सोमवार, 4 मई 2009

उनके जीवन का सब से दुखद दिन

ये नेता जनता को कितना मूर्ख समझते हैं, न तो इसकी कोई हद है और न इनकी मक्कारी की कोई सीमा। भूतपूर्व रामभक्त और वर्तमान मुलायम भक्त कल्याण सिंह का कहना है कि भाजपा ने उन्हे धोखा दिया, उनकी आँखों में धूल झोंककर बाबरी मस्जिद गिरा दी। वास्तव में तो वे मुसलमानों के सच्चे मित्र हैं।

इस बयान से मुझे बरबस लाल कृष्ण अडवाणी के उस बयान की याद आ गई जिसमें वे फ़रमाते हैं कि ६ दिसम्बर १९९२ उनके जीवन का सब से दुखद दिन है। अडवाणी जी की फ़ित्रत के अनुसार तो यह बयान भी उतना धूर्ततापूर्ण है जितना के उनके पूर्व चेले कल्याण सिंह का। पर मुझे लगता है कि अडवाणी साहब झूठ नहीं बोल रहे हैं। वाक़ई वो दिन उनके जीवन का सब से दुखद दिन हो सकता है जिस दिन उनकी सोने की मुर्ग़ी हलाल कर दी गई हो।

ये उसी दुखद दिन का नतीजा है कि आज लगभग बीस साल बाद जबकि वे क़ब्र में पैर लटका कर बैठे हैं और प्रधानमंत्री की गद्दी उनके पहुँच से दूर और दूर होती जा रही है। जनता को बहकाने के लिए उनके पास एक मुद्दा भी नहीं; और राम मन्दिर तो इतना फीका हो चुका है कि मोदी भी उसका ज़िक्र करने से क़तरा रहे हैं।

अगर बाबरी मस्जिद नहीं गिरी होती तो आज भी वो विवादित स्थल पर वहीं शोभायमान होती जहाँ आजकल रामलला विराजमान हैं। और बार-बार मुस्लिम आक्रमणकारियों के मूर्तिभंजक इतिहास की दुहाई दे-दे कर हिन्दुओं के खून को खौलाया जा रहा होता। हिन्दू और मुसलमानों के बीच वैमनस्य को रोज़ भड़काया जा रहा होता। आज वो कुछ सम्भव नहीं क्योंकि बाबरी मस्जिद के गिर जाने से हिन्दुओं की प्रतिशोध की भूख पूरी हो गई.. मगर मुसलमानों के भीतर जाग गई। जिसका प्रमाण हमें मुम्बई सीरियल बम विस्फोट जैसी घटनाओं में मिला।

यहाँ एक बात साफ़ कर देना और ज़रूरी है। मेरे जैसे आस्तिक मगर ग़ैर-कर्मकाण्डी हिन्दू के लिए न तो किसी मन्दिर का कोई अर्थ है और न किसी मस्जिद में कोई श्रद्धा। मुझे बाबरी मस्जिद के वहाँ खड़े रहने से न तो कोई सुकून मिलता था और न ही उसके गिरने से मेरे मानसिक संसार में कोई अभाव आ गया है।

इस देश के बहुत सारे सेकुलरपंथी इस बात से भाजपा और विहिप से खौरियाये नज़र आते हैं कि उन्होने एक ऐतिहासिक महत्व की इमारत को गिरा दिया! इस देश में हज़ारों ऐसे ऐतिहासिक स्थल हैं जहाँ जा कर मूतने में सेकुलरपंथियों को कोई गुरेज़ नहीं होगा। आम जनता वक़्त पड़ने पर उसकी ईंट उखाड़ कर क्रिकेट का विकेट बनाने में इस्तेमाल करती रही हैं। मुझे उनकी इस पुरातत्व-प्रियता में राजनीति की बू आती है।

