मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

हिन्दी में कौन स्टार है?

पिछले दिनो कुछ रोज़ दिल्ली के अन्तराष्ट्रीय पुस्तक मेले में बीते। कई दोस्तो से मिलना हुआ। कुछ किताबें ख़रीदी और बहुत सारी देखीं। मेले मे ही लाल्टू के कविता संग्रह 'लोग ही चुनेंगे रंग’ और गीत चतुर्वेदी के संग्रह 'आलाप में गिरह' के लोकार्पण में भी शिरकत हो गई। मित्र बोधिसत्व की नई किताब ’ख़त्म नहीं होती बात’ का भी विमोचन हुआ। बोधि उसमें नहीं पहुँच सके और संयोग से मैं भी मेले में होने के बावजूद नहीं पहुँच सका। जब पहुँचा तो किताब को मोक्ष मिल चुका था।

मेले में ख़ूब भीड़ थी। हिन्दी किताबों के हॉल नम्बर १२ में तो गज़ब की भीड़ थी। सभी प्रकाशकों के बड़े-बड़े स्टॉल्स थे। राजकमल प्रकाशन और वाणी प्रकाशन के तो इतने बड़े स्टॉल थे कि विमोचन करने और गपियाने के लिए एक अलग जगह निकाली गई थी। ये जगहें हिन्दी के लेखकों और विचारकों के आपस में टकराने का अड्डा भी थीं। मैं भी वहीं-कहीं उस संघर्षण के आस-पास बना हुआ था। तमाम दोस्त -ब्लॉगर और ग़ैर-ब्लॉगर- मिल रहे थे। दोस्तों और किताबों से भरी-भरी ये दुनिया बड़ी भली लग रही थी।

ऐसे ही किसी भले-भले पल में मेरे कान में लाउडस्पीकर से गूँजती आवाज़ आई कि राजकमल प्रकाशन के मालिक अशोक माहेश्वरी जी पाठकों के साथ, सीधी बातचीत और सुझावों के लिए उपलब्ध हैं। मेरे भीतर एक घंटी सी बजी। मेरे मन में हिन्दी किताबों की दुनिया को लेकर जो बाते हैं, उसे एक सही मंच पर कहने का इस से बेहतर मौक़ा नही मिलेगा। मैं राजकमल के स्टॉल की ओर चल पड़ा। वहाँ अनुराग वत्स पहले से मौजूद थे। अशोक जी एक गोल मेज़ पर दो-चार लोगों से गुफ़्तगू कर रहे थे। मैं बातचीत शुरु होने का इन्तज़ार करने लगा। पाँच-दस मिनट यूँ ही बीत गए तो समझ आया कि मंच जैसा कुछ होगा नहीं, जो भी कहना-सुनना है वो ऐसे ही मेज़ पर आमने-सामने बैठ कर होना है। तो हम ने जा कर अशोक जी की गोल मेज़ के गिर्द कुर्सियाँ सम्हाल लीं।मैं ने उनसे जो कहा उसका सार कुछ ऐसे हो सकता है;

मैंने अशोक जी से सवाल किया कि हिन्दी लेखक का हाल अंग्रेज़ी के लेखक की तुलना में इतना मरियल क्यों है? क्या वह इसलिए है कि वह घटिया लेखक है या इसके कुछ और कारण है? भारत का मध्यवर्ग हिन्दी की किताबें नहीं पढ़ता लेकिन अंग्रेज़ी की किताबें ख़रीदता रहता है। हिन्दी साहित्य की दुनिया में कोई स्टार लेखक क्यों नहीं है?

