मंगलवार, 3 नवंबर 2009

राज्य की नैतिकता और तमाम उलझे सवाल

माओवादियों की नीति और हिंसा के खिलाफ़ लिखे मेरे पिछले लेख को कुछ पाठकों ने उसे आदिवासियों के अधिकारों के खिलाफ़ भी समझ लिया। और यह भी समझ लिया कि मैं राज्य की हर उलटी-सीधी हिंसा और अन्याय का समर्थक हूँ। शायद लेख के शीर्षक से ऐसा बोध हुआ है। ऐसा नहीं है, मैं राज्य की हिंसा का समर्थक नहीं हूँ और मैं पूरी तरह से चाहता हूँ कि आदिवासियों के साथ न्याय हो।

यह राज्य और लोकतंत्र दोनों ही विभिन्न प्रकार रोगों, दोषों से आक्रान्त है लेकिन मैं शरीर में बुखार या दूसरा कोई रोग हो जाने पर हाथ-पैर फेंक कर उससे लड़ने या हताश हो कर ये सोचने कि ‘अब तो मर ही जायेंगे’ की जगह रोग को समझ लेने और उपलब्ध ज्ञान और पिछले अनुभवों के आधार पर उपचार में क्या-क्या कष्ट आने वाला है, उसे जान लेना अधिक बेहतर समझता हूँ। मुझे लगता है कि इस मामले में बहुत सारे लोग राज्य और सरकार के खिलाफ़ एक प्रकार के हताश आक्रोश से भरकर विरोध कर रहे हैं। जैसे कि देखा कि मित्र आनन्द प्रधान ने चिंता व्यक्त की है कि देश में अघोषित आपातकाल लगने वाला है। अरुंधति मानती हैं कि इस देश में लोकतंत्र ही नहीं है एक ढकोसला है। और भी बहुत सारे बुद्धिजीवी चिंतक ऐसी ही चिंताए व्यक्त कर रहे हैं।

लोकतंत्र क्या है? रूसो, वालतेयर के नवजागरण के विचारों और फ़्रांसीसी क्रांति के गर्भ से जन्मा यह शासनतंत्र बंधुता, समानता और स्वतंत्रता के आदर्शों पर आधारित हुआ। लेकिन जन्म लेते ही खुद फ़्रांस में इसका अस्तित्व खतरे में पड़ा रहा और एक समय चक्र के बाद ही इसकी पुनर्स्थापना हो सकी। ब्रिटेन, अमरीका और अन्य योरोपीय देशों में यह फिर भी एक कुदरती चाल से क़ाबिज़ हुआ, भारत में लोकतंत्र लगभग ऊपर से आरूढ़ हुआ। जनता लोकतंत्र के लिए नहीं अंग्रेज़ो को बाहर करने के लिए आन्दोलन कर रही थी। अंग्रेज़ बाहर गए उनका बनाया तंत्र रह गया।

इस तंत्र की ज़रूरत, पहुँच और क्षमता कहाँ तक थी और कितनी थी, यह सब कहना मुश्किल है। माओवादी तो मानते हैं कि हम अभी भी अर्धसामन्ती समाज में हैं (फिर भी लड़ाई पूँजीवाद और साम्राज्यवाद से?)। लेकिन हमारे लगभग सभी बुद्धिजीवी संवाद के समय एक ऐसी जगह से अपनी बात शुरु करते हैं जहाँ पर लोकतंत्र एक ऐसा खूबसूरत और कल्याणकारी लिबास है जो सरकार ठीक से पहन नहीं पा रही और जगह-जगह से उघड़ जा रही है। गोरख पाण्डेय के गीत की एक पंक्ति है : समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई। गीत व्यंग्य में है पर मैं मानता हूँ कि क्रांतिकारी समाजवाद की गति हम देख चुके हैं, जल्दी में बहुत नुक़्सान भी हुए। और अभी तो ये लगता है कि लोकतंत्र बबुआ धीरे-धीरे आई।

राज्य का स्वरूप आज जैसा है, हमेशा वैसा नहीं था। मेरे मित्र आशुतोष आज के इस राज्य को अन्याय की मशीनरी मानते हैं, है, पर मेरा आग्रह है कि वर्तमान की आलोचना करते हुए आदर्शों और सुनहरे सपनों को तो नज़र में ज़रूर रखें पर उसका इतिहास भी मत भूल जाइये। ऐतिहासिक रूप से हम जिसे भारत का स्वर्ण काल समझते हैं –मुग़ल काल – उस दौर में व्यक्ति को सम्पत्ति का अधिकार नहीं होता था, सबै भूमि गोपाल की नहीं, बादशाह की होती थी। जब जिस को चाहे दी जब चाही वापस ले ली। आज रहीम खानखाना बड़े अच्छे हैं कल मन उखड़ गया सब कुछ छीन-छान कर भिखारी बना दिया। कल तक जो दसहज़ारी सरदार था, जंग में काम आ गया या बादशाह रूठ गए, दी हुई जागीर वापस ले ली, यहाँ तक कि मकान और सौगातें भीं। दसहज़ारी सरदार का सारा खानदान दाने-दाने को मोहताज़ हो गया। यह हाल मनसबदारों का हो सकता था तो आम जन के क्या हुक़ुक़ थे, पूछे जाने की ज़रूरत है क्या?

अंग्रेज़ो के सत्ता में आने के पहले आलम ये था कि पूरा ‘देश’ (उस वक़्त देश क्या था, ठीक-ठीक कहना मुश्किल था, लोग दूसरे गाँव जाकर भी परदेसी हो जाते थे) घोड़ों की टापों के नीचे लगातार रौंदा जा रहा था। बरसात के चार महीने जब नदियां उफ़न कर सेनाओं की आवाजाही पर रोक लगा देतीं, साल भर मराठे, ईरानी, तूरानी, अफ़्गान, जाट, रोहिल्ले, और सिक्ख आपस में तलवार भांजते रहते। इसी सब के बीच पिंडारी भी थे जो राजस्थान में टौंक से निकलते और कर्णाटक के दक्षिणी इलाक़ो तक गाँव-गाँव को लूटते और आग लगाते जाते। कई बार ऐसा होता कि एक गाँव साल में तीन-चार बार अग्नि को समर्पित हो जाता। ऐसी हालत से बचने के लिए कुछ गाँवो ने शहरपनाह की तर्ज पर गाँवपनाह की चहारदीवारियां बना रखी थीं ताकि लुटेरों और चौथ लेने आने वाली फ़ौजों से कुछ सुरक्षा मिले। पर चौथ के भूखे लड़ाके गाँव वासियों के खिलाफ़ तोप का भी इस्तेमाल करने से नहीं चूकते।

