मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

सूफ़ी मत: एक स्त्रैण धर्म

क़ुरान के भीतर बार-बार डराया गया है कि मुहम्मद की बात न सुनने वाले और इस्लाम के नियम को न मानने वालों को दोज़ख़ की आग में जलाया जाएगा। यह समर्पण कराने का पुरुषोचित तरीक़ा है। इस्लाम मानता है कि ये दुनिया आज़माईश की दुनिया है यानी यहाँ की अमीरी-ग़रीबी थोड़े दिनों की है, यहाँ पर किए गए कर्मों का फ़ैसला क़यामत के रोज़ होगा और उस दिन मुसलमानों को जन्नत में बाग़ और हूरे मिलेंगी और काफ़िरों को दोज़ख़ में जलाया जाएगा।

ये माना जा सकता है कि ईश्वर में विश्वास रखने वाला आदमी दोज़ख़ के डर से और जन्नत के लालच में उन नियमों का पालन करता है, लेकिन यह उसकी आस्था का मूल कारण नहीं है। जब आप हर चीज़ ख़ुदा के नियम के अनुसार करते हैं तो आप के भीतर ग़लत करने का या पाप करने का बोध बिला जाता है और आप पूरी तरह से अपराध बोध से पाक हो जाते हैं; असुरक्षा भी चली जाती है और भय भी निकल जाता है, बशर्ते विश्वास और नियम पालन पूरा हो। इसलिए मेरी समझ में मूल कारण अपने जीवन की ज़िम्मेदारी से आज़ादी है; यह मुक्ति का अलग स्वरूप है।

दूसरी ओर सूफ़ियों का मत यह स्वीकार कर लेता है कि ईश्वर कभी कोई इच्छा पूरी नहीं करता; अगर कभी करता है तो उसकी रहमत है। अपनी मानसिक व्याधियों से बचने का सर्वोत्तम उपाय समर्पण ही है। जो है उसी में राज़ी हो जाना। धर्म मानसिक व्याधियों के इलाज से अधिक और है ही क्या? या दूसरे शब्दों में कहें तो मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रतिरोध छोड़ देना ही धर्म का मूल है। रूमी का, और अन्य सूफ़ियों का, धर्म भी कुछ ऐसा ही है। वे आनन्द और शांति की खोज में हैं। कहा जा सकता है कि रूमी का धर्म स्त्रैण धर्म है। आम तौर पर देखा जाता है कि पुरुष का समर्पण शक्तिशाली के आगे जनित कमज़ोरी के चलते होता है, जबकि स्त्री समर्पण करती है तो अन्तःप्रेरणा से करती है, प्रेम में करती है।

परम्परागत इस्लाम में स्त्रैणता का अभाव है। अल्लाह रहमान ज़रूर है मगर उसके कठोर दण्ड देने वाले स्वरूप पर क़ुरान में अधिक ज़ोर है। हालांकि इस्लाम के जानकार बताते हैं कि इस्लाम में और क़ुरान में पौरुष और स्त्रैणता के दोनों ध्रुव पहले से मौजूद हैं। अल्लाह का क़हर पौरुष भाव है और अल्लाह का रहम स्त्रैण भाव है। अल्लाह के सारी सिफ़तों (गुणों) को तीन भागों में बाँटा जा सकता है। एक जलाल के गुण यानी उसके गर्म स्वभाव के गुण; दूसरे जलाल के गुण यानी सौन्दर्य और करुणा के गुण; और तीसरे वे गुण जो लिंगत्व से परे हैं जैसे सर्वव्यापकता। इसी तरह जन्नत भी अल्लाह के जमाल यानी स्त्रैणता की अभिव्यक्ति है और दोज़ख़ उसके जलाल यानी उसके पुरुषत्व की अभिव्यक्ति है।

कट्टर इस्लाम ने जलाल के, पौरुष के पक्ष पर बहुत अधिक ज़ोर दिया और धर्म के स्वरूप का संतुलन बिगाड़ दिया जिस के चलते जमाल के स्त्रैणता के भाव अभिव्यक्ति के लिए दूसरे स्रोतों से राह पाने लगे। सूफ़ी मार्ग इस्लाम की स्त्रैणता की अभिव्यक्ति है, ऐसा मान लेना अनुचित नहीं होगा।

यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि इब्नुल अरबी, शेख़ुल अकबर वो पहले सूफ़ी थे जिन्होने स्त्री के चेहरे, और उसके सौन्दर्य को लेकर काव्य रचा। उनका मानना था कि ईश्वर का सौन्दर्य स्त्री के मुखड़े में ही अपनी उच्चतम अभिव्यक्ति पाता है। शुरुआत में उन्हे और उनके काव्य को काफ़ी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा लेकिन सूफ़ी मार्ग के राहियों ने उनका बड़े स्तर पर अनुसरण किया, और स्त्री के रूपक में अल्लाह की बन्दगी सूफ़ी मार्ग का मज़बूत पाया बन गई। यहाँ तक कि रूमी भी ये लिखते हैं कि जब इबलीस को एक दफ़े पर्दे के पीछे से ईश्वर की उड़ती हुई झलक मिली तो वह एक औरत का दिलकश मुखड़ा था।

हालांकि इस अपवाद के अलावा रूमी पूरी तरह से मर्दानी सुहबत और मर्दानी दोस्ती के क़ायल हैं और उसी की जुस्तजू करते हैं। उनका इन्सानुल कामिल भी आदमी ही है, कोई औरत नहीं। जबकि तार्किक बात ये होगी कि अगर अल्लाह ने आदमी को अपनी शक्ल में गढ़ा है और रूमी बयान देते हैं कि ईश्वर का स्वरूप स्त्री का है तो इन्सानुल कामिल भी स्त्री की ही तरह होना चाहिये। और स्त्री के लिए शायद इन्सानुल कामिल हो जाना आदमियों से सरल होना चाहिये। लेकिन ऐसा है नहीं, रूमी स्त्री को इस लायक़ नहीं मानते हैं। मसनवी में एक भी दफ़े रूमी ने राबिया का ज़िक्र नहीं किया है जबकि तज़किरातुल औलिया में अत्तार ने दस पन्ने की तफ़्सील दी है। मनाक़िब ए आरिफ़ीन में अफ़लाकी रूमी के मुर्शिद शम्स तबरेज़ी के एक अजीब किस्से को जगह देते हैं जो कि कुछ यूँ है:

एक रोज़ शम्स औरतों के किरदार पर कुछ रौशनी डाल रहे थे, वे बोले कि अगर कोई औरत अल्लाह की कुर्सी और अर्श के उस पार भी चली जाय और फिर एक नज़र वो धरती पर डाले और वहाँ से उसे ज़मीन की सतह पर एक उत्तेजित लिंग दिखाई दे तो पागलों की तरह वहीं से छलांग मार कर उस पर सवार हो जाएगी। क्योंकि उन के दीन में उस के ऊपर कुछ नहीं है।

शम्स का यह बयान राबिया और उनके जैसी अन्य महिलाओं की आध्यात्मिकता को पूरी तरह नज़र-अंदाज़ करता है। यानी यह माना जा सकता है कि अपने मार्ग में स्त्रैणता के मूल भाव को अभिव्यक्ति देने के बावजूद सूफ़ी सिद्ध और साधक स्त्रियों के प्रति अपने समय के पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हो सके थे।

सन्दर्भ:
१. मुनाक़िबे आरिफ़ीन के अंग्रेज़ी अनुवाद फ़ीट्स ऑफ़ नोअर्स ऑफ़ गॉड, जॉन ओ केन, पृष्ठ ४४१


(शालीनता की सीमाओं में रहने की मुराद से इस लेख को 'कलामे रूमी'  में छपने से बचा लिया गया)


15 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सूफियाना मत पर बहुत अच्छी रचना, दार्शनिक अवलोकन के समय इसका संदर्भ उपयोगी रहेगा।

नीरज बसलियाल ने कहा…

अभी तक मुझे सिर्फ इतना पता है कि सूफी मत अल्लाह से प्यार करने का मत है | इसमें अल्लाह एक प्रेमी, कभी एक दोस्त की तरह है | आप अल्लाह से मनुहार जता सकते हैं, अपनी नाराजगी बयां कर सकते हैं | समर्पण का यह मत, इसे हिन्दू या मुस्लमान किसी धर्म की दरकार नहीं है |

रंजना ने कहा…

जैसा कि नीरज जी ने कहा- सूफी सम्प्रदाय के विषय में हम इतना ही जानते हैं कि अल्लाह को प्रेमधार जीवात्मा को प्रेमी रूप में मान समर्पित भाव से उस परमसत्ता से प्रेम ही सूफी सम्प्रदाय का साध्य है..