जबकि हिन्दुस्तान के अंग्रेज़ी साहित्य की ओर देखिये तो तस्वीर एक्दम लग नज़र आती है। अंग्रेज़ी का प्रकाशन उद्योग न सिर्फ़ अपनी किताबों को लेकर एक आक्रामक रणनीति अपनाता है बल्कि अपने लेखको को चढ़ाने में भी जी-जान लगा देता है। अभी हाल के बुकर पुरुस्कार विजेता लेखक अरविन्द अडिगा की मिसाल लीजिये। उनकी किताब को बेहद मामूली गिनता हूँ मैं और दूसरे पढ़ने वाले भी। मगर सच्चाई ये है कि ये राय हमने किताब ख़रीदने कर पढ़ने के बाद क़ायम की है। आज अंग्रेज़ी के परिदृश्य में हाल ऐसा है कि किताब बाद में आती है लेखक पहले ही स्टार हो जाते हैं। प्रकाशक अपनी मार्केटिंग से ऐसा माहौल बना देते है, आम लोगों के मन में ऐसी जिज्ञासा पैदा कर देते हैं कि उनके मन में किताब ख़रीदने की प्रेरणा जाग उठती है।

उनके इस काम में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों तरह का मीडिया उनका ख़ूब सहयोग करता है। वे पुरस्कारों के ज़रिये लेखकों का बाज़ार गर्म करना जानते हैं और साथ ही लगातार अख़बारों में बैस्टसैलर सूची प्रकाशित करके पाठकों को ख़रीदी जा सकने वाली किताबों के प्रति धकेलते भी रहते हैं। जबकि हिन्दी में कोई प्रकाशक ऐसा करने में रुचि नहीं रखता और पु्रस्कारों की तो अलग राजनीति ही चल पड़ी है। उस पर बात करुंगा तो विषयान्तर हो जाएगा।

मैं यह नहीं कहता कि प्रकाशन उद्योग मार्केटिंग की दूसरी हद पर जा कर कचरे को हमारे गले में ठेलने लगे। लेकिन ये भी क्या बात हुई कि बाज़ार की ताक़त का इस्तेमाल अ़च्छी चीज़ के प्रसार के लिए करने से भी क़तरा जायं। पूरा प्रकाशन उद्योग पाठकों के बीच अपना माल बेचने के लिए किसी भी तरह की रणनीतियों के प्रति पूरी तरह उदासीन है। क्यों? क्या अख़बारों और टीवी के ज़रिये लेखकों और उनकी किताबों के प्रति जिज्ञासा पैदा करना इतना दुरूह है? क्यों हिन्दी के पास आज एक भी स्टार लेखक नहीं है?

विनोद कुमार शुक्ल एक अप्रतिम लेखक हैं, उनका लेखन हिन्दी में ही नही विश्व साहित्य में अनोखा है, अद्वितीय है। उदय प्रकाश भी बेहद मक़बूल कथाकार हैं। लेकिन हिन्दी साहित्य की दुनिया के बाहर कोई उनके नाम भी नहीं जानता? जबकि अरविन्द अडिगा के नाम से बच्चों की परीक्षा में सवाल बनाया जा सकता है, क्यों? क्यों नहीं विनोद जी या उनके जैसे दूसरे साहित्यकारों को एक स्टार की बतौर चढ़ाया जा सकता?

मज़े की बात ये है कि अगर हिन्दी के पास कोई स्टार है तो वो एक लेखक नहीं एक आलोचक है- नामवर सिंह। ये बात मैं बिना उनकी आलोचकीय गरिमा पर कोई आक्षेप किए हुए कर रहा हूँ। आलोचक की साहित्य में अपनी जगह है लेकिन वो लेखक के लिए पाठक के हृदय में जो मुहब्बत जो अपनापन होता है, उसका स्थानापन्न कतई नहीं हो सकता।

अशोक जी ने मेरी बात शांति से सुनी और माना कि यह स्थिति का सही चित्रण है। लेकिन उनका कहना था कि हिन्दी में स्टार लेखक नहीं है यह कहना ठीक नहीं; कुँवर नारायण और कृष्णा सोबती भी किसी स्टार से कम नहीं। बैस्ट्सैलर सूची का आइडिया उन्हे अच्छा लगा पर अख़बारो के वर्तमान बाज़ारीकरण की सूरत में उसके आर्थिक पक्ष को पूरा कर पाने में ख़ुद को असमर्थ बताया।