आज हमारी ज़बान अंग्रेज़ो को गाली देती नहीं थकती लेकिन सच तो यह है कि उनहोने इस भूमिखण्ड को एक भयंकर अराजकता से मुक्ति दिलाई। अराजकता का आतंक कैसा होता था इसे बनारसी दास ने अपनी किताब अर्धकथानक में लिखा है कि जब उनके गाँव में पता चला कि अकबर की मौत हो गई तो लोग-बाग़ के दिल संदेह और भय से दहल उठे। लोगों ने अपने कीमती वस्त्र और गहने ज़मीन में गाड़ दिये। और बहुत से लोग अपनी-अपनी सम्पत्ति को लेके इधर-उधर भागने लगे। हर आदमी घर की रक्षा के लिए हथियार एकत्र करने लगा। ऐसी अराजकता का आलम अकबर महान के मरने पर था। अठारहवीं सदी का जो हाल जो हुआ वो हमारे लिए अकल्पनीय है।

शाह आलम की सत्ता दिल्ली से पालम तक सिमट कर रह गई थी। मगर उसके बहुत पहले यानी १७०७ में औरंगज़ेब की मौत के ठीक बाद से ही अस्थिरता घर कर गई थी और पूरी सदी पूरे देश का नक़्शा और मिल्कियत लगातार बदलता रहा। रात को सोते समय कौन राजा था और सुबह जागते समय कौन- कोई ठीक-ठीक नहीं कह सकता था। कितने मुग़ल सलातीन अंधे किए गए, उनकी औरतों को लज्जित किया गया, गिनती मुश्किल है। खुद शाह आलम उनके एक पुराने वफ़ादार के हाथों अंधे हुए। ऐसी हालत में आम जन किस असुरक्षा की मानसिकता में जीते होंगे, ये जानने के लिए कभी मौक़ा लगे तो ‘मीर की आप बीती’ पढ़ लीजियेगा, सूरते हाल साफ़ हो जाएगा।

जिन अंग्रेज़ो के खिलाफ़ हमने १७५७ से लड़ना शुरु किया, १८५७ में महासंग्राम किया, और १९४७ तक लड़ते रहे, वो अंग्रेज़ वास्तव में इतिहास की एक प्रगतिशील शक्ति थे, ये बात हम आज समझ सकते हैं। उस व़क्त वो विदेशी हमारे दुश्मन थे जो हमारे देश को बुरी तरह से अपनी छवि में ढाल रहे थे, हमारी मर्ज़ी, परम्परा और संस्कारों के विरुद्ध। आज हम जो भी लोकतंत्र, जनतंत्र, मानव अधिकार के नाम पर जिन भी चीज़ों का जाप करते हैं, वो हमारी अपनी सोच नहीं है, अंग्रेज़ो के साथ यूरोप से आयातित चिंतन है।

हम आज अमरीका द्वारा इराक़ और अफ़्ग़ानिस्तान में की जा रही सैनिक कार्रवाई के खिलाफ़ बोलते नहीं थकते। हम ऐसे किसी देश का दूसरे देश पर हमला कर देना ग़लत मानते हैं। ग़लत है.. पर किस नैतिकता के आधार पर? हमारी भारतीय परम्परा में इस तरह के आपसी युद्ध को लेकर 'मानवीय' नैतिकता का कोई आग्रह नहीं रहा। (बुद्ध और महावीर की अहिंसक परम्परा को छोड़ दें तो) उलटे लड़ना और रणभूमि में शहीद होना एक योद्धा के लिए उच्च नैतिक मूल्य है। कहा ही गया है कि वीर भोग्या वसुंधरा। और इस भोग की शुरुआत युद्ध जीतते ही लूट-पाट से आरम्भ हो जाती, जिसे विजेता का अधिकार माना जाता। सबसे बड़ा लुटेरा राजा कहलाने का अधिकारी होता था। (आज वीर भोग्या वसुंधरा मानने वालों को हम अपराधी कहते हैं)

इस्लामिक नैतिकता का युद्ध के बारे में क्या नज़रिया है? अब जब मुहम्मद साहब और खुल्फ़ा उल रशीदुन ही खुद युद्ध का परचम उठा कर चले हो और पराजित जातियों के मर्दोज़न को गु़लाम बनाने की रवायत बरक़रार रखी हो तो इस्लामिक नैतिकता में कोई शुबहे की गुंज़ाइश नहीं है। मुहम्मद साहब ने ७०० यहूदियों के गले इसलिए कटवा दिए थे क्योंकि उन्हे शक़ था कि वो उनके साथ ग़द्दारी करने वाले थे।

विष्णु भट्ट गोडशे की एक किताब है- माझा प्रवास। इस किताब में १८५७ की गदर का आँखो देखा वर्णन है। झांसी में अंग्रेज़ो की लूट के समय लेखक वहीं थे; लिखते हैं कि लूट सात दिन चली। पहले दिन अंग्रेज़ सिपाहियों ने लूटा। उनको देख कर भूसे के ढेर में छिप गए लोगों को आग लगा कर जला देते। कुँए में कूदते तो बन्दूक लेकर जगत पर जम जाते-लोग डूबकर मरते या गोली खाकर। खोज-खोज कर लोगों को मार गया- आम जनों को। इस लूट को विजन कहा गया – जनविहीन कर देने की प्रक्रिया। तीन दिन गोरों ने सोना, चांदी, रूपया-पैसा, ज़ेवर आदि लूटा। चौथे दिन काले मन्दराजी लोगों ने बर्तन भांड़े लूटे। अगले दिन हैदराबाद वालों के नाम; उन्होने कपड़े लूटे। उसके बाद रियासती पलटनें आईं, उन्होने अनाज लूटा।