मुझे इस तरह के शुद्ध, रुक्ष पुरातत्वी इतिहास में कोई आस्था नहीं; मेरे लिए वो ऐतिहासिक स्मृतियाँ अधिक मह्त्व की हैं जो मनुष्य के मानस में क़ैद रहती हैं। वही स्मृतियों जिनके नासूर में उंगलियाँ घुसा कर लाल कृष्ण अडवाणी ने इस देश में नफ़रत की राजनीतिक फ़सल काटी है।

एक और दूसरी बात साफ़ करने की ज़रूरत है कि यह सच नहीं है कि इस देश में हिन्दू और मुसलमान हमेशा शान्तिपूर्ण ढंग से रहते आए हैं। सेकुलर इतिहासकार सिर्फ़ एक साझी संस्कृति की छवि को ही उभारते आये हैं ऐसे तमाम तथ्यों पर परदा डालकर जो उनकी इस निष्पत्ति के विरोध में हों। साझी संस्कृति की बात पूरी तरह ग़लत नहीं है मगर वो अधूरा सच है। उसका पूरक सच - एक आपसी संघर्ष का सच और समय-समय पर हिन्दुओं के दमन का सच है।

बाबरी मस्जिद राम मन्दिर को तोड़कर बनी थी या नहीं इस बात का प्रमाण माँग कर हम अडवाणी जैसे मक़्कार राजनीतिज्ञों के क़दम कुछ देर के लिए तो रोक सकते हैं मगर हिन्दू मानस में दबी, मन्दिरों के तोड़े जाने की उस जातीय स्मृति को मेट नहीं सकते जो निराधार नहीं है। खुद मुस्लिम इतिहासकारों ने ऐसे अभियानो का विस्तार से वर्णन किया है।

हमारे सामने दो तरह के झूठे इतिहास रखे जाते हैं। एक इतिहास समाज में भाई़चारा बना रहे इसलिए झूठ बोलता है तो दूसरा अपने पराजय बोध को घटाने के लिए और समाज में साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाने के लिए झूठ बोलता है। कोई सत्य की शक्ति में यक़ीन नहीं करना चाहता और न ही समय के स्वाभाविक प्रवाह से जातीय स्मृतियों के सुलझ जाने में विश्वास रखना चाहता है। एक उन्हे नकारता है तो दूसरा आग से आग बुझाना चाहता है।

एक स्वस्थ समाज के लिए उसके व्यक्ति को पराजयबोध से मुक्त होना चाहिये। तो क्या हर हिन्दू को विदेशी आक्रमणकारियों के साथ संघर्ष में अपने पूर्वजों की हार का बदला अपने निर्दोष पड़ोसियों से लेना चाहिये? ऐसी सोच और कृत्य को बढ़ावा देना नीचता, कायरता और अपराध है। हिन्दुओं के नाम पर राजनीति करने वाले दल यही करते रहे हैं।

रथ-यात्रा निकाल कर इस देश के गाँव-गाँव में लालकृष्ण आडवाणी ने जो दंगे का माहौल तैयार किया था, उसमें हज़ारों हिन्दू-मुसलमानों की जाने गईं। मैं उसके लिए व्यक्तिगत तौर पर लाल कृष्ण अडवाणी को ज़िम्मेदार मानता हूँ। मेरा सवाल है कि उन्हे बाबरी मस्जिद से सम्बन्धित हर दंगे में होनी वाली मौत के लिए अपराधी क्यों नहीं माना जाय?

कैसे एक लिबेरहान इन्क्वायरी कमीशन महज़ उनके एक अकेले बयान पर बरी कर देता है कि वो मेरे जीवन का सब से दुखद दिन था? क्या उन्हे दिखता नहीं कि वो शख्स गाँव-गाँव नगर-नगर आग लगाता आ रहा था? और जब मस्जिद गिर गई तो रोने लगा कि हमें क्या पता कि कैसे गिर गई? मेरी समझ में तो वही केन्द्रीय रूप से अपराधी हैं।