उनसे जिरह करने के बजाय मैंने अपना दूसरा सवाल अशोक जी से इसी आर्थिक पक्ष के मुतल्ल्कि किया। हिन्दी में लेखकों और अनुवादकों को पैसे क्यों नहीं मिलते? जबकि अंग्रेज़ी में ये हाल नहीं है? इस के जवाब में उनका कहना था कि हिन्दी किताबों का अर्थशास्त्र जितनी गुंज़ाइश देता है, उतना वह अवश्य करते हैं। मैं ने उनसे कहा कि पुस्तक मेले में हिन्दी प्रकाशकों ने जितनी जगह ले रखी है और उन पर जिस तरह से जनता टूटी हुई है, उसे देखकर तो यह बिलकुल नहीं लगता कि हिन्दी साहित्य में कोई अर्थशास्त्रीय संकट है।

"मैं जिन-जिन लेखकों को जानता हूँ, उनमें से किसी ने अपनी किताब से पाँच-दस हज़ार से कमाई की बात नहीं बताई। हो सकता है कमलेशवर की किताब ’कितने पाकिस्तान’ या सुरेन्द्र वर्मा की ’मुझे चाँद चाहिये’ से अच्छी रॉयल्टी बनी हो, लेकिन वह उतनी नहीं हो सकती कि वे एक रोमान्टिक्स लिखकर पंकज मिश्रा की तरह जीवन की असुरक्षाओं से मुक्त हो पहाड़ो में विचरण करते रहें। अनुवादक के हाल तो पूछिये ही मत।" यह कहते-कहते अशोक जी का कोई फ़ोन आ गया। कुछ और लोग आ गए, वे उनसे मुख़ातिब हुए। मैं समझ गया मेरा समय समाप्त हुआ। मैं ने उन्हे मेरी बात सुनने का धीरज दिखाने के लिए धन्यवाद किया। और उन्होने खड़े होकर, हाथ मिला कर मुझे विदा किया।

मैं अशोक जी से यह नही कह पाया कि पुस्तकालयों से अलग आम पाठकों के बीच भी किताब का एक बाज़ार होता है, लेकिन हिन्दी प्रकाशक उसके प्रति उदासीन है। वेदप्रकाश शर्मा की किताबों के विज्ञापन आप को बस स्टेशन्स वगैरह पर दिख जायेंगे, लेकिन उदय प्रकाश की नहीं। क्या यह इसलिए है कि वेदप्रकाश पूरी तरह पाठकों पर निर्भर है और उदयप्रकाश के प्रकाशक पुस्तकालयों पर?

हिन्दी राजभाषा है और हर सरकारी संस्थान में हिन्दी की किताबें ख़रीदने का एक बजट होता है, चाहे वो किताबें पढ़ने वाला हो या न हो। इन संस्थाओं में कौन सी किताबें आएंगी और कौन सी नहीं यह फ़ैसला भी ऊँचे राजकीय अधिकारियों द्वारा सिफ़ारिश के आधार पर लिया जाता है। विडम्बना यह है कि हिन्दी साहित्य की पुस्तकालयों की यह ख़रीद ही हिन्दी के प्रचार-प्रसार में सबसे बड़ी बाधा बन गई है। बैठे-बैठे माल बिकता हो तो उस के लिए इधर-उधर दौड़ने की क्या ज़रूरत? जिसके चलते प्रकाशक आम पाठक को न तो किताब बेचने का कोई वितरण-तंत्र विकसित करने के लिए मशक्कत करते हैं और न उनके बीच प्रचार-प्रसार की कोई व्यवस्था। की बात यह है कि हिन्दी किताबों की दुकानों के सम्पूर्ण अभाव के बावजूद हिन्दी साहित्य बना हुआ है और पढ़ा भी जा रहा है। मेले में आई भीड़ इसका साफ़ सबूत है।