बाबर ने खुद अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उसे लोगों को मारकर उनके कटी हुई खोपड़ियों का पहाड़ बनाने का शौक़ था। हर लड़ाई के बाद ऐसा ज़रूर किया जाता; शायद अपने प्रतिद्वन्दियों के दिल में खौफ़ पैदा करने के लिए। अहमद शाह अब्दाली ने भी इस पुरानी परम्परा को अपने भारत अभियान में जारी रखा। हलाकू ने बग़दाद शहर को क़त्लेआम के बाद जला कर राख कर दिया था। दिल्ली कितनी बार उजड़ी है, कोई हिसाब नहीं है।

और हर छोटी-बड़ी लड़ाई के बाद औरतों का क्या हाल होता था, इसके लिए किसी कल्पना शक्ति की ज़रूरत नहीं है। कहते हैं कि आज दुनिया में चंगेज़ खान के सबसे अधिक वंशज है; कैसे, यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है। इस पृष्ठभूमि में अगर आप इराक़ और अफ़्ग़ानिस्तान का युद्ध देंखे तो आप को मानवीय लग सकता है। अबू ग़रीब की यातना जैसी घटना को छोड़ दें तो अमरीकी फ़ौजों ने न तो लूट-पाट की और न ही बेवजह हत्या-बलात्कार। (भाई मेरे, कृपया इसे अमरीकी नीति का अनुमोदन समझ कर चढ़े मत आईयेगा, ज़रा ठण्ड रखकर पढ़िये, बात-बात पर तलवार मत निकालिए हे मानवतावादी!)

मसला यह है कि आम जीवन में ‘मानवीय’ मूल्य और युद्ध में भी मानवता बरतने की जो नीति विकसित हुई है यह शुद्ध योरोपीय चिन्तन है और आधुनिक काल में पैदा हुआ है। कुछ लोग इस कारुणिक विचार की उत्पत्ति इमैन्वल कान्ट के दर्शन से देखते हैं। जो भी हो, जिस नैतिकता के दम पर हम अमरीका को गाली देते हैं, उस का ठीक-ठीक आगा-पीछा भी हमें नहीं मालूम। वो कैसे, किस रस्ते से हम तक पहुँची, और कैसे वह हमारी और हम उसके मालिक बन बैठे, हम नहीं जानते। हम उदार जन जिन मानवीय मूल्यों की बात-बात पर दुहाई देते हैं वो आम जन (राज्य के कर्मचारी, अधिकारी, सिपाही, सैनिक आदि भी) के भीतर कितने आत्मसात हैं, हमें नहीं मालूम।

हम जिस जीवन को जी रहे हैं, जिन सुविधाओं को भोग रहे हैं, क्या उस के लिए ‘हम’ ने संघर्ष किया है? क्या वो ‘हमारी’ आंकाक्षाओं और प्रयत्नों का परिणाम है? भारत में स्त्रियों को मताधिकार मिला, दलितों को आरक्षण मिला है, इसके लिए भारतीय स्त्रियों और दलितों ने कितना संघर्ष किया? क्या क़ुर्बानियां दी? तो फिर बिना संघर्ष, बिना बलिदान के कैसे मिल गयी उनको यह वरीयता? औरतों को मताधिकार योरोप के देशों में लम्बे संघर्ष के बाद मिला (और वो भी मिला क्योंकि स्त्री स्वातंत्र्य पूँजीवाद की ज़रूरत है, उसे सस्ता मज़दूर चाहिये) भारत में यूँ ही मिल गया? कैसे? बिना लड़े ये लड़ाईयां कैसे जीती जा रही हैं? वो कौन सी शक्ति है जो इस बदलाव के पीछे है?

शायद हमें यह मानने की ज़रूरत है कि कुछ अधिकार माँगने से, लड़ने से मिलते हैं, और कुछ बहुत लड़ने पर भी नहीं मिलते क्योंकि उनके लिए ऐतिहासिक परिस्थिति परिपक्व नहीं थी, और कुछ बैठे-बिठाए मिल जाते हैं क्योंकि वो इतिहास की ज़रूरत हैं। सोचिये इन में से कुछ अधिकार हमें अंग्रेज़ो के समय में ही हासिल हो गए थे?

आखिर क्या दबाव थे जिसके तहत अंग्रेज़ो ने मताधिकार और प्रतिनिधित्व जैसे ये अधिकार हमारी तरफ़ बढ़ा दिए थे? लोकप्रिय शासक अकबर के समय ऐसा क्यों नहीं हो सका? योद्धाओं की सन्तान उस अकबर ने तो ज़मीनदार, मनसबदार, जागीरदार और सूबेदार की श्रेणियों में ही सत्ता का वितरण करके मान लिया कि जनता का प्रतिनिधित्व सम्पन्न हो गया, चुनाव और मताधिकार जैसी बात उसके ख्याल में भी नहीं आई, बावजूद उसकी सारी भलमनसाहत के। लेकिन ‘सौदागर’ अंग्रेज़ ने सत्ता के बाज़ार को जन-जन तक फैला दिया और आमजन को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दे दिया। इस अधिकार को हमें मिले लगभग अस्सी बरस से भी ऊपर हो गया लेकिन कितनी अजीब बात है कि हम आज भी अपने लिए ज़मीनदार, मनसबदार, जागीरदार और सूबेदार ही चुनते हैं, अपने प्रतिनिधि नहीं। ये दोष राज्य का है कि जनता का?

ये ठीक बात है कि राज्य हमारे जीवन की अधिकतर बातों का नियन्ता है और उसने ही हमें शिकायत करने का भी हक़ हमें नियत कर दिया है। पर हमारी भी आदत हो चुकी है सारी समस्याओं को किसी एक संस्था के मत्थे मढ़ कर छुट्टी पाने की। ये प्रवृत्ति हमारी अपने जीवन की स्वयं ज़िम्मेदारी न लेने और हर बात के लिए ईश्वर पर निर्भर होने की आदत का अवशेष है। ईश्वर से हमारी शिकायतों का सिलसिला थमता नहीं दिखता। हम बजाय पुरुषार्थ पर विश्वास करने के हर चीज़ के लिए ईश्वर के आगे झोली फैलाये खड़े रहते हैं।

(वैसे कुछ चीज़ों का ठीकरा हम अंग्रेज़ों के सर भी फोड़ते हैं जैसे कि साम्प्रदायिकता; अच्छे-खासे प्रगतिशील लोग इस बात पर विश्वास करना पसन्द करते हैं कि अंग्रेज़ो के पहले भारत में साम्प्रदायिक मन-मुटाव नाम की चीज़ थी ही नहीं। एक मिसाल के तौर पर अशफ़ाक़ुल्ला खाँ के बारे में खुद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उनके साथ आने से सिद्ध हो गया कि मुसलमान ग़द्दार नहीं होते- क्या ऐसी बातें सौ-पचास बरस के अंग्रेज़ों के षडयन्त्र से किसी के मन में बैठ सकती हैं या उसके लिए आपसी नफ़रत का एक लम्बी विरासत होनी चाहिये?)

