मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

एक दिन मौल


उन्होने फ़ैसला किया था कि कुछ नहीं ख़रीदेंगे। पर्स में पैसे भी नहीं रखे थे उन्होने। पुरानी सहेलियां थी, कट्टी-मिट्ठी-कट्टी का एक धड़कता सा रिश्ता है दोनों के बीच। कौलेज के भारहीन दिनों की खाल में फिर से उतर लेने की उमंग में भर कर, शांति और शबनम चल पड़ी शहर की सड़कों पर। जिन पर एक कड़वाहट पलती है। जो आते-जाते किसी को भी कमज़ोर देख झट से डस लेती है। शैन और शब्बो की लहकती हुई आत्मा के चहकते संचारी भाव को दूर से ही सूंघ कड़वी नागिन कोलतार में घुलकर छिप गई। घर को लौटते मोबाईल फोन कान से सटाये हर किसी की उड़ती नज़र ने उन्हे देखा। और जिस-जिसने देखकर उनकी उमंग के घेरे को छुआ, और मुस्कराया तो सड़कों पर पनप रही  कड़वाहट के दंश से उस दिन के लिए ख़ुद को आज़ाद हुआ पाया।

शांति ने जब मौल के ऊँचे प्रवेश द्वार की देहलीज़ पर सुरक्षा जांच की चौकी पर खड़े होकर अपनी बाँहे पसारी तो उसे त्वरित बोध हुआ कि शहर की तंग और बंद दुनिया का फ़लक कभी तो नज़र भी नहीं आता है और कभी सर चढ़ा आता है। और उस से एकदम विपरीत, मौल का फ़लक ऊँचा और खुला लगता है। सितारे जो बाहर के फ़लक से धुंधला कर छिप गए थे, मौल के नज़्ज़ारे में वो सब चमचमा रहे थे। शांति ने गरदन घुमा कर देखा और पाया कि चहकते-लहकते संचारी भाव को छलकाती हुई वही दो अनोखी नहीं है। मौल की ठण्डी हवा में तैरते अधिकतर चेहरे ख़ुशनुमा और ख़ुशगवार है। एक अलग ही दुनिया वहाँ आबाद है। चौकीदार से लेकर सफ़ाई कर्मचारी तक सबके चेहरे पर ज़िन्दगी की नेमत होने का सुबूत एक शाश्वत मुसकान के रूप में चस्पां है। गुडीवनिंग, वेलकम और थैंक्यू की शिष्टताओं से इन्सानी गुफ़्तगू का आग़ाज़ और अंजाम तय कर दिया गया है। एस्केलटर पर पाँव रखकर हर आदमी की प्रगति का ग्राफ़ सचमुच ऊपर की ओर जाता दिख रहा है। सब कुछ एक हसीन समाज की हसीन शाम का एक हसीन हिस्सा है। और अगर नहीं था तो इस कोशिश में लगा हुआ था कि उस हुस्न का जादू बिखरने-टूटने न पाए। शब्बो ने शैन का हाथ पकड़ लिया। पाया जो उसने कि उसकी उमंग की ख़ुशबू से अधिक प्रभावी मौल के माहौल में तैर रही ख़ुशबूएं थी। लिहाज़ा असर ये रहा कि जहाँ सड़क पर जनता उनकी ख़ुशबू के असर में थी, वहाँ मौल के अन्दर ये दोनों मौल की ख़ुशबू के असर में आ गई बहुत जल्दी।  

हर दुकान लालसाओं का एक पसारा है। जिसका फ़लक दुकान की भीतर किसी गहराई से उगता है और सामने से होकर गुज़रने वाली हाड़-माँस के हर पुतले के कलेजे में कई खालीपन छेदता हुआ चला जाता है। ठोस भौतिक अभाव के ऐसे छेद जिन्हे सिर्फ़ दुकान के माल को हासिल कर के ही पूरा और पाटा जा सकता है। शांति शर्मा और शबनम आलम, शैन और शब्बो के चोले में आकर दुनिया की रफ़्तार को अपनी गिरफ़्त में सिमटता हुआ पाती हैं। मगर जैसे-जैसे वे दुकानों के डिस्प्ले विन्डोज़ के आगे से गुज़रती जाती वैसे-वैसे वही दुनिया उन्हे अपने पैरों के नीचे से फ़िसलती समझ आती। और ये बोध भी आता कि उस रफ़्तार मे पिछड़ने से बचने, और उसे पकड़ने के औज़ार वही थे जो सामने चौंधियाती रौशनी में चमक रहे थे।