पुस्तकालयों में किताबों की सिफ़ारिश करने वाले ही सचमुच आज हिन्दी प्रकाशकों के लिए असली स्टार्स हैं| प्रकाशकों के लिए और लेखकों के लिए भी। क्योंकि उनकी राय से ही प्रकाशक तय करते हैं कि किताब छपने योग्य है कि नहीं। तो इस तरह से राजतंत्र में भीतर तक धँसे यही गणमान्य जन लेखकों के भी माई-बाप हो जाते हैं। जबकि वेदप्रकाश शर्मा बिना किसी आलोचक की परवाह किए सीना चौड़ा कर के अपना सस्ता साहित्य छापता जाता है क्योंकि वह पाठको से सीधे सम्पर्क में है।



*अभी हाल में हिन्दी के कवि देवी प्रसाद मिश्र को उनकी डॉक्यूमेन्टरी ’फ़ीमेल न्यूड’ के लिए राष्ट्रीय पुरुस्कार मिला है। इस की कहीं चर्चा नहीं है। एक कवि की अभिव्यक्ति के दूसरे इलाक़े में ऐसी उपलब्धि अंग्रेज़ी की दुनिया में अछूती न रह जाती। देवी भाई से मेरा परिचय इलाहाबाद के दिनों से है। मैं उनकी फ़िल्म अभी देख नहीं सका हूँ, लेकिन कविताओं में वे जितना संतुलन और संयोजन बरतते हैं उस से कल्पना की जा सकती है कि फ़िल्म ज़रूर पुरस्कार योग्य होगी। देवी भाई को मेरी बहुत बधाईयां और शुभकामनाएं।

20 टिप्‍पणियां:

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

बहुत बढ़िया पोस्ट है. मुझे बहुत पसंद आई.

आपके सवाल बिल्कुल सही हैं. पुस्तकालयों में किताबें खपाना, कहीं कोर्स में लगवा देना, सरकारी पैसे के एवज में किताबें बेचने का उद्देश्य, यही सारे कारण हैं हिंदी साहित्य की किताबों को पीछे धकेलने के पीछे. वेदप्रकाश शर्मा की किताबों का विज्ञापन होता है और उदय प्रकाश जी की किताबों की चर्चा अखबारों में भी नहीं होती. स्तम्भ लिखने वाले भी चर्चा नहीं करते. हिंदी को शायद सरकार ने बंधक बना रखा है.

प्रकाशकों को कोई ऐसा आईडिया लाना पड़ेगा जिसे देखकर सब कहें कि; ह्वाट ऐन आईडिया सर जी..."

अंशुमाली रस्तोगी ने कहा…

इससे क्या, क्यों और किसे कोई फर्क पड़ता है कि हिंदी में कोई स्टार लेखक है या नहीं? अपने हिंदी साहित्य में ऐसे बहुत से महान प्रगतिशील लेखक हैं, जो पुरस्कार बटोरने में तो स्टार हैं ही। यह क्या कम है!

अतुल्य ने कहा…

मूल बात यह है कि हिन्दी प्रकाशक सामंती सोच से चलता है। उसके लिये लेखक मात्र बंधुआ मज़दूर के समान है, जिसके ज़रिये वह ख़ुद तो कमाना चाहता है लेकिन देना नहीं। यह कटुसत्य है, तक़रीबनसभी हिन्दी लेखक इस पीड़ा से परिचित हैं। बेहतरीन पोस्ट। देवी प्रसाद मिश्र जिनको उनकी डॉक्यूमेन्टरी ’फ़ीमेल न्यूड’ के लिए राष्ट्रीय पुरुस्कार मिला है, का संपर्कसूत्र यदि भिजवा सकें तो उपकार होगा।
अतुल्य