इस प्रवृत्ति की सबसे अच्छा उदाहरण शिरडी के साईं बाबा के भक्त हैं: साईं बाबा का दो शब्दों का संदेश है- श्रद्धा और सबुरी; उनके भक्तों में न तो श्रद्धा है और न सबुरी, शिरडी जा के माँग-माँग कर उन्हे मरने के बाद भी हकालते रहते हैं। ऐसे अनास्था वाले लोग – हम सभी, भले ही हम साईं बाबा के भक्त हो या न हों, इस दोष के रोगी हैं – राज्य के प्रति भी ऐसी ही अनास्था से पेश आते हैं। ये नहीं है, वो नहीं है, ये नहीं दिया, वो नहीं दिया। कोई विपदा आती है तो टीवी का कैमरा आते ही लोग शुरु हो जाते हैं, हमें तो कोई पूछने नहीं आया, किसी ने हमारी खबर नहीं ली? सवाल यह भी पूछना चाहिये लोगों ने एक-दूसरे की कितनी मदद की?

वेलफ़ेयर स्टेट (पहले थे, अब पता नहीं हैं कि नहीं) का तो काम है लोगों की मदद करना लेकिन इस स्थिति को अठाहरवीं सदी से तुलना कर लें और समझें। सरकार/राज्य किसी ईश्वर का स्थानापन्न है – ईश्वर के प्रति तो हम उच्छवास भरते हुए कहते हैं कि हे ईश्वर कहाँ हो तुम - लेकिन सरकार को सीधे गरियाते हैं। क्योंकि वो हमारी प्रतिनिधि है, उसे हमारे हित में काम करना चाहिये, लेकिन वो करती नहीं, क्योंकि हमारे प्रतिनिधि हमारे नहीं किसी पूँजीपति के प्रतिनिधि हैं। एक बार फिर से- क्या इस का दोष राज्य का है कि जनता का?

अपनी इस अनास्था के चलते हमारे भीतर की उद्यमता पर भी असर पड़ा है, वो भी गहरे तौर पर भ्रष्ट हो चली है। किसी भी काम को हम पूरी शिद्द्त और मनोयोग से कर ही नहीं पाते। थोड़ी सी सुख-सुविधा और ऐशो आराम हमारी नैतिकता और आदर्श को ढहा देने के लिए काफ़ी साबित होते हैं। मुस्लिम हितों की बात करने वाले क्रांतिकारी अपने राजनैतिक करियर के लिए उन्ही के शक़-शुबहों के सहारे उनका शोषण करने लगते हैं। मज़दूरों के महान नेता, कोकाकोला को देशनिकाला देने वाले जार्ज साहब किस गली में जा कर फ़ंसते हैं। अपने भीतर की अनुभूतियों की अभिव्यक्ति करने निकले कविवर पुरुस्कारों की जुगाड़ू राजनीति में दण्ड पेलने लगते हैं। बाक़ी छोड़िये देखिये उदाहरण शिबू सोरेन और मधु कोडा का, आदिवासियों के बीच से निकले उनकी आकांक्षाओं को स्वर देने के लिए लेकिन कहाँ जा गिरे? क्या इन के पतन पीछे सरकार और राज्य का चरित्र ही उत्तरदायी है?

राज्य से पहले हम एक समाज हैं और समाज से पहले हम एक व्यक्ति। व्यक्ति के रूप में हम कितने नैतिक हैं? ये कौन सी बात है कि गूँहू रोटी को गाली दे कि वो बेस्वाद है? ये बात ठीक है कि राज्य का जो स्वरूप हमें मिला है उसे वैसा बनाने में हमने कोई भूमिका नहीं निभाई है, मगर सरकार तो हमारी ही अभिव्यक्ति है न? और अगर हम राज्य के इस स्वरूप से असंतुष्ट हैं तो हमारे पास कोई विकल्प तो होना चाहिये?

माओवादियों के विकल्प की चर्चा मैं पिछले लेख में कर चुका हूँ, वो मेरी समझ से वरेण्य नहीं है। अरुंधति से जब पूछा गया तो उन्होने कहा कि उनके पास कोई मैनिफ़ेस्टो नहीं है। यही हाल देश के सभी (ग़ैर-मार्क्सवादी) असंतुष्ट बुद्धिजीवियों का है: उनके पास शिकायतें तो हैं, सवाल तो हैं पर विकल्प नहीं है। अरुंधति का जो लम्बा लेख आउटलुक में छ्पा है उसकी मुख्य बातें निम्न हैं :

१) आदिवासी जंगल- पहाड़-नदी के साथ एकाकार हैं (जैसे आदिकाल में सभी मनुष्य थे)
२) बहुराष्ट्रीय कम्पनियां आदिवासियों की इस सम्पदा पर नज़र गड़ा के बैठी हैं और उसे हथियाने के लिए कार्यरत हैं।
३) यह सम्पदा एक अनुमान के अनुसार चार ट्रिलियन (१२ शून्य) डालर्स की है, भारत के जीडीपी से कई गुना अधिक।
४) देश की सरकार ने ऐसी बहुराष्टीय कम्पनियों के साथ समझ के समझौते कर रखे हैं जिसके तहत ७-८% के हिस्सेदारी पर भारत सरकार यह सम्पदा उनके हवाले कर देगी।
५) इस मुनाफ़े में आदिवासियों को कोई हिस्सा नहीं मिलेगा, जो उसके असली मालिक हैं।
६) उलटे उन्हे अपने घर, गाँव, और वातावरण –जिसके साथ वो एकीकृत हैं –से बेदखल कर दिया जाएगा।
७) माओवादियों ने आदिवासियों के असंतोष को स्वर दिया है, पर वो बरगलाए हुए नहीं है, उनकी अपनी एक लड़ाकू परम्परा है।
८) माओवादियों के साथ उनकी इस हथियारबन्दी से बहुराष्ट्रीय कम्पनियां खनन का अपना काम नहीं कर पा रहीं।
९) सरकार पर इन समझौतों को निभाने के लिए दबाव बढ़ रहा है औरे जिसके कारण वो इस समस्या को बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रही है।
१०) वही सरकार जो विकास के नाम पर विस्थापित पाँच करोड़ लोगों का पुनर्वास नहीं कर सकी, उसे ३०० सेज़ बनाने के लिए १,४०००० हेक्टेयर ज़मीन मिल जाती है।
११) सरकार के साथ-साथ (चिदम्बरम वेदान्ता के लिए वक़ील और डाइरेक्टर के पद भी सम्हाल चुके हैं) अदालतें भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथों बिक चुकी हैं।
१२) और जनमत को अपने पक्ष में करने के लिए माओवादियों के दम-खम और आतंक का हौवा बना रही है ताकि उनके बहाने आदिवासियों को रौंदा जा सके और साथ ही दूसरी लोकतांत्रिक आवाज़ों को भी।
१३) सरकार उनसे बात तक करने को तैयार नहीं वह युद्ध चाहती है बस।
१४) पूँजी के हाथ की कठपुतली मीडिया सरकार का प्रवक्ता बना हुआ है, और कोई स्वतंत्र रपट करने के बजाय सरकार की भाषा बोल रहा है।

