गुरुवार, 6 दिसंबर 2007

सैन्ड्रा फ़्राम बैन्ड्रा

दो सौ साल के अंग्रेज़ो के शासन के दौरान भारत के सांस्कृतिक चरित्र में कई गहरे बदलाव हुए जो आज भी जारी हैं। हम उनकी भाषा बोलते हैं, उनकी तरह कपड़े पहनते हैं, उनके खेल खेलते हैं। हमारा लोकतंत्र, हमारी न्याय व्यवस्था, नौकरशाही, शिक्षा सभी कुछ अंग्रेज़ो के मॉडल पर आधारित है। वास्तव में तो ‘मॉडल पर आधारित’ कहना भी एक रचना प्रक्रिया की भ्रांति देता है.. जबकि हुआ यह कि अंग्रेज़ो द्वारा बनाई संरचना को हम ने बिना किसी छेड़-छाड़ के जस का तस बने रहना दिया और जारी रखा। शायद इसका कारण हमारे नेताओं (राजनैतिक और सांस्कृतिक) के पास किसी वैकल्पिक व्यवस्था के मॉडल का अभाव था।

पुराने सामंती मूल्यों पर आधारित हमारे ग्राम्य समाज का ढाँचा चरमरा कर टूट रहा था पर धराशायी हुआ नहीं था। और अंग्रेज़ो द्वारा लादी गई पूँजीवादी अर्थव्यवस्था अभी आधी-अधूरी अवस्था में थी और कोई शक्ल अख्तियार नहीं कर सकी थी। ऐसे में गाँधी जी जैसे विचारकों का मत था कि हम अंग्रेज़ी मूल्यों को पूरी तरह नकार कर अपने पुराने ढाँचे को पुनः खड़ा करें। पर सत्ता पर का़बिज़ नेहरू को पुराने समय में लौटने में कोई दिलचस्पी नहीं थी.. उनका विचार था कि नया हिन्दुस्तान नए मूल्यों पर ही आधारित होगा। ये नए मूल्य क्या थे और कहाँ से आने वाले थे? आज़ादी के साठ साल बाद हम कितना पुराने मूल्यों से दूर आए हैं और कितना उन नए मूल्यों का विकास कर सके हैं जिनकी चिंता एक समय पर नेहरू और उनके समकालीनों को रही होगी, यह एक अलग चिंता का विषय है।

व्यक्तिगत स्तर पर, निजी स्तर पर पुराने मूल्यों के बरक्स नए मूल्यों का मॉडल कहीं-कहीं भारत के ईसाई समुदाय को भी अनजाने में माना गया। एक स्तर पर तो उन्हे पतित और दुष्चरित्र समझा गया तथा दूसरे स्तर पर उन्हे, अपने घुटन पैदा करने वाले सामाजिक मूल्यों से आज़ादी का पर्याय भी समझा गया। मुम्बई की हिन्दी फ़िल्मों में यह भूमिका क्रिश्चियन सेक्रेटरी के रूप में प्रतिबिम्बित होती है, जो मर्दों की दुनिया में अकेली लड़कियों के बतौर प्रवेश करने का साहस रखती है, स्कर्ट पहनती है, गिटपिट इंगलिश बोलती है, गिटार पर गाने गाती है, डान्स करती है और प्रेम सम्बन्धों में ‘उदार’ रवैया रखती है। उसका नाम होता है बॉबी जूली रोज़ी या मेरी.. एंड शी इज़ अ गुडटाइम गर्ल.. या चालू भाषा में चालू गर्ल। तब के बॉम्बे में इसी लड़की को लोकप्रिय रूप से ‘सैन्ड्रा फ़्रॉम बैन्ड्रा’ का नाम और पहचान दी गई।

फ़िल्ममेकर पारोमिता वोहरा की नई डॉक्यूमेन्टरी ‘व्हेयर इज़ सैन्ड्रा’ पड़ताल करती है इसी मिथक का.. आखिर कौन है यह सैन्ड्रा और क्या है उसकी असलियत। पारो का अपनी इस फ़िल्म के बारे में बयान है..

I searched for a way to explore the stereotype of Christians more gently - through the aspects of fantasy that exist in the idea of the sexy, supposedly available but actually unattainable Christian woman. I've tried to stay away from dismantling stereotypes in the film, tending instead to create my own notion of this figure by taking my own and others' ideas of Sandra, and weaving in Bollywood imagery and interviews with women actually named Sandra living in Bandra.

पारो इस पूरे बदलाव की ऐतिहासिकता में नहीं घुसती, वे अपने आप को सिर्फ़ इस मिथक की परख तक ही सीमित रखती हैं, जिसके बहाने हम बैन्ड्रा के क्रिश्चियन समुदाय के रहन-सहन की एक रूपरेखा देख पाते हैं। ये सीमाएं शायद उनकी फ़ंडिंग एजेन्सीज़ के चरित्र और फ़िल्म की छोटी अवधि के कारण उत्पन्न हुईं होंगी। पर वे ये भी कहती हैं कि.. In a time of so many stereotypes about feminism, more mischievous stories are needed and are being told with greater ease. And the way in which this story is told is an exercise of that sort.

मेरा अपना मानना है कि भले ही पारो को ये मायावी सैन्ड्रा भले ही बैन्ड्रा में कहीं न मिली हो पर आज बदलते हुए हिन्दुस्तान की हर शहरी लड़की के भीतर (मौजूद दूसरे प्रतिमानों के साथ-साथ) एक सैन्ड्रा भी मौजूद है.. अ गर्ल हू जस्ट वान्ट्स टु हैव फ़न!