पर आपने जो यह अंश उधृत किया -

"एक रोज़ शम्स औरतों के किरदार पर कुछ रौशनी डाल रहे थे, वे बोले कि अगर कोई औरत अल्लाह की कुर्सी और अर्श के उस पार भी चली जाय और फिर एक नज़र वो धरती पर डाले और वहाँ से उसे ज़मीन की सतह पर एक उत्तेजित लिंग दिखाई दे तो पागलों की तरह वहीं से छलांग मार कर उस पर सवार हो जाएगी। क्योंकि उन के दीन में उस के ऊपर कुछ नहीं है।१ "

मन एकदम वितृष्णा से भर गया...
मुझे बिलकुल अनुमान न था कि सूफी मत में भी स्त्रियों को उतने ही हेय दृष्टि से देखा जाता है जितना इस्लाम में...
बहुत अफ़सोस हुआ जानकार..

अभय तिवारी ने कहा…

रंजना जी,
समस्या सूफ़ी मत में नहीं कालखण्ड की है। उस कालखण्ड में शायद ही कोई ऐसा विचारक या सुधारक मिले जो स्त्रियों के लिए उदार रुख़ रखता हो। जब कबीर जैसे महात्मा तक स्त्रियों के सम्बन्ध में सीमित चेतना का ही प्रदर्शन कर सके तो इसलिए नहीं कि वे स्त्री विरोधी थे बल्कि उनका काल स्त्रीविरोधी था।

रूमी और कबीर, स्त्रियों के प्रश्न को छोड़ दें तो, दोनों ही श्रद्धेय हैं।

Mired Mirage ने कहा…

अभय,यह भली कही आपने.यदि स्त्रियों के प्रश्न को छोड़ दें तो मुझे तो लगभग सारा संसार श्रद्धेय नजर आता है, जैक द रिपर भी. सारी समस्या तो तभी आती है जब प्रश्न स्त्रियों का उठता है.
किन्तु प्रश्न तो यह भी उठता है कि यदि स्त्रियां ऐसी हैं तो बनाने वाला तो वह अल्लाह ही था न, दोष रचना को देंगे या रचयिता को?
वैसे स्त्री अच्छे काम कर जन्नत क्यों जाए? क्या उसे हूरों में रूचि होनी चाहिए? क्या यह(हूरों में रूचि ) धर्म विरोधी बर्ताव न होगा? या उसे नर हूर मिलते हैं?
वैसे उस जमाने में स्त्री के प्रति लोग अपनी राय अपनी माँ या बहन या पत्नियों को देखकर ही बनाते होंगे.सहपाठिनें, सहकर्मी स्त्रियाँ तो क्या रहती होंगी.शम्स जी जो अपने घर में देखते होंगे वही लिख दिया.
वैसे हाल ही में समाचार पत्र हमें यह भी बता रहे थे कि पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियां कम कामुक होती हैं.एक बात और यदि स्त्रियां शम्स जी के कथनानुसार होती थीं तो चार विवाह उनके होने चाहिए थे या पुरुष के?
देखिये आख़िरी पंक्तियाँ सारे लेख पर भारी पड गईं . :)
घुघूती बासूती

अभिषेक ओझा ने कहा…

हम्म...
सारे ही धर्म पुरुषों ने बनाए हैं इसमें कोई शक नहीं. अलग अलग जगहों पर होते हुए भी कारण भी बहुत अलग नहीं रहे होंगे.
सूफी के बारे में ज्यादा पता नहीं... थोडा बहुत और जान गए आज.