मोटे तौर पर इनमें से शायद ही कोई ऐसी बात हो कि जिसका कोई संवेदनशील व्यक्ति विरोध करेगा। बंधुता, समानता और स्वतंत्रता के मूल्य हम सभी ने भीतर तक स्वीकार कर लिए हैं (ये सवाल भी उठता है कैसे अपना लिए हैं, बिना उन पर विचार किए, क्योंकि वो खुद व्यवस्था द्वारा प्रचारित हैं; और सच में कितने अपनाए हैं, कहीं ऐसा तो नहीं कि व्यापक जन भीतर अभी भी किसी अन्य नैतिक मापदण्ड के सहारे हैं) और ये जो हो रहा है इन आदर्शों से मेल नहीं खाता। ज़ाहिर तौर पर अत्याचार हो रहा है। मैं इस अत्याचार का विरोध करता हूँ और चाहता हूँ कि पर्यावरण की हानि न हो, जंगल-पहाड़-नदी की पवित्रता बनी रही, पर मेरे चाहने और विरोध करने भर से क्या होता है। इतिहास बड़ा क्रूर है उसकी विशाल नदी के बीच मेरी नन्ही वैचारिक (और तमाम दूसरों की ठोस आन्दोलित) चेष्टाएं क्या बिसात रखती हैं।

इस नदी की धारा को पलटने के लिए जिस प्रकार की हिंसा और नरबलि लगेगी उस के प्रति हम अहिंसक उदारजनों का क्या नज़रिया होगा, यह भी सोचना चाहिये। माओवादी तथा दूसरे पके हुए राजनीतिकर्मियों को कोई शुबहा नहीं होता, वो अपनी तरह की व्यवस्था लाने के लिए हर क़ुरबानी देने के लिए तैयार रहते हैं।

स्वयं अरुंधति भी जानती हैं कि माओवादी, आदिवासियों की बलि देकर आम जनता के आगे नरसंहार का एक विहंगम दृश्य खड़ा कर के अपने आंदोलन को आगे बढ़ाने की नीति खेल सकते हैं। लेकिन फिर भी वो उनके समर्थन में इसलिए जाती हैं क्योंकि उन्हे इस कॉरपोरेट पूँजीवाद के अधिक समाजवादी तंत्र पर भरोसा है (फिर भी ये सवाल रह जाता है कि उसमें पर्यावरण के मसलों की जगह कहाँ रहेगी?), इसीलिए अरुंधति जिस मुखर स्वर से राज्य की हिंसा की आलोचना करती हैं माओवादी हिंसा की नहीं करतीं। यानी विरोध हिंसा का नहीं, हिंसा के चरित्र का है।

आप तय कीजिये कि आप किस हिंसा के हिमायती हैं। हिंसा से छुटकारा नहीं है। बुद्ध की शिक्षाएं पा कर भी जापानी हिंसा के पुजारी बनी रहे। गाँधी बाबा अहिंसा-अहिंसा करते रहे, देश उन्हे बापू, महात्मा कहता रहा और जब देश आज़ादी की बारी आई तो लाखों लोग अल्लाहोअकबर और हरहरमहादेव कह कर लड़ मरे। हिंसा की ऐसी सर्वव्यापकता के बावजूद हम हिंसा को अनैतिक मान कर अपना पक्ष चुनते हैं, मैं भी – ऐसा है अपने युग की नैतिकता का दबाव।

मेरी इच्छा है कि सरकार और माओवादी के नेतृत्व में आदिवासी जन बातचीत करें और सरकार उनकी ज़मीन का उन्हे उचित मुआवज़ा दे, और साथ ही यह भे सुनिश्चित करे कि पर्यावरण की हानि न हो या कम से कम हो। ऐसा चाहने वाले किसी भी नागरिक आन्दोलन का मैं समर्थन करता हूँ। साफ़ तौर पर मैं नहीं चाहता कि मार-काट हो, मैं नहीं चाहता कि माओवादी प्रबल होकर इस राज्यतंत्र को कमज़ोर करें और १८ वीं सदी वाली अराजकता का परिदृश्य दोहराया जाय। पर ये सब सदिच्छाएं हैं, देखें ऐसा सम्भव हो पाता है कि नहीं।

15 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

बहुत-बहुत अच्छा लेख है , आप का ब्लॉग हमेशा पड़ता हूँ पर टिप्पणी नही करने के लिए माफी चाहता हूँ . अभय जी आपने सायद पूरा निचोड़ लिख दिया है इस माओवादी आंदोलन का , लेकिन सबसे दुख की बात यह है की जिन लोगो को निर्णय लेना है , सायद वो लोग यह बातें समझते नही या फिर समझ कर भी अंजान बने हुए है और अपने अपने स्वार्थो को पूरा कर रहे हैं .

रीगार्ड्स-
गौरव स्रिवास्तवा
अल्लहाबाद

संजय बेंगाणी ने कहा…

कम से कम अंतिम पैरा मेरे विचारों से हूबहू मेल खाता है. समझ नहीं आता फिर हमारी विचारधारा दो ध्रूविय क्यों है?