मैंने पहले भी कहा कि मुझे मस्जिद गिरने से कोई फ़रक नहीं पड़ा। और जहाँ बाबरी मस्जिद थी वहाँ राम मन्दिर बनने में भी मेरी कोई रुचि है। बावजूद इसके कि मैं मानता हूँ कि राम ने उसी अयोध्या में जन्म लिया था जो देश में समुदायों के बीच का क्लेश का कारण बनी हुई है। मुझे राम में श्रद्धा है मगर मेरे राम अपने भक्तों के हदय में रहते हैं किसी हाईली सेक्योर्ड टेंट में नहीं।

फिर भी अगर कभी वहाँ मन्दिर बन गया तो मुझे तकलीफ़ भी न होगी। लेकिन उस के बनने से अगर मेरे मुसलमान दोस्तों के मन में कोई पराजय-भाव घर करता है, कोई चोट लगती है तो ऐसा मन्दिर मुझे सात जन्मों तक भी स्वीकार्य न होगा। मन्दिर ईश्वर से आदमी का योग कराने के अभिप्राय से बनता है, आदमी का आदमी से जो वैर कराए वो मन्दिर आदमी को ईश्वर से मिला देगा इस धोखे में जो रहना चाहता है तो रहे, मैं इतना अबोध नहीं।

और जो लोग इस धोखे में हैं कि भाजपा या अडवाणी कभी कोई मन्दिर बनवा देंगे तो जाग जायें, राम का नाम लेकर राजनीतिक लाभ उठाने वाले अडवाणी और कल्याण सिंह जैसे लोग मन्दिर बनाने में नहीं मस्जिद गिराने में यक़ीन रखते हैं। और फिर मस्जिद गिरा कर एक अपने को दुखी बताने लगते हैं और दूसरे कहते हैं कि उनके साथ धोखा हुआ है। हैरत है कि देश के हिन्दू लोग इन पर भरोसा करते हैं और मुसलमान मुलायम जैसे ढोंगियों पर जो एक तरफ़ तो इन राक्षसों से उन्हे बचाने का वादा करते हैं और फिर वोट के लालच में उन के पैर छू कर धर्म निरपेक्षता का प्रमाण पत्र भी पकड़ा आते हैं।

ये नेता तो धन्य हैं ही, हमारे देश की जनता भी धन्य है।

6 टिप्‍पणियां:

अशोक पाण्डेय ने कहा…

तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री कल्‍याण सिंह जी उन दिनों नाबालिग थे, अब बालिग हुए हैं :)
आडवाणी जी समय देख कर बालिग नाबालिग का मुखौटा बदलते रहते हैं :)
...और तथाकथित सेकुलरवादी, भाई इनकी महिमा अपरंपार है, ये तो बालिगों में more बालिग हैं :)

संजय बेंगाणी ने कहा…

कल्याण हो या आडवाणी अगर अपने किये से मुकरते है तो यह साफ साफ धोखाधड़ी है, अपने समर्थकों सें.

प्रधानमंत्री की गद्दी उनके पहुँच से दूर और दूर होती जा रही है....यह सच्चाई से आँखे चुराना है. भाजपा सत्ता में आएगी.


आपने चुंकि कल्याण को मुद्दा बना कर लिखा है, अतः केवल भाजपा को घेरा है जो विषय के अनुसार ठीक है. बाकि कांग़्रेस हो या वामदल सभी एक से बढ़ कर एक मक्कार है.

कुछ असहमतियाँ भी है. जो आपको ज्ञात है अतः लिख नहीं रहा.