पारो मेरी पुरानी मित्र हैं और उनकी मेधा से मैं हमेशा प्रभावित रहा हूँ.. यह फ़िल्म अच्छी है पर मेरा मानना है कि पारो इस से कहीं बेहतर करने की सामर्थ्य रखती हैं।

इस फ़िल्म को ऑनलाइन देखने के लिए बाएँ दिख रहे फ़िल्म के पोस्टर पर क्लिक करें.. फ़िल्म की अवधि है अठारह मिनट।

सोमवार, 3 दिसंबर 2007

इब्लीस की नाफ़रमानियाँ और अल्लाह



फ़रीद खान मेरे मित्र और सहकर्मी हैं, उन्हे आप इस ब्लॉग पर पहले भी पढ़ चुके हैं..आज सुबह मेल में उनका ये लेख मिला इस नोट के साथ कि अगर प्रासंगिक लगे तो छापिये.. और मैं छाप रहा हूँ।



आरंभ करता हूँ ईश्वर के नाम से जो अत्यंत दयावान और कृपालु है।
(बिस्मिल्लाह इर्रहमानिर्रहीम का हिन्दी अनुवाद)

इस दुनिया में जो भी वुजूद में है, उसके पीछे ख़ुदा की एक मस्लेहत है।

(उर्दू शब्दकोश में मस्लेहत का मतलब हिकमत, पॉलेसी या नीति, ख़ूबी या विशेषता, मुनासिब तजवीज़ या उपयुक्त प्रस्ताव और अच्छा मशवरा दर्ज है।)

मेरा सवाल है आज उस अल्लाह से, जिसकी मैं वन्दना करता हूँ , कि अगर तस्लीमा और सलमान रुश्दी ने इतने ही हानिकारक विचार लिखे हैं तो उन्हें उठा क्यों नहीं लेता ... उन मुस्लमानों को क्यों हत्यारा बना रहा है भाई, जो आवेश में आ कर तलवार लिए तस्लीमा या रुश्दी के पीछे भाग रहे हैं।

लेकिन अल्लाह शब्दों में जवाब नहीं देता ... वह संकेत देता है।
संकेत है - आदम और हव्वा के वजूद में आने के पहले ही इब्लीस (शैतान) द्वारा अल्लाह की नाफ़रमानी करने पर भी अल्लाह ने उसे ख़त्म नहीं किया ... ।

अल्लाह ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर , असहमति पर , मतभेद पर रोक नहीं लगाई। और तो और शैतान ने तो नहीं सुधरने की भी ज़िद कर रखी है फिर भी अल्लाह ने उसे छोड दिया... शैतान ने चुनौती भी दे रखी है अल्लाह को, कि वह उसके बन्दों को बहका कर रहेगा, फिर भी अल्लाह ने उसे छोड दिया।

इब्लीस (शैतान) तक के वुजूद को अल्लाह ने ख़त्म नहीं किया फिर हम इंसान कौन होते हैं उसके काम में दख़ल देने वाले, लठ ले के तस्लीमा के पीछे भागने वाले और सलमान रुश्दी के पीछे तलवार ले कर भागने वाले ?

अचंभा तो इस बात का है कि जिन राजनेताओं को देश और संस्कृति की चिंता नहीं होती वे अचानक धार्मिक भावनाओं के रक्षक क्यों बन जाते हैं।

वह इसलिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (चाहे वह अभिव्यक्ति किसी भी तरह की क्यों ना हो) एक राजनीतिक कदम है। आप इतिहास देख लें .... सूफ़ियों से कितने ही बादशाहों को ख़तरा महसूस होता था ....औरंगज़ेब ने तो मंसूर को कुट्टी कुट्टी कटवा दिया था। नाथूराम गोडसे ने गांधी की आवाज़ को हमेशा हमेशा के लिए बंद कर दिया। सफ़दर हाशमी को कांग्रेसियों ने मौत की नींद सुला दी। मराठी नाटक मी नाथूराम गोडसे बोलतोय पर महाराष्ट्र सरकार ने प्रतिबन्ध लगा दिया। एम एफ़ हुसैन पर बजरंगियों का ख़तरा बना ही हुआ है और ताज़ा तरीन हमला फ़िल्म आजा नच ले पर भी हो गया।

हर कोई विचारधारा, देश हित, धर्म और राष्ट्र के नाम पर मारने और आवाज़ बंद करने को तत्पर बैठा है। सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो , सभी भयभीत होती हैं विचारों से। इसीलिए आम लोगों में उनके जो एजेंट होते हैं वह अपनी भावनाओं को हमेशा अपनी हथेली पर लिए सडकों पर फिरते हैं कि किसी भी चीज़ से उन्हें ठेस पहुंचे और मौलिक अधिकारों से हमारा ध्यान हट कर दोयम दर्जे की चीज़ों पर चला जाये।

यहाँ मारने को हर कोई स्वतंत्र खडा है लेकिन बोलने को कोई नहीं।

कोपरनिकस और गैलेलियो ने जिस तरह से चर्च के ख़िलाफ़ जा कर दुनिया के सामने अपना विचार रखा और आज दुनिया उनकी अहसानमन्द है। उसी तरह ......



अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे,
तोडने ही होंगे मठ और गढ सब।

-मुक्तिबोध।
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