atulyakirti@gmail.com

सतीश पंचम ने कहा…

अभय जी, एक प्रसंग है।
अक्सर ऑफिस जाते आते हम कलीग्स में आपसी मजाक चलते रहता है। इसी बीच कोई लैपटॉप में उलझा रहता है तो कोई एफ एम सुन रहा होता है। मैं कभी अपने हाथ में अमरकान्त को लिये रहता हूं तो कभी धर्मवीर भारती को.. कभी कोई पत्रिका तो कभी उपन्यास ।
एक दक्षिण भारतीय शख्स को मेरा इस तरह रोज रोज कुछ न कुछ पढना बहुत अच्छा लगता है। वह भी पढता है लेकिन अंग्रेजी नॉवेल ही।
एकाध बार तो मेरे हाथों में हिंदी की पत्रिका देख जान बूझकर मुझसे मजाकिया चुहल शुरू होती है कि मराठी सीख रहे हो ? जल्दी सीख लो। बताने पर कि यह हिंदी है मराठी नहीं। सलाह मिलती है कि हिंदी पर कवर लगा लो वरना राज ठाकरे का एरिया आ रहा है। इस तरह के हंसी मजाक चलते रहते हैं।
कल ही ऑफिस में मेरे डेस्क पर कुरियर से हंस (फरवरी) पत्रिका आई थी। आज वही पढ रहा था। दक्षिण भारतीय मित्र आज सीट छोड कर बैठा था। उसे पत्रिका ठीक से दिख नहीं रही थी और मजाक शुरू हुआ - कि क्या मस्तराम पढ रहे हो क्या ।
हम सभी हंस पडे। मैं भी मजाक में शामिल हो गया। इतने में हिंदी भाषी मित्र ने चुहल शुरू की कि क्या मालूम किधर किधर से बुक्स लाते रहते हो। कभी अमरकान्त, कभी भारती वगैरा वगैरा...जब कि मैं अच्छी तरह समझ रहा था कि यह शो ऑफ हो रहा है। नाक भौं सिकोडने वाला यह हिंदी भाषी शख्स हिंदी की बजाय इंगलिश को पढ गर्वान्वित है। लैपटॉप में किसी इंग्लिश नॉवेल का पीडीएफ वर्जन देख पढ फूला नहीं समाने वाले इस शख्स को हिंदी दरिद्र लग रही है शायद।
खैर, इधर दक्षिण भारतीय मित्र का विचार था कि डेली रिडिंग इस ए गुड थिंग यार। इट्स इंसपायरिंग कि यू आर डेली रीडिंग ए हिंदी लिट। मैं तो सो जाता हूं इवन इफ आई रीड इंग्लिश।
आप की पोस्ट पढ मैं अब तुलना कर रहा हूं कि एक ओर वह दक्षिण भारतीय शख्स है जो हिंदी को पढना इन्सपायरिंग मान रहा है और दूसरी ओर एक हिंदी भाषी है जो हिंदी वाला होकर भी हिंदी के नाम से ही नाक भौं सिकोंड रहा है।
स्टार बने तो कैसे ?

अभय तिवारी ने कहा…

अतुल्य, मेरे पास भी अभी कोई सूत्र नहीं है.. मिलने पर सूचित कर दूँगा।

योगेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा…

वैसे तो आज का टोपिक काफी हॉट है, भाषा और उससे संस्कृति-सभ्यता और फिर सभ्यताओं का तुलनात्मक अध्ययन तक खींचा जा सकता है | खैर |

कारण तो बिना शक सुबह के हमारी स्वदेशी विरोधी विचारधारा है जो हिंदी लेखक को समुचित सम्मान पाने से रोकती है | अंग्रेजी लेखक ही क्यों हर वो चीज़ स्टार है जो अंग्रेजीदा है | आलू की चिप्स दूकान वाला घर पर बनाके बेचे तो कितने लोग लेंगे | वही चिप्स हवा भरके स्टायलीस्ट पैक में बेचो तो सब लेंगे | मेरे कुछ फिस्सडी दोस्त (साहित्य पठन के मामले में ) अब चेतन भगत के अंग्रेजी नोवेल पढ़ते हैं , चेतन को आये दस दिन नहीं हुए होंगे लेकिन जो दसियों साल से लिख रहें उनके बारे में उन मित्रों ने कभी चर्चा नहीं की | गौरतलब हो चेतन IIM से MBA कर चुके हैं उन्हें हिंदी के बजाय अंग्रेजी में लिखने का फायदा अच्छी तरह मालूम है ;-), पिछले दिनों रणदीप हुड्डा की एक मूवी 'Love Khichadi' आई थी, उसका नायक साफ़ तौर पर आपको समझाता है की हिंदी में बोलने पर लड़कियां आपको घास नहीं डालती इसलिए अंग्रेजी सीखना और बोलना कितना जरूरी है | अब ये तो हमारी सोच है, जैसी है वैसी है, सबको एक साथ बदलना नामुमकिन है हाँ उनके चुतियेपन का फायदा उठाकर पैसा जरूर बनाया जा सकता है, लेकिन उनको सुधारने जाओगे तो उलटे जूते पड़ेंगे | इस पदार्थवादी दुनिया में दो ही टाइप के लोग हैं एक जो बेवक़ूफ़ (अपनी ख़ुशी से ) बनते हैं, दुसरे वो जो दूसरों को बेवक़ूफ़ बनाकर ऐश करते हैं |