रफ़्ता-रफ़्ता पूरा माल उनकी आत्मा की झील में इस क़दर आच्छादित हो गया कि उनकी सहज उमंग उन गड्ढो में कहीं बिला गई जो मौल की छाया में पनप रहे थे। लालसाओं की लिस्ट में तमाम चीज़ें अपने आप जुड़ती जा रही थीं। पतली चमकीली पट्टी वाली आसमानी सैण्डल थी, चौड़े पायचों का धानी शलवार था, बुल्गारी का पर्फ़्यूम था, बैगिट का भूराअ बैग था, अकल्पनीय शेड्स की लिपस्टिक्स थीं। तमाम सारे मशहूर ब्राण्ड थे जो अविश्वसनीय कटौतियों के साथ ग्राहकों पर लुटाये जा रहे थे। रंगो, ख़ुशबुओं, धागों, धातुओं, आकृतियों और रौशनियों की विविध अभिव्यक्तियों के सम्मिलन में से अजब मादक और मोहक रसायन तैयार हो रहा था। इतना प्रबल कि जो शैन और शब्बो की जेब से उन पैसों का भी उच्चाटन कर लेना चाह रहा था जो वो जेब में ले के आए ही नहीं थे और जो बैंक की किताबों में दर्ज़ होने भी अभी बाक़ी थे

जो उमंग कड़वाहट के दंश को परास्त कर के उन्हे मौल ले के आई थी, वही लालसा के आगे नाकाम थी।  शब्बो ने शैन की ओर रहम की भीख माँगती निगाहों से ताका। 
और रिरियाया- 'कितने महीनों से खोज रही थे ये शेड.. फिर पता नहीं मिलेगी भी या नहीं..?'
पर शैन ने उसकी अरज़ी को पैर भी रखने की जगह नहीं दी, गिरते ही उड़ा दिया।
'हम क्या तय करके आए थे?.. कि कुछ भी नहीं ख़रीदेंगे।
हाँ..
तो फिर..
मगर..
कुछ मगर-वगर नहीं..चल पीपल के पेड़ के नीचे जैसवाल के गोलगप्पे खाते हैं और घर चलते हैं.. चल!

दोनों की कामना को गोलगप्पों का पानी में डुबकी दिलाने के खयाल के सहारे शैन अपनी पक्की सहेली का हाथ थामे-थामे मौल की रंगीनियों से बाहर निकल आईं। लेकिन इतनी पुरानी और गहरी दोस्ती है दोनों में कि सहज ही भाँप लेती है एक दूसरे का दिल। अपूर्णता के भाव ने शब्बो की आत्मा को कुछ इस तरह दबाया कि पार्किंग तक के सफ़र में एक बार भी शब्बो से चेहरा उठाते न बना। शांति शर्मा बहुत कड़क औरत है मगर इतनी भी नहीं कि अपनी बैस्ट फ़्रैण्ड की ख़ुशी के लिए अपने संकल्पों में ढील न कर सके।


अब इस तरह से मुँह बना कर रहने से तो अच्छा है कि तू कर ही ले अपने मन की..'
'नहीं रहने दे..
अब चल भी..
नहीं बरबादी है पैसों की..
‘सो तो है.. पर तू चलेगी तो कुछ पैसे मैं भी बरबाद कर लूंगी..

ये सुनते ही शब्बो के चेहरे पर एक चमक आ गई। कामनाओं के गढ़े भरने के पाप में एक साथी जो मिल गई रही थी उसे। कड़े अनुशासन के बाद मिली इस ढील में वैसा ही सुख था जो बड़ी लम्बी देर तक जूते बाँधे रखने के बाद, पैरों को उनसे आज़ाद कर देने में होता है। जब वो दुबारा स्कूटी के पास लौटे तो उनके बैंक एकाउण्ट थोड़ा हलक़ा हो गया था और दोनों हाथों में वज़न काफ़ी भारी हो गया था।

रात को सोते समय जब शांति शर्मा ने अपनी आँखें बन्द कर पूरे दिन को ख़ुशियों की तुलना की तो अपने आप को असमंजस में पाया। वो तय नहीं कर पा रही थी कि असली ख़ुशी का लमहा कौन सा था? जब दो सहेलियाँ अपने यौवन के उमंग पर सवार मौल के रास्ते में थीं? या जब वो मौल के माल को अपनी आत्मा में छेद करने का मौक़ा दे रही थीं? या जब उन्होने कुछ न खरीदने के अपने संकल्प में ढील देकर चीज़ें खरीदने का फ़ैसला किया? या फिर जब चीज़े हासिल कर के अपनी अलमारी में रख लीं? असली सुख कौन सा था? फिर नींद की नदी में डूबते हुए उसे याद आया कि पीपल के पेड़ के नीचे जैसवाल के गोलगप्पे खाना तो रह ही गया। और सब कुछ भूल कर वह सारी रात उस धमाके के सुख के सपने देखती रही जो उन गोलगप्पों को मुँह में रखकर फोड़ने से होता है।   

***

(पिछले इतवार भास्कर में छपी) 

4 टिप्‍पणियां:

माणिक ने कहा…

saarthak lekhan.

डॉ .अनुराग ने कहा…

दिलचस्प आदमी है आप......मिलना पड़ेगा रूबरू अब......

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जेब खाली रखकर जाने से डर लगता है, मन पर भरोसा नहीं है।

Swami Vijnanananda Saraswati ने कहा…

भाषा के परिपक्वता के साथ साथ अभिव्यक्ति की परिपाटिता एक अनूप संगम बनाती है - भाई सफ़र की रफ़्तार बनी रहे - यही शुब्कामनायें

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