गुरुवार, 5 सितंबर 2013

मैं वो नहीं हूँ!


आईने में अक्सर दूसरा आदमी मिलता है। भीतर से देखते हुए जो अपनी छवि बनती है, ठीक-ठीक उससे मिलता नहीं ये आदमी। बाहर से देखकर भीतर की छाया मिलानी पड़ती है। कभी भीतर वाला अधिक सुदर्शन होता और बाहर वाला तिरछा-बांका, टेढ़ा-मेढ़ा, बेडौल। कभी उसके उलट भी होता है। 

भीतर हमने अपनी जो छाया, इमेज बना रखी है, वो थिर नहीं है। बदलती रहती है। ठोकर लगने से टूट जाती है, कभी अहम भाव से भर उठती है। चंचल है। अस्थायी है। 

पर आइने में मिलने वाला आदमी भी हमेशा स्थायी नहीं रहता। दस बरस पहले जो आदमी आइने में दिखता था, आजकल वो नहीं मिलता। चालीस साल पहले की एक तस्वीर जो मुझे दिखाई जाती है, उसके जैसा बिलकुल नहीं है आज आईने में मिलने वाला आदमी। 

वो आदमी मैं नहीं हूँ। मैं कुछ और हूँ। भीतर मेरे में की जो छाया बनी है, जिसे हम अहम कहते हैं। वो भी मैं नहीं हूँ। मैं कुछ और हूँ। 




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अंधकार



ईश्वर अंधकार में है या प्रकाश में। हम नहीं जानते। महात्माओं ने बताया है, ईश्वर ज्योतिर्मय है। नूर है। पर प्रकाश चले जाने के बाद जो बचे, वो क्या है? जहाँ प्रकाश न हो, वहां भी अंधकार बना रहता है। और जहाँ प्रकाश हो वहाँ भी होता है अंधकार। 

एक कमरे में बहुत सारा प्रकाश भरने के बाद भी बहुत सारा प्रकाश और भरने की जगह बनी रहती है। ऐसा लिखते हैं विनोद कुमार शुक्ल। 

वो खाली जगह अंधकार की है। आदि भी अंधकार है। अंत भी अंधकार है।

प्रकाश के कारण हम अंधकार को देख नहीं सकते। वो परदा है। प्रकाश परदा है। प्रकाश में समझने लायक़ कुछ भी नहीं। इसीलिए प्रकाश के आगे आदमी बिलकुल बेबस होता है। अधिक उसकी ओर देखे तो अंधा हो जाता है। आदमी अंधा होकर ही कुछ समझ सकता है। 


प्रकाश से कोई ज्ञान नहीं आता। सारा ज्ञान अंधकार में है।  

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बुधवार, 4 सितंबर 2013

साहस


मय हमको बहुत सताता है। क्या करें। अनन्त तक फैले इस समय का? अनन्त समय छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटा हुआ हमें नज़र आता है। पर वो होता नहीं। साल महीने, दिन-रात के विभाजन हमें पहले से हुए नज़र आते हैं। मगर हैं नहीं। 

रात-दिन, महीना, साल बाहरी लक्षणों की गणनाएं हैं। क्योंकि जगत लगातार बदल रहा है। पर समय नहीं बदल रहा। वो स्थिर है। अटल। वो जाता ही नहीं। वर्तमान का जो पल है, केवल उसी में समय को अनुभव किया जा सकता है। भूत स्मृति है। और भविष्य कल्पना है। 

समय केवल इस पल में जीवित है। और कभी मरता नहीं। हमेशा जीवित रहता है। क्योंकि वर्तमान कभी जाता ही नहीं। उसकी इस विराटता से घबराकर हम समय को भुलाने, इस पल से निकल जाने की कोशिशें करने लगते हैं। कल्पना में। स्मृति में। सुबह-शाम के बीच का समय भी काटना मुश्किल होता है हमारे लिए। तो हम समय को जागने, नहाने, नाश्ता करने, दोपहर का खाना बनाने के अन्तरालों में तोड़ने लगते हैं।  

अनन्तता की आज़ादी से से छूटकर, अवधि में बंधा समय हमें इतना सता नहीं पाता। फिर भी हम उसे पूरी तरह भुला देना चाहते है। तमाम बातों में अपने को मगन रखते हैं। उनसे बंधे रहते हैं। बंधे रहने में सुरक्षा है। जैसे छोटा बच्चा माँ के तन से बंदकर राहत महसूस करता है। अलग होते ही रोने लगता है। समय से आज़ाद होते ही हमारे भी भय का पारावार नहीं रहता। 


पर सारे शग़ल भुलावा हैं। समय कहीं नहीं गया। वो वहीं खड़ा है। स्थिर, एकाकी, अनन्त, विराट समय।  यूं कहें, हम खड़े हैं। अनन्त समय के आगे। और उससे नज़रे मिलाने का हमारे भीतर साहस नहीं है। 

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