गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

अधूरा ईश्वर..


कहते हैं कि यह संसार/कायनात/सृष्टि/ब्रह्माण्ड ईश्वर की रचना है या फिर यह सब कुछ ही ईश्वर है जिसे सूफ़ियों ने हमा ओस्त कहा है। इस बात में मुझे कुछ दुविधा लगती है।

अगर उस सर्वशक्तिमान सम्पूर्ण ईश्वर ने ये संसार बनाया है, अगर ये उस की अभिव्यक्ति है तो ये संसार भी सम्पूर्ण होना चाहिये! हर रचना अपने आप में सम्पूर्ण होनी चाहिये, बिना किसी विकार, कमी या नुक्स के। वो इसलिए कि पूर्ण से तो पूर्ण ही निकलता है, सम्पूर्ण ईश्वर की अभिव्यक्ति अपूर्ण कैसे हो सकती है? मगर हम जानते हैं कि हमारा संसार सम्पूर्ण नहीं है- तमाम तरह की अपूर्णताओं का समुच्चय है ये संसार।

सम्पूर्ण का ना तो विकास हो सकता है और ना ही ह्रास। लेकिन इस संसार में तो बदलाव ही नियम है- कुछ भी स्थिर नहीं है। जन्म, विकास, क्षय और मरण इस संसार की आधारभूत विशेषता है। हर पल कुछ जन्म ले रहा है, कुछ मर रहा है, कुछ का विकास हो रहा है, और कुछ का क्षय। निश्चित ही यह संसार अपूर्ण है, अधूरा है, इसे किसी सम्पूर्ण ईश्वर ने नहीं बनाया हो सकता।

और अगर, किसी न्यूनतम सम्भावना के चलते, ये अधूरा संसार सचमुच किसी ईश्वर ने बनाया भी है तो किसी सम्पूर्ण ईश्वर ने नहीं.. ये अधूरा संसार किसी अधूरे, अपूर्ण ईश्वर की ही रचना हो सकता है।

7 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

तर्कों के कुण्डों में, ईश्वर स्वाहा करते आये अब तक,
कहीं मगन वह, चलित विश्व की गतिविधि पर मुस्काता होगा।

आशीष श्रीवास्तव ने कहा…

I agree with you!

अजित वडनेरकर ने कहा…

सहमत।

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

लगता है सृष्टि की विराट् प्रयोगशाला में हम सारे जड़-चेतन तत्वों को माध्यम बनाकर लगातार प्रयोग किये जा रहे हैं- पता नहीं क्यों !

सोनू ने कहा…

पंच-तत्त्वों में एक आकाश है। यानी शून्य।

Vimal Shukla ने कहा…

ईश्वर तर्क का नहीं आस्था का विषय है तर्क करने वालों के लिये तो ईश्वर कल्पना है ।

PD ने कहा…

@विमल शुक्ल जी - लोग कहते हैं कि ईश्वर तर्क का विषय नहीं है साथ ही ये भी मानते हैं कि इस विश्व में सब ईश्वर का ही बनाया हुआ है. अर्थात तर्क बुद्धि भी उन्हीं का दिया हुआ है. अगर हम तर्क नहीं करते हैं मतलब ईश्वर के दिए उपहार का अपमान करते हैं. और यदि तर्क करते हैं तो उन्हें मानने की इच्छा नहीं होती है.

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