शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

सुनो

कोयल दिन भर बोलती है। दहियल सुबह दो घंटे बोलता है और फिर शाम एक घंटा बोलता है। छोटा बसन्ता कभी उत्तर पूर्व से बोलता है और कभी दक्षिण पूर्व से बोलता है। तोते बोलते नहीं चीखते हैं। दक्षिण से चीखते हुए आते हैं और उत्तर को निकल जाते हैं और कभी उलटा। गौरेया जब तुलसी के पत्ते खा रही होती है तो नहीं बोलती। उसके पहले बोलती है। फिर बाद में भी बोलती है। कबूतर कभी नहीं बोलता। बस गुर्राता है। मैना शोर मचाती है और कौआ अप्रिय ही नहीं प्रिय भी बोलता है। एक पेड़ है जो चिड़ियों की सराय है। सारी चिड़ियों से ऊँचे सुर में उसी पेड़ पर रहने वाली गिलहरी पूँछ उठाकर न जाने क्या-क्या बोलती है। नाली के नीचे रहने वाला चूहा कभी कुछ नहीं बोलता। कुत्ते दोस्तों से बोलते हैं और दुश्मनों से। अजनबियों से वो भी कुछ नहीं बोलते। उनकी सुनते भी नहीं। 

8 टिप्‍पणियां:

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

बहुत सुन्दर ..एकाग्रता आवाजों की ओर ..जिन्हें महसूस किया गया... :)

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सभी तो बोल रहे हैं।

मीनाक्षी ने कहा…

इस वक्त तो बन्द खिड़की दरवाज़ों से अन्दर आती हवा का सुर सुनाई दे रहा है जो बीच बीच में बेसुरा भी हो रहा है..

डिम्पल मल्होत्रा ने कहा…

हम बोलते भी है शोर भी करते है..कभी-कभी चुप भी रहते है...चीखते है....और सब महसूस करते है...और हाँ लिखते भी है....:)

Pramod Singh ने कहा…

निहायत सुन्‍दर कविता है.
सब बोलों के बुल जाने के बाद, फिर नये सुनने का इंतज़ार सा कुछ..

Dr Varsha Singh ने कहा…

वाह..क्या खूब लिखा है आपने।
लाजवाब, सुन्दर लेखनी को आभार...

Ek ziddi dhun ने कहा…

behad pyari si,
aur ye khoob-
और कौआ अप्रिय ही नहीं प्रिय भी बोलता है।

Ek ziddi dhun ने कहा…

दिल को छू लेने वाली.
और क्या बात है ---
`और कौआ अप्रिय ही नहीं प्रिय भी बोलता है।`

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