Ashutosh Kumar ने कहा…

मतभेद की आज़ादी न हो तो बतियाने में लुत्फ़ ही क्या रह जाये?हम सब यह जानतें हैं की हम में से कोई अंतिम सत्य नहीं जानता. अंतिम वंतिम कोई सत्य होता भी नहीं.हम सब अपने लिए एक अधिक प्रासंगिक सच की तलाश में हैं, बस.

मामला सचमुच इतना दो टूक नहीं है.बजा फरमाया आप ने. माओवादियों और जिहादियों की आलोचना करने का मतलब राज्य की हिंसा का समर्थन करना नहीं है. है न? ठीक इसी तरह राज्य की उत्पीड़क नीतियों का विरोध करना माओवादियों या जिहादियों के साथ मोर्चाबद्ध होना नहीं है.

फिर भी आप ने तमाम आनंद प्रधानों, अरुन्धतियों और मुझ जैसे नाचीजों को मोर्चाबद्ध करार दे दिया, हैरत की बात है न? अगर मुझे माओवादियों की राजनीति में भरोसा होता तो मैं उन की पार्टी में जरूर शामिल हो गया होता.खाली दमन के भय से या सुविधाओं के लालच में विश्व विद्यालय की नौकरी न कर रहा होता.मुझे मालूम है की मैं भी राज्य की इसी मशीनरी का एक हिस्सा हूँ .इसी लोकतंत्र ने मुझे राज्य की आलोचना करने का हक दिया है.मुझे यह भी मालूम है की जिस दिन मेरी आलोचना में उतनी ताकत आ जायेगी, जितनी भगत सिंह की बातों में थी , तब यह 'अंग्रेजों से तोहफे में मिला' लोकतंत्र मेरे साथ क्या सलूक करेगा.मगर खैर..

माओवादी तो अब भी शहरों को गावों से घेरने की रण नीति पर काम कर रहें हैं.शायद वे सोचते हैं की हमारे शहर आज भी क्रांतिपूर्व के चीन की तरह आस पास केगावों से ही नाभिनालबद्ध हैं. भूमंडली तकनीक क्रांति के इस ज़माने में ! .और ये की पैदल सिपाहियों के सर काट कर वे भारत में भी कोई चीनी क्रांति कर डालेंगे .

पर सवाल यह है की राज्य की तमाम जोर आजमाइश के बाद भी माओवादी ख़त्म क्यों नहीं हो रहे . अमरीका जैसा इतिहास का सब से बड़ा सुपर पावर सब से पिछडे तालिबानों से क्यों पिट रहा है ? मुझे गहरा और सच्चा शुबहा है की भारत और अम्रीका जैसे 'अनूदित' या 'मौलिक' लोकतंत्र जिन नीतियों पर चल रहे हैं , वे ही इस माओवाद या जिहाद के जन्मदाता और पालन हार हैं. अब इस पर मतभेद की गुंजाइश होगी.लेकिन उन नीतियों की सख्त मज़म्मत करने वाले तमाम लोग माओवादियों या जिहादियों के साथ मोर्चाबद्ध तो नहीं हैं . लेकिन सरकार यही कहती है . अब आप भी, सरकार , यही कहने लगोगे तो वह "पिछडापन"कैसे दूर होगा , जिस से आप को इतनी सच्ची औए वाजिब नफ़रत है?

जी , ज़रा इस पर भी गौर कीजिये की "इतिहास की प्रगतिशील शक्तियां" प्रतिक्रिया ,पुनरुत्थान और अतीत - पलायन के यमदूतों को कैसे पैदा करती हैं.अंग्रेजों की प्रगतिशीलता के बारे में आप ने बाबा मार्क्स का मश हूर मुहावरा तो दुहरा दिया , लेकिन यह भी सोचा की भला आदमी १८५७ के बवाल के दरमियाँ लगात्तार लेख लिख लिख कर महान अंग्रेजी सभ्यता को मिटा डालने की महा पिछडे हिन्दुस्तानियों की महा मूर्खतापूर्ण कोशिशों की कामयाबी की दुआ क्यों करता रहा?

इतिहास की प्रगति की नियतिवादी अवधारणा की वाजिब आलोचना की है आप ने. कम्युनिस्टों को इस अवधारणा ने बहुत भरमाया है .लेकिन आप के तर्कों के प्रवाह की दिशा यह दिखाती है की आप भी इस 'आधुनिक' बौद्धिक संस्कार से हरगिज आजाद नहीं हैं.आप को सौ टंच पक्का यकीन है की यूरोप में नवजागरण और औद्योगिक क्रांति न हुयी होती तो दुनिया स्वतन्त्रता, समानता और बंधुत्व के विचारों से अनजान ही रह गयी होती . न कहीं लोकतंत्र होता , न स्त्रीवाद , न दलित विमर्श.कम से कम आप के लिखे से ऐसा ही लगता है.लेकिन , मित्र, यूरोप का नवजागरण न आसमान से आया था,न पांचवी सदी ईसापूर्व के यूनान से. 'ज्ञानोदय ' का बहुत सारा कच्चा माल उन फारसी अरबी स्रोतों से आया था , जिन के खजाने के बहुत सारे रतन ठेठ हिन्दुस्तान के थे. जी उसी महा पिछडे महा पतनशील हिन्दुस्तान के.

आप ने मुझे शुद्ध आदर्शवादी के खिताब से नवाजा है. आप की नवाजिश सर आँखों पर . लेकिन खाकसार की नज़र में शुद्ध आदर्शवादी एक ही हुआ है. उस का नाम था हीगेल. वही जो कहता था की उदारवादी आधुनिक राज्य इश्वर की पराचेतना का अंतिम प्राकट्य है . आप तो 'शुद्ध आदर्शवादी' न होंगे .आप तो उस से कतई सहमत न होंगे!

अभय तिवारी ने कहा…

आशुतोष

सहमत हूँ दोस्त कि ज्ञानोदय में इस्लाम और भारतीय परम्परा की भूमिकाएं थी, पर उसका उल्लेख विस्तार के भय से नहीं हुआ.. आशय यह था कि नए मूल्य वहाँ से गढ़ कर आए.. उनके सूत्र अलबत्ता यहाँ से निकले हों..