वैसे तो स्टार-विस्टार की चाह एक लेखक के लिए मायने नहीं रखती | लेखन के अलावा वो सितारा हैसियत पाने के लिए अलग से प्रयास नहीं करेगा | हाँ पैसे की इस दुनिया में पैसे का महत्व देखते हुए थोडा मार्केटिंग करनी ही पड़ेगी क्योंकि भूखे पेट भजन करना सबके बस की बात नहीं | मार्केटिंग का मतलब ग्राहक को क्या-किस रूप में चाहिए उसको समझकर माल बेचना है | यहाँ "गांधीवाद" को "गांधीगिरी" बनाकर बेचो तो सब खरीदते हैं, ऐसे कोई नहीं लेगा | हिंदी प्रकाशकों और लेखकों को इस दौड़ में शामिल होना ही पड़ेगा बैठकर गरीबों की तरह रिरियाने से तो लिखने की कलम के पैसे भी नहीं बचेंगे |

अजित वडनेरकर ने कहा…

अभय भाई, सारी बातें सही हैं। मगर एक उपभोक्ता के तौर पर हिन्दी के सामान्य पाठक को किताबों के महंगे होने का रोना रोने से भी बचना होगा। वह साल भर में पांच हजार रूपए सिनेमा पर खर्च करता है। लगभग इतना ही यात्राओं पर। इतना ही होटलों में खाने पर और करीब छह हजार रूपए जेबखर्च पर। इसमें पान, बीड़ी, सिगरेट शामिल है, पर शराब नहीं। उसका खर्च अलग। कहने का अर्थ यह कि यह राशि शौक के नाम पर खर्च की जाती है। जिस मद में इसे फूंका जा रहा है उसका कोई स्थूल रूपाकार सहेजा नहीं जाता। सिर्फ सुखानुभूति रहती है जो कुछ दिनों बाद तिरोहित हो जाती है।
इसके बावजूद साल भर में दोसौ, तीन सौ या पांचसौ रुपए की एकाध किताब खरीदने के नाम पर वह महंगाई का रोना रोता है जबकि यह खरीद जीवन भर उसके पास रहनेवाली है। उसके परिवार को संस्कार देनेवाली है और मोहल्ले में उसके पढ़ेलिखे होने का सबूत भी बनने वाली है। इसके बावजूद गैरज़रूरी निवेश पर पैसा फूंकना हम हिन्दीवालों की ज़हालत है।

Mired Mirage ने कहा…

अभय, यह मुद्दा मुझे भी बहुत परेशान करता है, विशेषकर इसलिए कि मैं खुद हिन्दी वाली होकर अपनी बच्चियों को हिन्दी प्रेम न दे सकी। कारण ठोस थे किन्तु फल तो यही निकला न कि आज वे ही मेरी रचनाओं को नहीं पढ़तीं।
हिन्दी के स्कूली पाठ्यक्रम बच्चों लायक तो बिल्कुल नहीं होते थे। बच्चों के लायक से मेरा तात्पर्य बच्चों की रुचि बनाए रने वाले से है।
हिन्दी की पुस्तकें सुलभ नहीं हैं, उनपर चर्चा नहीं होती।
कारण अनेक हैं किन्तु कुछ तो करना ही होगा।
घुघूती बासूती

Mired Mirage ने कहा…

रखने*
घुघूती बासूती

दीपक 'मशाल' ने कहा…

हिंदी साहित्य और भाषा दोनों को नुक्सान पहुँचाने के लिए सबसे अधिक दोषी हिन्दीभाषी ही हैं.. जो कदम कदम पर अपनी ही मातृभाषा को ठुकराते रहते हैं..
जय हिंद... जय बुंदेलखंड...