मो सम कौन ? ने कहा…

नीरज जी वाले विचार ही अपने विचार हैं। मौलाना रूम और शम्स तबरेज़ को कुछ पढ़ा है, लेकिन जो अंश आपने उद्धृत किया है, वो पहली बार पढ़ा।
लेखन पर कालखंड का प्रभाव मानने वाली बात है। किसी व्यक्ति की एकाध अच्छी या बुरी सोच के कारण ही अपनी पसंद नापसंद को फ़िर से तौल स्कते हैं। हम अपने मतलब की चीज छांट कर अपनी धारणा बना बिगाड़ सकते हैं। अपने मनपसंद स्टोर में जाकर भी हम सब सामान तो नहीं ही लाते, जिस चीज की जरूरत है उसी को लाते हैं।
इसलिये इस पोस्ट से जई जानकारी तो मिली, लेकिन अपन पुरानी जानकारी को मह्त्व देंगे।

Farid Khan ने कहा…

एक अच्छा विश्लेषण।

सभी धर्म, मत और विचार अपने काल से बँधे होते हैं। वह उनकी विशेषता भी होती है और सीमा भी। इसके आधार पर कोई धारणा बना लेना उचित नहीं है।

फ़ेसबुक के हमारे एक मित्र राजू रंजन प्रसाद ने बुद्ध के बारे में विश्लेषण करते हुए बताया कि वे भी स्त्री विरोधी थे। उनके संघ में भिक्षुणियों का दर्जा भिक्षुकों से कम था। इस लिंक से देखें http://www.facebook.com/notes/drraju-ranjan-prasad/buddha-ka-stri-vimarsa/138104356243903

पर इसके आधार पर बुद्ध की क्रांतिकारी उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता। तुलसीदास पर भी आरोप लगते ही रहे हैं। इससे तुलसीदास की महत्ता कम नहीं होती।

घुघूती जी, आपकी बात से एक बात याद आई। लगभग 70 साल पहले एक बार इस्मत चुग़्ताई ने कहा था कि अगर जन्नत में मर्दों को हूरें मिलेंगी तो हम औरतों को भी हूरा मिलना चाहिए।

पर आज भी अपने आस पास नज़र घुमाता हूँ तो पाता हूँ कि जन्नत केवल मर्दों के लिए ही है।
......................
बहरहाल मुझे 'राबिया बसरी' से ग़ालिब का एक शेर भी याद आ रहा है जो मज़हब से बग़ावत करता है।

ता'अत में ता रहे न मयो अंगबीं की लाग
दोज़ख़ में डाल दो कोई लेकर बहिश्त को

सार - जन्नत की लालच में लोग इबादत करते हैं। ऐसी जन्नत को उठा कर झोंक दो जहन्नुम में, ताकि उनकी इबादत या ईश्वर प्रेम में कोई लालच न हो।

इसीलिए फिर ग़ालिब कहते हैं।
वफ़ादारी बशर्ते उस्तुवारी अस्ल ईमाँ है
मरे बुतख़ाने में तो का'बे में गाड़ो बरहमन को।

यानी असली ईमान तो वफ़ादारी के स्थायीत्व में है।

फ़ीरोज़ अहमद‍ ने कहा…

सूफी मत पर यहां काफी कुछ जानकारी हुई, मुझे हिन्दी की कोई पुस्तक का नाम बतलाईये.

Shanu ने कहा…

सूफियाना मत की किसी हिन्दी पुस्तक का नाम बतलाएं.

Saifuddin Ayaz ने कहा…

सहीं है कि
हम अपने मतलब की चीज छांट कर अपनी धारणा बना बिगाड़ सकते हैं। अपने मनपसंद स्टोर में जाकर भी हम सब सामान तो नहीं ही लाते, जिस चीज की जरूरत है उसी को लाते हैं।

सूफ़ी मत खालिस ख़ुदा की मुहब्बत का पर्याय है। अब इसके अलावा कुछ और दिखे तो ये सिर्फ नज़रिए की बात है।

सूफीवाद की सहीं जानकारी आपको "सूफ़ीयाना मैगज़ीन" से मिल सकती है।
www.sufiyana@gmail.com
www.sufiyana.com

राकेश कुमार श्रीवास्तव राही ने कहा…

संग्रह योग्य आलेख.

Unknown ने कहा…

स्टोर वाले उदाहरण से सहमत...

Shahnawaz Khan ने कहा…

Sahi kaha apne sufi warg ne islam ka sahi arth dhuda or wahi insaniyat he

Unknown ने कहा…

Islam m istree ko jo darja or ahmiyat di gai hai vo kisi or dharm m nahi milti per afsos is baat ka h k kuch dhrm k thekedaron n is baat ko tod mod k samne rakha

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