सच पूछिये तो यह अन्दर के विचारों की उलटी है.. इसे कोई पक्की प्रस्थापना न समझिये.. ये एक बहस का मसविदा है जो आप लोगों के बीच रखा है...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

अभय, आप से सहमत हूँ। लेकिन मुझे लगता है कि आप जनतंत्र को सामंतवाद या समाजवाद के बरखिलाफ एक व्यवस्था की तरह वर्णन कर गए। सामंतवाद में तो जनतंत्र की कोई गुंजाइश ही नहीं लेकिन पूंजीवाद जो एक व्यवस्था है जनतंत्र के मुखौटे के पीछे अपना असली रूप छिपाती है। मेरा मानना है कि जनतंत्र के बिना तो समाजवाद भी संभव नहीं है और साम्यवाद भी। जनतंत्र एक मूल्य और पद्धति है। जब कि पूंजीवाद, समाजवाद, साम्राज्यवाद और साम्यवाद व्यवस्थाएँ।

अभय तिवारी ने कहा…

दिनेश भाई, आप की बात उचित है मगर जो लोग समाजवाद को लागू कर रहे थे रूस, चीन और अन्य देशों में उनके मन में तो जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति कहाँ आस्था थी.. या है (चीन के सन्दर्भ में)..

अजित वडनेरकर ने कहा…

आपका पिछला लेख भी पढ़ा और ताजा भी। वाजिब चिन्ताएं हैं जिनसे बारह मैं भी गुज़रने की हिमाकत करता हूं। आपने उन बातों को यहां शब्द दिए हैं जिन्हें बरसों से मैं अपने तथाकथित प्रगतिशील मित्रों के बीच चिल्ला-चिल्ला कर अपना गला सुखाता रहा हूं। अंत में रुसवाइयां भी झेलीं। कम अज़ कम उन तथाकथित जुझारू प्रगतिशीलों जैसी शुतुर्मुर्गी संवेदना तो अपने भीतर नहीं है जिन्हें समस्याओं के अंबार में से पसंद की समस्याएं चुनने की तमीज़ भी नहीं है। पक्षपात करने में भी पवित्रताबोध का एहसास जिनमें इतना प्रबल है कि कई बार समझदारों को भी वे वहां खड़े नजर आते हैं जहां से इंच भर आगे मूर्खता का बियाबान शुरू होता है। हर बहस को उसी बियाबान में भटकाने की ये साजिश है ऐसा न कहूंगा, मगर संकट वंचितों के अस्तित्व का उतना बड़ा नहीं है जितना इस वर्ग का अपने अस्तित्व को बचाए रखने की अपवित्र कोशिशों का है।

हमारा लोकतंत्र हमने गढ़ा है मगर उसकी पृष्ठभूमि में वही अंग्रेज थे जिन्हें सौ गालियां सुनने में हमें आनंद आता है। अभय की इस बात से सौ फीसद सहमत हूं कि - अंग्रेज़ वास्तव में इतिहास की एक प्रगतिशील शक्ति थे, ये बात हम आज समझ सकते हैं। उसकी अच्छाइयों, बुराइयों और पनपनेवाली तमाम बीमारियों से हम परिचित हैं। इलाज भी चल रहा है। भाग्य सिर्फ मनुष्य का ही नहीं होता (अगर भाग्य जैसे जटिल शब्द को इस शब्द में निहित सच्ची अर्थवत्ता के सापेक्ष देखे तो) बल्कि देशकाल, प्रकृति और निसर्ग का भी होता है। कम या ज्यादा हिस्सेदारी हर जगह है। पंछियों को उनकी समस्याओं से जूझते किसीने देखा है? समूचा निर्जन भूखण्ड किस तरह अपने अस्तित्व को सागर या रेगिस्तान की बाहों में जाते देखने को अभिशप्त होता है? शायद ये बातें बेमानी हैं। मनुष्य सिर्फ अपने अस्तित्व के बारे में ही बात करना चाहता है और पसंद भी करता है। ऐसे में पक्षपात, बंदरबांट, अन्याय सब लाजिमी है। भारत के संदर्भ में यही कहूंगा कि बहुत कुछ सही हो रहा है। अस्तित्व का संकट हर काल में हर वर्ग में रहा है जिससे सबने अपने अपने हित में सिर्फ बातों से नहीं, कार्ववाइयों से ही पार पाया है। वंचित तब भी हमेशा कुलबुलाता रहा है। भाग्य को समझते हैं न आप? नियति... किसको कितना मिलेगा, सब तय है समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई।

शरद कोकास ने कहा…

हमे लोकतंत्र को क्या नई परिभाषाओं के साथ नही देखना होगा ॥ देश कलानुसार इतना परिवर्तन तो वांछित है ।
शरद कोकास "पुरातत्ववेत्ता " http://sharadkokas.blogspot.com

योगेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा…

आदमी सिर्फ दिन को खींचना चाहता है, रात को झेलना नहीं चाहता | लेकिन दोनों में से किसी एक चाह है तो दूसरा भी अपने आप चला आएगा | तोड़कर देखने की इस आदत के कारण ही दुःख का अविर्भाव होता है |

मेरे दृष्टि में तो आदर्श जैसी कोई वस्तु नहीं होती, यूटोपिया जैसा कभी कुछ होगा नहीं, असल में मानव (या उसके सोचने के तरीके ) ही मूल समस्या है | हम क्या चाहते हैं ? पूरी दुनिया और सारे धर्म और पंथ सारे दिन चिल्लाते रहते हैं, की वे तो शांति के पुजारी हैं समर्थक है शांति स्थापना चाहते हैं, लेकिन शांति है की कहीं दिखाई नहीं देती उल्टा अशांति हर दिन बढती जाती है | क्या ये क्या माजरा क्या है फिर ? कितनी आश्चर्यजनक बात है की सब शांति चाहते है तो फिर दिक्कत क्या है एक ही दिन सब लोग बैठक करके शांति स्थापित कर लो और लड़ाई बंद कर लो !!
सबके चाहने पर भी शांति स्थापित नहीं हो रही तो इसका सीधा मतलब है की कहीं तो गड़बड़ वरना इतना भी क्या टेढा मामला है | असल में शांति-वान्ति की चाह उथली भावना है, गहरे कोई भी मनुष्य शांति नहीं चाहता |