Vivek Rastogi ने कहा…

ओह बहुत बढ़िया, वाकई बाजार में हिन्दी किताबों का टोटा है, कहीं भी किसी भी बड़े प्रकाशन की बुक स्टोर पर जाओ तो जो किताब चाहिये होती है वही नहीं मिलती है, बाकी कूड़ा-करकट तो बहुत मिलता है। प्रकाशनों को यह समझ में आ जाये कि आम आदमी भी किताबों को पढ़ना चाहता है, जो कि पुस्तकालय में सहज उपलब्ध हैं, पर पहुँच नहीं है, अगर यही पुस्तकें बाजार में उपलब्ध होंगी तो शायद हिन्दी पाठकों का भला होगा।

Arvind Mishra ने कहा…

यहाँ प्रकाशकों की बदनीयती के चलते ही सारा गुड गोबर हुआ है और आप एक प्रकाशक को अपने से श्रेष्ठ मानते हुए बतियाने लगे .
एक लेखक का आत्म संस्मरण था की वह किसी बड़े प्रकाशक के प्रतीक्षा कक्ष में इंतज़ार ही करता रह गया उसे बुलाया नहीं गया और कई
नवोदित रचनाकारों ने उसी दौरान प्रकाशक से बता भी की और उसकी काफी भी पी ....

डॉ .अनुराग ने कहा…

अभय जी .याद नहीं कथादेश या नया ज्ञानोदय या परिकथा में किसी ने या आलम जौकी ने लिखा था हिंदी लेखको को अपने आपको बेचना नहीं आता .वो सच कहा था ...हेदराबाद या बेंगलोर के एयरपोर्ट पर मैंने अंग्रजी लेखको की इतनी किताबे देखी आधो के नाम तो मैंने सुने भर नहीं थे.....पर सवाल प्रकाशन ओर इश्तेहार बाजी का भी है .....ओर माने न माने हिंदी लेखक इसमें पीछे है .शायद उसे हिचक है अपने लिखे को बेचने में .......
आप कहते है विनोद शुक्ल को लोग नहीं जानते ....मै इसे दूसरी तरह से कहता हूं .साहित्य भी ग्रूमिंग किया जाता है एक उम्र में ....इंटरेस्ट डवलप करना किसी बच्चे में .किसी किशोर में .कितनी लाइब्रेरी होती है किसी शहर में ?मेरठ शहर में किताबो की दो दुकाने है .पर वो कभी कमलेश्वर की" कितने पाकिस्तान" का बैनर नहीं लगाती .चेतन भगत का लग जाता है ..जाहिर है प्रकाशक अग्र्रेसिव है ....
.तो क्या भाषा की विद्धता ओर लेखक का ज्ञान भी आम लोगो को आतंकित करता है .जिससे हिंदी साहित्य केवल सीमित पाठको में सिमट गया है ?या बकोल जौकी .हिंदी भाषा वाले अभी भी अपनी नैतिकता ओर जादुई यथार्थवाद के चश्मे नहीं उतार पाए है ....वे दलित ओर स्त्री विमर्श में ही चक्कर खा रहे है....

गौतम राजरिशी ने कहा…

वैसे हम और आप जैसे पाठक भी कितना सहयोग दे रहे हैं इस तरफ...हम जैसे आधे से ज्यादा पाठकगण तो इस ताक में रहते हैं कि कब गीत चतुर्वेदी साब या बोधिसत्व भाई अपनी किताब उपहार में देंगे।

लवली कुमारी ने कहा…

main ajit ji se sahmat hun.