Mired Mirage ने कहा…

आपका लेखन बहुत संतुलित है। दोनों तरफ़ के लोग एक से बढ़कर एक हैं। परन्तु क्योंकि एक दल को गाली देना नियम सा बन गया है इसलिए कभी कभी उनके पक्ष में न चाहते हुए भी बोलना पड़ता है। जितनी हानि एक विशेष प्रकार की धर्मनिर्पेक्षता ने की है उतनी हानि धार्मिक लोगों ने नहीं।
घुघूती बासूती

sanjay vyas ने कहा…

अभय जी आपकी पोस्ट एक साथ कई विषयों को उठाती है और इस प्रक्रिया में समय की अलग अलग परतों में विचरण करती है. समकालीन राजनीति पर केन्द्रित होकर भी आप इतिहास से जुड़े तथ्यों-धारणाओं पर टिपण्णी से बच नहीं पाते.पूजा स्थलों के विध्वंस का अपना एक सच है जो भारत तक ही सीमित नहीं है. स्पेन में भी, मैंने कहीं पढ़ा है, मूरों के शासन का अंत होने पर मस्जिदों को गिरजाघरों में परिवर्तित कर दिया गया था. भारत में मंदिरों का उत्तर भारत में ध्वंस हुआ ये सच है इसे इतिहासकार भी मानते है भले इस पर जोर न दिया जाता हो.ये प्रभुत्व स्थापित किये जाने का शायद स्टाइल स्टेटमेंट रहा हो.पर मेरा प्रश्न ये है कि हमारा समाज कब पुरातनता की महत्ता स्वीकार करता रहा है? पूरा बनारस मराठाकाल से पुराना नहीं दिखता. ऋषिकेश में कोई पुराना मंदिर हमने बचाया नहीं,लक्ष्मण झूला वहां दर्शनीय स्थलों में शामिल है! हरिद्वार में घाटों से पुरानी धर्मशालाएं लगती है. कशी नरेश का रामनगर का किला सारनाथ की कई ईंटों को हजम करके बना है. हम ही कहाँ प्राचीन विग्रहों को सहेज पाए है? कहीं से भी मूर्ती खंडित हुई तो उसे त्याग दिया जाता था. ये एक प्रभुत्व की जबरन उपलब्धि और जड़-मूर्त-समय से उदासीन प्रवृतियों का मिला जुला परिणाम था.
आप की तरह शायद मैं भी मानता हूँ कि इसी अयोध्या में राम रहते थे, हालांकि २०० से ज्यादा राम कथाएँ है जो उनके उतने ही भूगोलों में विन्यस्त होने की बात करती है.
आपकी केन्द्रीय चिंता से अक्षरशः सहमत.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

अपने आप में संपूर्ण इस पोस्ट पर टिप्पणी की गुंजाइश नहीं। संजय जी को अभी कल्याण और आडवानी की धोखाधड़ी पर अविश्वास है उन के मुताबिक आप सच्चाई से आँख चुरा रहे हैं। पर इस तथ्य की तीन चौथाई सचाई मतपेटियों में बंद है। बस पखवाड़े भर में उजागर हो लेगी। प्रतीक्षा करते हैं।

हरि जोशी ने कहा…

दरअसल भाजपा इस देश के भोले-भाले नागरिकों को गुमराह कर रही है। राम मंदिर का निर्माण उनके घोषणा पत्र का हिस्‍सा है। लेकिन वह कहते हैं कि उसके लिए आपको भाजपा को स्‍पष्‍ट बहुमत से संसद में भेजना होगा। बात में जान है कि यदि गठजोड़ की सरकार हुई तो दूसरों की भी माननी होगी। लेकिन भाजपा तो स्‍पष्‍ट बहुमत के लिए चुनाव लड़ ही नहीं रही है। करीब सवा दो सौ सीटों पर भाजपा चुनाव लड़ रही है; यदि वह सभी सीटें भी जीत जाए तो भी पूर्ण बहुमत नहीं हो सकता। ..सवाल है कि फिर राम मंदिर का मुद्दा ही क्‍यों उठाया जाए। मेरे जैसा आदमी तो आपके प्रत्‍याशी और केंद्रीय नीतियों के गुण-दोष के आधार पर आपको वोट दे ही सकता है।..वैसे भी हमारे चुनावों में अंधों में कोई काणा ही ढूंढना पड़ता है। कभी मिल जाता है तो कभी वह भी नहीं मिलता।

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