मेरी दृष्टि में, हो सकता है किसी की अजीब लगे, लेकिन मानव का अंहकार मूल कारण है, दूसरो से सुपीरियर होने की आकांक्षा ही कारण है | और मुझे नहीं लगता की सम्पूर्ण विश्व एक साथ कभी इस अवगुण पर विजय पायेगा ! श्रेष्ठ बनने का खेल तर्कों पर चलता ही रहता है | पश्चिम वाले पुरानी सभ्यता की श्रेष्ठता के किसी विषय पर विजय पाने के लिए उस विषय को कैसे भी करके ईजिप्ट की रोड की तरफ घुमाना शुरू कर देंगे, हिन्दू इधर, मुस्लिम उधर घुमाएंगे, सबके तर्क बेजोड़ |
विश्व शांति की आशा करना और वो भी बिना अशांति की सीढियों से गुजरे इस मानव स्वभाव को देखते हुए मुश्किल लगती है | इतने लोग हो गए हैं लड़कर मरेंगे नहीं तो शांति कहाँ से आएगी ; - ) | यूरोप में भी अभी जाके युद्घ बंद हुए है क्योंकि युद्घ की भयावहता को उन्होंने जीया है | भारत-पाक भी एक बार ठीक से जमकर लड़ाई कर लेंगे तो आराम से कुछ समय तक ठंडे होकर बैठ जायेंगे |
बाकी चिंतनशील जीवों के लिए वही जो अभय सर ने कहा है, "सच पूछिये तो यह अन्दर के विचारों की उलटी है..." | तो भैया उलटी है कर लो और रिलीफ़ प्राप्त करो बस | हर आदमी का जन्मगत स्वभाव होता है वह उसे कभी नहीं छोड़ सकता उसको सारे दिन समझा लो, कुछ होने वाला नहीं है, हाँ अपना रिलीफ़ हो जायेगा उलटी करके यही ठीक है, चिंतनशील जीवों को ये सच्चाई समझ लेनी चाहिए की ये सारे दिन कचर-पचर वो अपने रिलीफ़ के लिए करते हैं न की दूसरो के आराम के लिए क्योंकि कचर-पचर करना चिंतान्शीलों का स्वभाव है | गीता में उसने कहा की हर आदमी को मुक्ति उसके स्वधर्म से गुजरते हुए मिलेगी तो अपने स्वधर्म में लगे रहे, बस tension लेना छोड़ दो | अब तो हर आदमी को फ्री में ब्लॉग सुविधा है ही तो जमकर उलटी करो |
NeuronRelief (You have to get rid of brain bowels to get the state of calmness)

गिरिजेश राव ने कहा…

हाँ हाँ हा SS . .
भैया हाँफ गए। दो पार्ट में कर दिए होते!
_____________________________
कुछ कह नहीं सकते - डर लगता है। बहुत विद्वान लोग टिपिया चुके हैं। लेख बहुत पसन्द आया, टिप्पणियों को मिला कर दिमाग को बहुत खुराक मिली। थोड़े दिन मनन करेंगे। धन्यवाद। आप के ब्लॉग का लिंक अपने ब्लॉग चयन में दे रहा हूँ।

iqbal abhimanyu ने कहा…

इस बार भी लेख मुझ जैसे कई लोगों की शंकाओं को मुखरित करता है, साथ ही कुछ असहमतियों को भी, आशुतोष जी ने काफी हद तक मेरे विचारों को स्वर दे दिया है.
" इतिहास बड़ा क्रूर है उसकी विशाल नदी के बीच मेरी नन्ही वैचारिक (और तमाम दूसरों की ठोस आन्दोलित) चेष्टाएं क्या बिसात रखती हैं। "
किन्तु क्या सिर्फ इसलिए की इस विशाल नदी की धार विपरीत है हम धार के विरूद्ध तैरने की कोशिश छोड़ दें? मैं माओवादी और सरकारी दोनों तरह की हिंसाओं से इत्तफाक नहीं रखता, और ये सोचने की हिम्मत भी करना चाहता हूँ कि इन दोनों से अलग कोई तीसरा रास्ता भी संभव है, अगर आज यह बात दूर कि कौड़ी लगती है तो कोई बात नहीं उस दिशा में प्रयास करना बहुत जरूरी है, इतिहास में हुई दो बड़ी हिंसक क्रांतियों के बाद दोनों राज्यों में समानता और न्याय के नारे का जो हश्र हुआ है वहा जग-जाहिर है, जरूरत यह है कि हिन्दुस्तान कि जमीनी हकीकत को ध्यान में रख एक विकेंद्रीकृत ढाँचे की परिकल्पना कि जाए.... और इसे ही व्यक्ति के रूप में अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानता हूँ. बहुत पहले स्कूली दिनों में एक सोवियत उपन्यास में एक पंक्ति पढी थी वही याद आ रही है...
" शाश्वत है संघर्ष , शान्ति के हम सदा सपने देखें...."
इकबाल अभिमन्यु

Deepak Shirahatti ने कहा…

अभयजी, लेख बहुत अच्छा एवं विचारोत्तेजक है। चाह कर भी किसी भी मुद्दे पर बहस के लिये नहीं सोच पा रहा था। परन्तु फिर जब कुछ छत्तीसगढ़ी दोस्तों से बात की तब ख़याल आया कि नक्सलवाद भी एक तरह की आजिविका के साधन के रूप में लोकप्रिय है। कोई डर नही, पैसे की कमी नहीं। मर्जी से रहो। जब मन हो शहरों में जा के मस्ती कर लो। फिर से आ के नक्सलवाद के अपने धंधे को संभाल लो। आजीविका के लिये राजनीति सभी नहीं कर सकते। कॉम्पीटीशन बहुत है तथा वक्त भी ज्यादा लगता है जगह बनाने को। अतः अगला क्रम नक्सलवाद का है। बहुत लोगों की आवश्यकता है इसमें। कोई कॉम्पीटीशन भी नही। मजा है।

बेनामी ने कहा…

itna likhate hain toh kitna sochte hongen. Thoda araam karo bhai.

mehta ने कहा…

sunder lekh

शहरोज़ ने कहा…

शुभ अभिवादन! दिनों बाद अंतरजाल पर! न जाने क्या लिख डाला आप ने! सुभान अल्लाह! खूब लेखन है आपका अंदाज़ भी निराल.खूब लिखिए. खूब पढ़िए!

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