाँ चल रही है. इसे चलना चाहिए.

आशुतोष कुमार ने कहा…

u said it , क्षितिज के पार !भाषा सब से बड़ी वेश्या है. यकीनन. सिर्फ इतना मुझे जोडने दीजिये, वह हम सब की सब से बड़ी अम्मा भी है.ओंकार....... !

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...