शरद कोकास ने कहा…

अभय जी, इस ब्लॉग पर बहुत सारे हिन्दी प्रेमी व साहित्य प्रेमी उपस्थित हैं । हिन्दी साहित्य जगत में यह प्रश्न भी कई वर्षों से विद्यमान है कि हिन्दी की पुस्तकें क्यों नहीं बिकती ? अजित जी से सहमत होते हुए और आपके द्वारा प्रस्तुत विचारों से वाकिफ होते हुए भी मै यह बात अवश्य कहना चाहूंगा कि इसके एक नहीं अनेक कारण हैं ।

इस स्थिति के लिये न केवल प्रकाशक बल्कि,लेखक,पाठक् और नीति निर्धारक लोग भी ज़िम्मेदार हैं । किसी शहर में पुस्तकालय बनाने की अपेक्षा सड़क या नाली बनाने को अधिक वरीयता दी जाती है । पढ़ने लिखने के संस्कार देने के बजाय टीवी देखने के संस्कार दिये जाते हैं ।यज्ञ और धार्मिक कार्यक्रमों मे भीड़ जुटती है लेकिन साहित्यिक कार्यक्रम मे लोग नही जाते हैं । शालेय शिक्षा में न साहित्य का महत्व बताया जाता है न पुस्तकों का । इसीलिये मनोरंजन करने वाली किताबे,फिल्मे,और मंच की कविता बिकती है । जीवन मूल्य स्थापित करने वाला साहित्य उपेक्षित रह जाता है ।
अंग्रेजी या अन्य भाषाओं से हमारा कोई झगड़ा नहीं है । बंगाल, महाराष्ट्र और असम ऐसे राज्य है जहाँ क्षेत्रीय भाषा की किताबे हिन्दी,अंग्रेज़ी से ज़्यादा बिकती है । हिन्दी की पत्रपत्रिकायें बिहार मे सबसे ज़्यादा बिकती है । फिर भी हिन्दी की स्थिति तो दयनीय ही है । इसके लिये सभी को मिलकर सोचना होगा ।

मसिजीवी ने कहा…

हिन्‍दी में मार्केटिंग विवेक का अभाव, पुस्‍तकालय खरीद तथा राजभाषाई बीमारूपन के कारण एक किस्म की परजीविता, औपनिवेशिक विरासत ये कुछ कारण दिखाई देते हैं हमें।

हिन्‍दी के लेखक ने भी इस दौरान पुस्‍तकालय खरीद, तथा बेमार्किटिंग की छपास के चलते बिना पाठकीय आमदनी के जीना सीख लिया (वो अपनी नौकरी, संपादकी, इस या उस की रोटी खाता है लेखन की नहीं) इसलिए वो अधिकाधि पाठक निरपेक्ष लिख रहा है (कभी आलोचक या पुरस्‍कार सापेक्ष जरूर लिखता है) इसलिए कुछ मिलाकर ये सिस्‍टमिक व्‍याधि हो चुकी है... उपचार भी जड़ से तथा व्‍यवस्‍थागत ही होगा।

शुरूआत के तौर पर गैर साहित्यिक हिन्‍दी पुस्‍तकों को प्राथमिकता दी जा सकती है आखिर धार्मिक/ जीवन शैली/ स्‍वेट मार्डन भी तो हिन्‍दी में बिती ही हैं।

बोधिसत्व ने कहा…

आज के प्रकाशन संसार पर एक चिंमतन भरा लेख....हेम जी देवी प्रासद जी को बधाई

Pankaj Upadhyay ने कहा…

बहुत ही बढिया पोस्ट..पहली बार आपके ब्लाग पर आया हू...वाह क्या मुद्दा उठाया है आपने..

कुछ साल्यूशन्स भी रखे जाये..ये बहुत जरूरी प्रश्न है...बहुत जरूरी..

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

लगे रहिये अभय भाई ,डी.जे . हास्टल जिंदाबाद.
करीब २० वर्षों बाद आज आप से बात कर मजा आ गया.
बहुत सी स्मृतियाँ चल-चित्र की भांति चलायमान हो गईं.

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